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Transgender Rights Act 2026: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी कार्रवाई, केंद्र और राज्यों को थमाया नोटिस; क्या बदलेगा नया कानून?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Act, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है। इस कानून को लेकर देशभर के LGBTQIA+ समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश (Outrage) देखा जा रहा है।

CJI ने कहा- फिलहाल रोक नहीं, 3 जजों की बेंच करेगी सुनवाई

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि वे फिलहाल इस नए कानून के संचालन (Operation) पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे भविष्य में तीन जजों की बड़ी बेंच के सामने लिस्ट (List) किया जाएगा।

कोर्ट ने सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल्स के माध्यम से नोटिस जारी करने का आदेश दिया है।

विवाद की मुख्य जड़ें: क्यों हो रहा है विरोध?

नए संशोधन कानून में कई ऐसे बदलाव किए गए हैं जिन्हें समुदाय ‘अधिकारों का हनन’ मान रहा है। मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:

कोर्ट में तीखी बहस: ‘फर्जीवाड़ा’ बनाम ‘अधिकार’

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील ए.एम. सिंघवी ने तर्क दिया कि यह कानून आत्म-पहचान (Self-recognition) के अधिकार को छीनता है। उन्होंने कहा कि अस्पताल अब सर्जरी करने से मना कर सकते हैं क्योंकि नया कानून इसकी अनुमति नहीं देता।

दूसरी ओर, बेंच ने एक महत्वपूर्ण सवाल (Crucial Question) उठाया। CJI सूर्यकांत ने पूछा, “क्या आत्म-पहचान की सुविधा का दुरुपयोग करके कुछ लोग आरक्षण जैसे लाभ लेने के लिए ट्रांसजेंडर होने का ढोंग (Masquerade) नहीं करेंगे?” सिंघवी ने इस पर स्पष्ट किया कि इस श्रेणी में फिलहाल कोई आरक्षण नहीं है।

सरकार का पक्ष: ‘जबरन लिंग परिवर्तन’ पर लगाम

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि इस कानून का उद्देश्य जबरन लिंग परिवर्तन और ‘कैस्ट्रेशन’ (बधियाकरण) जैसी कुरीतियों और अपराधों पर लगाम (Curb) लगाना है।

इस्तीफों की झड़ी और व्यापक विरोध

बता दें कि इस कानून के विरोध में नेशनल काउंसिल ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स (NCTP) के दो सदस्यों, कल्कि सुब्रमण्यम और रितुपर्णा नियोग ने राज्यसभा में बिल पास होते ही इस्तीफा दे दिया था। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और ज़ैनब पटेल जैसे बड़े नामों ने भी इस कानून के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

वह ऐतिहासिक फैसला जिसने ‘किन्नर समाज’ को मुख्यधारा से जोड़ा, जानें इसके बड़े बिंदु

भारत के कानूनी इतिहास में 15 अप्रैल 2014 का दिन मील का पत्थर (Milestone) साबित हुआ था। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने ‘नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) बनाम भारत संघ’ मामले में फैसला सुनाते हुए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘थर्ड जेंडर’ (Third Gender) के रूप में कानूनी मान्यता दी थी।

क्यों जरूरी था यह फैसला?

इस फैसले से पहले, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मजबूरन खुद को ‘पुरुष’ या ‘महिला’ के रूप में पहचानना पड़ता था। उनके पास अपनी पहचान (Identity) का कोई कानूनी आधार नहीं था, जिसके कारण उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता था।

NALSA फैसले की बड़ी बातें (Key Highlights):

मौजूदा विवाद से संबंध (Connection to 2026 Act)

हाल ही में चर्चा में आए Transgender Persons Amendment Act, 2026 का विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि याचिकाकर्ताओं का मानना है कि नया कानून NALSA जजमेंट के ‘आत्म-पहचान’ (Self-Identification) के अधिकार को खत्म कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में अब इसी बात पर बहस चल रही है कि क्या कोई नया कानून पुराने ऐतिहासिक फैसले (Landmark Judgment) के मूल आधार को बदल सकता है?

एक्सपर्ट व्यू (Expert Opinion)

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि NALSA फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं था, बल्कि यह मानवीय गरिमा (Human Dignity) की जीत थी। इसने समाज के सबसे हाशिए पर रहने वाले वर्ग को सिर उठाकर जीने का हक दिया।

निष्कर्ष (Conclusion): सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस (Legal Notice) ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की लड़ाई में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। अब सबकी नजरें केंद्र और राज्यों के जवाब पर टिकी हैं।

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S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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