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छत्तीसगढ़ को ‘नशे का गढ़’ बनाने की साजिश? अफीम के बाद अब मक्के की आड़ में गांजे की खेती का बड़ा खुलासा!

Ganja

रायपुर/केशकाल। छत्तीसगढ़ की शांत आबोहवा में नशे का ज़हर घोलने की एक और खतरनाक कोशिश नाकाम की गई है। दुर्ग, बलरामपुर और रायगढ़ में अफीम की खेती पकड़े जाने के अभी हफ्ते भर भी नहीं बीते थे कि अब कोंडागांव जिले के केशकाल से गांजे की अवैध खेती का सनसनीखेज मामला सामने आया है। ऐसा लग रहा है जैसे छत्तीसगढ़ को जानबूझकर ‘नशे का टापू’ बनाने की कोई बड़ी साजिश रची जा रही है।

मक्के की आड़ में हरा सोना‘: ऐसे खुली पोल

केशकाल के एक गांव में दो शातिर किसानों ने पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए मक्के की खेती का सहारा लिया। ऊपर से देखने पर खेत में मक्के की फसल लहलहा रही थी, लेकिन जब पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने पंक्तियों के बीच जाकर जांच की, तो अधिकारी भी दंग रह गए। मक्के के पौधों के बीच गांजे के बड़े-बड़े पौधे छिपाकर लगाए गए थे।

कार्रवाई की बड़ी बातें:

गिरफ्तारी: पुलिस ने मौके से दो किसानों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।

संयुक्त टीम: ग्राम स्तर पर मिली सटीक सूचना के बाद राजस्व और पुलिस विभाग ने यह ज्वाइंट ऑपरेशन चलाया।

जांच का दायरा: पकड़े गए पौधों को जब्त कर अब पूरे इलाके की फसलों का सर्वे शुरू कर दिया गया है।

छत्तीसगढ़ में अफीम का नेटवर्क‘: भाजपा नेता से लेकर सीमावर्ती जिलों तक कनेक्शन

छत्तीसगढ़ में नशे की खेती के मामले अब छिटपुट नहीं रहे, बल्कि एक पैटर्न नजर आने लगा है। अब तक राज्य में अफीम की खेती के 5 बड़े मामले उजागर हो चुके हैं:

दुर्ग कनेक्शन: पहला मामला दुर्ग जिले में फूटा, जहां एक भाजपा नेता को अफीम की खेती कराने के आरोप में गिरफ्तार कर सबको चौंका दिया गया।

बलरामपुर का दोहरा कांड: इसके बाद प्रदेश के अंतिम छोर बलरामपुर में दो अलग-अलग जगहों पर अफीम की लहलहाती फसल मिली।

रायगढ़ में हड़कंप: बीते सप्ताह ही रायगढ़ के लैलूंगा में तीन किसानों के खेतों से अफीम जब्त की गई।

चतुरपोस्ट का नज़रिया: क्या सो रहा है खुफिया तंत्र?

लगातार सामने आ रहे ये मामले बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के भोले-भाले किसानों को लालच देकर नशे की खेती की ओर धकेला जा रहा है। सवाल यह है कि धान और मक्के के इस प्रदेश में अफीम और गांजे के बीज कहाँ से आ रहे हैं? क्या इसके पीछे कोई बड़ा अंतरराज्यीय सिंडिकेट काम कर रहा है?

पुलिस और नारकोटिक्स विभाग के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वे केवल छोटे किसानों तक न रुकें, बल्कि उन ‘सफेदपोश आकाओं’ तक पहुँचें जो छत्तीसगढ़ की पहचान बदलने पर तुले हैं।

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