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CSPTCL 60 साल पुरानी जिस जर्मन की मशीन को निर्माता कंपनी के लोग नहीं बना पाए, उसे पावर कंपनी के इंजीनियरों ने चालू कर दिया

CSPTCL  रायपुर। छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी के इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों ने अपने अनुभव, कौशल और नवाचार का उपयोग करते हुए लगभग 60 साल पुरानी जर्मन निर्मित रेडियल ड्रिल मशीन को सफलतापूर्वक पुन: कार्यशील बना दिया है। यह मशीन 1965 में जर्मनी से आयात की गई थी। राज्य गठन के कुछ वर्षों बाद तकनीकी खराबी के कारण अनुपयोगी हो गई थी।

इस मशीन को सुधारने के लिए पहले विशेषज्ञों की तलाश की गई थी, लेकिन इसकी अत्यधिक पुरानी तकनीक के कारण मरम्मत संभव नहीं हो सकी। इसके बाद पॉवर कंपनी के अनुभवी तकनीकी कर्मचारियों ने अपने स्तर पर इसके यांत्रिक और विद्युत घटकों का परीक्षण कर चरणबद्ध तरीके से इसे पुन: दुरुस्त करने का काम शुरू किया और अंतत: इसे पूर्ण रूप से कार्यशील बना दिया गया।

इनहाउस टैलेंट पर विश्वास करना एक अच्छी पहल

इस उल्लेखनीय तकनीकी उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी के अध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह और प्रबंध निदेशक राजेश कुमार शुक्ला ने बिजलीकर्मियों को बधाई और शुभकामना दी है। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण विभागीय दक्षता, आत्मनिर्भरता और संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग का परिचायक है। राजेश कुमार शुक्ला ने कहा कि आऊटसोर्सिंग के बढ़ावा देने के युग में इनहाउस टैलेंट पर विश्वास करना एक अच्छी पहल है।

इस काम में होगा उपयोग

कार्यपालक निदेशक (ट्रांसमिशन) वीके दीक्षित ने बताया कि रेडियल ड्रिल मशीन के पुन: चालू होने से अब अति उच्च दाब ट्रांसमिशन टावरों के निर्माण में प्रयुक्त मोटे स्टील एंगल, प्लेट और भारी संरचनात्मक सामग्री में सटीक और तीव्र ड्रिलिंग संभव हो सकेगी। इससे जहां काम की गति बढ़ेगी, वहीं अब यह कार्य कम कर्मचारियों में ही पूरा किया जा सकेगा, जिससे मानव संसाधन की दक्षता और उत्पादकता में वृद्धि होगी।

इस काम आता है मशीन

अधीक्षण अभियंता केके यादव ने बताया कि यह मशीन जर्मनी की प्रसिद्ध हेवी इंडस्ट्रियल कंपनी बाटलीबाई ट्रांसमिशन टावर के हैवी एंगल व प्लेट की ड्रिलिंग के लिए डिजाइन की गई थी।

60 एमएम स्टील भी इसके आगे कुछ नहीं

यह साधारण ड्रिलिंग मशीन नहीं, ब्लकि एक यूरोपियन ग्रेड हेवी इंडस्ट्रियल सिस्टम है, जिसमें 60 एमएम तक की स्टील की कटिंग, पंचिंग और नाचिंग तीनों काम एक साथ होता है। यह मशीन भिलाई-03 के वर्कशॉप में रखी थी, जो लगभग 20 वर्षों से बंद थी। इसे बनाने के लिए निर्माता कंपनी बाटलीबाई कंपनी जर्मनी से संपर्क किया गया, लेकिन 60 वर्ष पुरानी तकनीक होने के कारण इसके स्पेयर पार्ट की उपलब्धता नहीं होने के कारण रूचि नहीं ली।

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