Green Cave रायपुर। कांकेर वैली नेशनल पार्क स्थित ग्रीन गुफा को पर्यटन के लिए खोलने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यदि आम जनता की आवाजाही से गुफा की प्राकृतिक विरासत और पारिस्थितिकी को खतरा है, तो राज्य सरकार उसे बचाने के लिए गुफा को आम लोगों से दूर रख सकती है। इस मामले में कोर्ट ने कांकेर वैली नेशनल पार्क के संचालक से शपथ पत्र मांगा है और अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को तय की है।
रायपुर निवासी नितिन सिंघवी द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि वन विभाग ग्रीन गुफा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए प्रवेश द्वार, सीढ़ी, पाथवे और अन्य संरचनाओं का निर्माण कर रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कार्य गुफा की नाजुक प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचा सकता है।
शासन की ओर से कोर्ट को बताया गया कि गुफा के भीतर कुछ लोग नाम और चिन्ह खोद देते हैं, जिससे गुफा को नुकसान हो रहा है। इसी वजह से गुफा के बाहर निर्माण कार्य कर उसे सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गुफा की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं, बशर्ते उनसे उसकी विरासत को खतरा न हो।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज़, लखनऊ के निदेशक प्रो. डॉ. महेश जी. ठक्कर की विशेषज्ञ राय पेश की। उन्होंने बताया कि गुफा के पास निर्माण सामग्री रखने और सिविल कार्यों से गुफा के माइक्रोक्लाइमेट, वायु प्रवाह और इकोसिस्टम को गंभीर व स्थायी नुकसान हो सकता है। बिना विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (श्वढ्ढ्र) के गुफा को पर्यटन के लिए खोलना बेहद जोखिम भरा है।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ए. के. पति ने भी ग्रीन गुफा को अत्यंत संवेदनशील बताते हुए इसे पर्यटन के बजाय केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सुरक्षित रखने की सलाह दी। अब इस मामले में कोर्ट के अगले आदेश पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।