न्यूज डेस्क: केंद्र सरकार के करीब 1.19 करोड़ कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए इस बार की गर्मी भारी पड़ती दिख रही है। अमूमन मार्च तक होने वाली महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) की घोषणा अप्रैल का दूसरा सप्ताह बीत जाने के बाद भी नहीं हुई है। अब कर्मचारियों के बीच यह डर (Fear) गहराने लगा है कि कहीं कोरोनाकाल की तरह सरकार एक बार फिर डीए फ्रीज करने का फैसला तो नहीं ले रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस देरी के पीछे ‘पश्चिम एशिया संकट‘ (Middle East Crisis) और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता एक बड़ा कारण हो सकती है।
क्या पश्चिम एशिया संकट है बड़ी वजह? (Geopolitical Impact)
कर्मचारी संगठनों का सवाल है कि क्या ईरान-इजरायल और लाल सागर में जारी तनाव के कारण सरकार अपनी राजकोषीय स्थिति (Fiscal Position) को लेकर सतर्क है?
- इतिहास का डर: हालांकि (However), कर्मचारियों को साल 2020 की याद सता रही है जब कोरोनाकाल में 18 महीने का डीए फ्रीज किया गया था।
- बढ़ती महंगाई: अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI) के आंकड़े बता रहे हैं कि इस बार डीए 60% के पार जा सकता है, लेकिन घोषणा न होने से नाराजगी बढ़ रही है।
वेतन और पेंशन में हर महीने 10% का नुकसान!
‘नेशनल मिशन फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम भारत’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल के अनुसार, सरकार के नियमों में एक बड़ा पेच फंस गया है:
- विलय से इनकार (Denial of Merger): नियम कहता है कि डीए 50% पार होने पर इसे मूल वेतन (Basic Pay) में जोड़ना चाहिए, लेकिन सरकार ने इससे इनकार कर दिया है।
- आर्थिक चोट: इसके चलते कर्मचारियों और पेंशनरों को हर महीने उनके वेतन का करीब 10 प्रतिशत नुकसान उठाना पड़ रहा है।
- 8वां वेतन आयोग (8th CPC): चूंकि आठवें वेतन आयोग के गठन में अभी वक्त है, ऐसे में डीए में देरी कर्मचारियों की कमर तोड़ रही है।
📌 कैबिनेट ब्रीफिंग से खाली हाथ लौटे कर्मचारी (Key Highlights)
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पत्र के जरिए गुहार:
‘कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज’ ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर डीए में हो रही देरी पर तुरंत स्पष्टीकरण (Clarification) मांगा है।
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एरियर का संकट:
आमतौर पर अप्रैल के पहले सप्ताह तक तीन महीने का एरियर (Arrears) मिल जाता था, जो इस बार सरकारी फाइलों में ही अटका हुआ है।
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बचत का चौंकाने वाला आंकड़ा:
कोरोनाकाल में 18 महीने का डीए रोककर सरकार ने 34,402.32 करोड़ रुपये बचाए थे। कर्मचारी संगठनों को डर है कि कहीं ‘पश्चिम एशिया संकट’ के नाम पर वही इतिहास न दोहराया जाए।
विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि सरकार की नीयत साफ है, तो उसे देरी का कारण स्पष्ट करना चाहिए। अंततः (Finally), देरी जितनी बढ़ेगी, बाजार में कर्मचारियों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) उतनी ही कम होगी, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

