Chhattisgarh रायपुर। छत्तीसगढ़ 25 साल का युवा राज्य। कभी इसकी पहचान देश के बीमारु राज्य मध्य प्रदेश के सबसे पिछड़ा क्षेत्र की थी। अपनी अकूत प्राकृतिक संपदा और सरल, सहज व मेहनतकश लोगों के दम पर आज यह देश के विकसित राज्यों के साथ कदमताल कर रहा है। यह सब कुछ 25 साल पहले भी था, लेकिन…, इसी दर्द ने 1920 से उठ रही छत्तीसगढ़ अलग राज्य निर्माण की मांग को ताकत दी और राज्य निर्माण के लिए शांतिपूर्ण लेकिन पूरी ताकत के साथ रायपुर के घड़ी चौक पर अखंड धरना शुरू हुआ। यह शांतिपूर्ण तरीके से गठित होने वाले राज्यों में से एक था, जिसमें कोई बड़ा आंदोलन या हिंसा नहीं हुई थी।
छत्तीसगढ़ की धरती खनिज और वन संपदा से परिपूर्ण होने के बावजूद यहां के लोग गरीब थे। अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में यहां के संसाधनों का लाभ राज्य के दूसरे हिस्सों को मिलता था और यह क्षेत्र पूरी तरह उपेक्षित रहता था। मसलन बिजली यहां बनती थी, लेकिन सबसे ज्यादा कटौती भी इसी हिस्से में होती थी। यहां की खनिज से मिलने वाली रायल्टी व अन्य राजस्व सरकारी खजाने में पहुंचता तो था, लेकिन यहां की सड़के सबसे ज्यादा बदहाल थी।
सबसे पहले 1920 में स्वतंत्र छत्तीसगढ़ की मांग उठी। 1946 में छत्तीसगढ़ शोषण विरोधी मंच का गठन हुआ और 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में भी इसकी गूंज सुनाई दी। 1954 में राज्य पुनर्गठन आयोग के सामने छत्तीसगढ़ राज्य की मांग रखी गई, लेकिन स्वीकृति नहीं मिली। 1955 में नागपुर विधानसभा में फिर यह मांग सामने आई, तब छत्तीसगढ़ मध्यप्रांत का हिस्सा था। यह प्रस्ताव रायपुर के विधायक ठाकुर रामकृष्ण सिंह ने रखा था, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया।
जनवरी 1956 में डॉ. खूबचंद बघेल की अध्यक्षता में राजनांदगांव में छत्तीसगढ़ महासभा का आयोजन हुआ। इसी साल नवंबर में मध्यप्रांत से अलग मध्यप्रदेश राज्य का गठन हुआ और छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश में शामिल किया गया। 1967 में छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए राष्ट्रपति के नाम पत्र भेजा गया। इसी साल शंकर गुहा नियोगी इस आंदोलन से जुड़े और संघर्ष तेज हो गया।
छत्तीसगढ़ पृथक राज्य निर्माण की मांग जनआंदोलन का रुप ले चुका था। इस बीच 1993 में मध्यप्रदेश विधानसभा में रविंद्र चौबे ने इसके लिए शासकीय संकल्प पेश किया। इसके साथ ही स्पष्ट हो गया कि राजनीतिक नेतृत्व भी अब छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण को लेकर गंभीर है। इस बीच विद्याचरण शुक्ल उनके बड़े भाई और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल,
समय 1998 के लोकसभा चुनाव का था। राज्य निर्माण की मांग भी तेज हो चुकी थी। रायपुर के माधवराव सप्रे स्कूल में अटल बिहारी वाजपेयी जी की जनसभा थी। सभा में भारी भीड़ के बीच अटल जी ने छत्तीसगढ़ के लोगों से अपील की कि राज्य की 11 लोकसभा सीटें भाजपा को जीता दीजिए, केंद्र में सरकार बनते ही हम छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना देंगे। भाजपा 11 में से 10 सीट जीती। राज्य निर्माण के बाद जब अटल जी आए तो उन्होंने इस पर चुटकी ली, कहा कि आप लोगों ने लोकसभा सीट जीताने में कंजूसी कर दी, लेकिन हम पूरा राज्य दे रहे हैं।
अटल जी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 1999 में छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा देने की घोषणा की। 9 अगस्त 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य पुनर्गठन विधेयक 2000 संसद में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक 25 अगस्त 2000 को लोकसभा और 28 अगस्त 2000 को राज्यसभा में पारित हुआ। 1 नवंबर 2000 को, भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत, छत्तीसगढ़ भारत का 26वां राज्य बना।
छत्तीसगढ़ राज्य बना तक यहां तीन संभाग और 16 जिला थे। तहसीलों की संख्या 96 और विकासखंड 146 थे। जनसंख्या लगभग पौने दो करोड़ थी। राज्य के हिस्से में विधानसभा की 90, लोकसभा की 11 और राज्यसभा की पांच सीटें आई।