Coal Levy रायपुर। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राज्य के 10 अफसरों के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुशंसा प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने की है। ईडी ने इस संबंध में राज्य के मुख्य सचिव और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) पत्र भेजा है। इसमें संबंधित अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्यवाही करने की अनुशंसा की गई है।
सूत्रों के अनुसार ईडी ने राज्य में कांग्रेस सरकार के दौरान हुए 570 करोड़ रुपए के कथित कोयला लेवी घोटाला में मनी लांड्रिंग के मामले में फंसे अफसरों के खिलाफ अब भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत कार्यवाही करने की अनुशंसा की है। इनमें आईएएस और आईपीएस अफसरों के साथ ही राज्य सेवा के अफसर शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि इस मामले में ईडी ने 36 लोगों को आरोपी बनाया है। इनमें कुछ आईएएस समेत अन्य की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। इनमें सौम्या चौरसिया, अनिल टूटेजा और सूर्यकांत तिवारी, आईएएस समीर विश्नोई, रानू साहू शामिल हैं।
दरअसल, ईडी को केवल मनी लांड्रिंग के मामलों में कार्यवाही का अधिकार है, जबकि इस मामले में भ्रष्टाचार भी सामने आ रहा है। इसी वजह से ईडी ने भ्रष्टाचार के एंगल से मामले की जांच ईओडब्ल्यू से कराने की अनुशंसा की है। उल्लेखनीय है कि इसी तरह शराब घोटाला के मामले में भी ईडी की अनुशंसा के आधार पर ईओडब्ल्यू और सीबीआई जांच कर रही है।
राज्य में हुए कथित कोयला घोटाला के मामले में ईडी ने अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी है। ईडी का दावा है कि जांच में इस बात का खुलासा हुआ है कि कुछ लोगों ने राज्य के वरिष्ठ राजनेताओं और नौकरशाहों से मिली भगत के बाद कोयला परिवहन की ऑनलाइन मिलने वाले परमिट को ऑफलाइन कर दिया। यह आदेश 15 जुलाई 2020 को इसके लिए आदेश जारी किया गया। इसके बाद जुलाई 2020 से जून 2022 के बीच कोयले के हर टन पर 25 रुपए की अवैध लेवी वसूली गई।
ईडी की चार्जशीट के अनुसार परमिट को ऑनलाइन से ऑफलाइन करने का आदेश खनिज विभाग के तत्कालीन संचालक समीर बिश्रोई ने जारी किया था। मामले का मास्टरमाइंड किंगपिन कोल व्यापारी सूर्यकांत तिवारी को माना गया। इसमें जो व्यापारी पैसे देता उसे ही खनिज विभाग से पीट और परिवहन पास जारी होता था, यह रकम 25 रुपये प्रति टन के हिसाब से सूर्यकांत के कर्मचारियों के पास जमा होती थी। इस तरह से स्कैम कर कुल 570 करोड़ रुपये की वसूली की गई।
ईडी के इस पत्र के आधार पर ईओडब्ल्यू राज्य सरकार को पत्र लिखकर आरोपी अफसरों के अनुसार अभियोजन स्वीकृति मांगेगी, क्योंकि भ्रष्टाचार के मामले में ईओडब्ल्यू राज्य सरकार की अनुमति के बिना किसी अफसर के खिलाफ जांच नहीं कर सकती है। राज्य सरकार से अभियोजन की मंजूरी मिलने के बाद ईओडब्ल्यू प्राथमिकी दर्ज करने के साथ जांच शुरू करेगी।