chturpost गांव में चुनाव का माहौल था। गलियों में चहल-पहल बढ़ गई थी, चौपालों पर चर्चा गर्म थी और हर घर में आने-जाने वालों की संख्या अचानक बढ़ गई थी। लेकिन इस बार चर्चा का विषय केवल विकास या मुद्दे नहीं थे, बल्कि “साड़ी” भी थी।
कहानी कुछ यूं है—गांव के लोगों ने देखा कि रात होते ही कुछ अनजान गाड़ियां चुपचाप गांव में दाखिल होती हैं। उनके साथ कुछ लोग आते हैं, जो सीधे उन घरों तक पहुंचते हैं जहां महिलाओं की संख्या अधिक होती है। दरवाजे धीरे से खटखटाए जाते हैं, और अंदर से किसी परिचित के इशारे पर साड़ी के पैकेट थमा दिए जाते हैं।
हर साड़ी के साथ एक “संकेत” भी होता है—बिना कुछ कहे बहुत कुछ समझा देने वाला। “याद रखिएगा…” जैसे शब्द हवा में तैरते हैं, लेकिन पूरी बात कभी खुलकर नहीं कही जाती।
गांव की महिलाएं भी इस खेल को समझती हैं। कुछ इसे “त्योहार का तोहफा” मानकर रख लेती हैं, तो कुछ मुस्कुराकर कहती हैं—“वोट तो हम अपने मन से ही देंगे।” लेकिन यह भी सच है कि इस तरह के उपहार चर्चा का हिस्सा जरूर बन जाते हैं।
चौपाल पर बैठे बुजुर्ग कहते हैं, “पहले चुनाव में नेता लोग आकर हाथ जोड़ते थे, अब सामान बांटकर दिल जीतने की कोशिश होती है।” वहीं युवा पीढ़ी इस पर सवाल उठाती है कि क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ ऐसे प्रलोभन रह गया है?
धीरे-धीरे पूरे गांव में यह बात फैल जाती है कि अलग-अलग पक्षों से अलग-अलग तरह की साड़ियां बांटी जा रही हैं—कहीं रंग अलग, कहीं डिजाइन अलग। लोग मजाक में कहने लगे—“इस बार चुनाव में मुकाबला वोट का कम, साड़ियों का ज्यादा है।”

