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Budget अपने छत्तीसगढ़ की माटी से, मैं तिलक लगा कर आया हूं: पढ़ि‍ए- बजट भाषण में OP चौधरी की 6 शायरी

Budget अपने छत्तीसगढ़ की माटी से, मैं तिलक लगा कर आया हूं: पढ़ि‍ए- बजट भाषण में OP चौधरी की 6 शायरी

Budget  रायपुर। छत्‍तीसगढ़ के वित्‍त मंत्री ओपी चौधरी ने आज विधानसभा में बजट पेश किया। वित्‍त मंत्री ने करीब एक घंटा 44 मिनट के अपने बजट भाषण में छह कविता और शायरी भी पढ़ी। उन्‍होंने बजट भाषण की शुरुआत और अंत दोनों कविता से किया।

इस कविता से की बजट भाषण की शुरुआत

ना चंदन से ना कुमकुम से, श्रृंगार करा कर आया हूं। ना रोली से ना वंदन से, मस्तक सजा कर आया हूं। स्वयं ईश्वर भी जो कामना करें, वो सौभाग्य जगा कर आया हूं। अपने छत्तीसगढ़ की माटी से, मैं तिलक लगा कर आया हूं।

दूसरी कविता

इस माटी के संस्कारों ने, गुण्डाधूर को जन्म दिया था, इंद्रावती का पानी तो, श्री राम ने भी पिया था, प्रण करो मां दंतेश्वरी का, आंगन फिर खुशहाल करेंगे, इस झूठी विचारधारा को नकार, मुख्यधारा में विश्वास करेंगे

तीसरी कविता

जिहां दाई कौशल्या के शक्ति हे, अउ मां कर्मा के भक्ति हे, बबा घासी के तप हे, संत वल्लभ के जप हे, सरगुजा ले बस्तर तक जिहां के सबो रपटा, पथरा अउ रस्ता इतिहास के जिंदा प्रमाण हे, जेकर कन-कन म हमर वीर पुरखा के त्याग आउ बलिदान हे, मां दंतेश्वरी, मां बम्लेश्वरी, मां महामाया के अचरा म बसे, हमर छत्तीसगढ़ महान हे।।

चौथी कविता

आजादी का बुलंद जयघोष है वन्दे मातरम आजाद की पिस्तौल और भगत का जोश है वंदे मातरम अंग्रेजों के खिलाफ वीरनारायण की तलवार है वंदे मातरम् अन्याय के विरूद्ध गुण्डाधूर की ललकार है वंदे मातरम।

पांचवीें कवित

अपनी बातों को तोलना होगा, यानी सूरज को बोलना होगा, धूप कमरे में यूं ना आएगी, उठ के दरवाजा तो खोलना होगा।

इस कविता के साथ किया भाषण का अंत

जब जलती सकल्प की ज्वाला है तम् का साहस खोता है मन के संशय, भय के बादल क्षण भर में क्षीण हो जाता है। जो ठान लिया अंतर्मन में वह पथ खुद बन जाता है भाग्य नहीं पुरुषार्थ जगाता-मानव इतिहास बनाता है। विपदा चाहे वज्ज बन आए संकल्प न झुकने पाता है दीप अकेला भी जल उठे तो रात स्वय झुक जाता है।

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