नई दिल्ली/रायपुर। भारतीय ऊर्जा बाजार (Energy Market) में 1 मई का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। देश के सबसे बड़े बिजली एक्सचेंज, IEX (Indian Energy Exchange) पर बिजली की कीमतें पहली बार गिरकर 0 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गईं। यह स्थिति तब बनी जब मांग (Demand) कम रही और सप्लाई (Supply) में अचानक भारी उछाल देखा गया।
क्यों ‘शून्य’ हुई बिजली की कीमत? (The Real Reason)
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे ‘सोलर डक कर्व’ (Solar Duck Curve) और मौसम का मिजाज मुख्य कारण रहा। 1 मई को दोपहर के समय देश के कई हिस्सों में तापमान (Temperature) में गिरावट दर्ज की गई, जिससे एसी और कूलरों की मांग कम हुई।
मुख्य कारण:
- भारी सोलर सप्लाई: दोपहर के समय सौर ऊर्जा (Solar Power) का उत्पादन अपने चरम पर था।
- कम औद्योगिक मांग: मई दिवस (May Day) की छुट्टी के कारण कई कारखाने और दफ्तर बंद थे, जिससे कमर्शियल लोड घट गया।
- ग्रिड स्थिरता: जब बिजली उत्पादन मांग से कहीं अधिक हो जाता है और उसे स्टोर करने की सुविधा (Storage Facility) नहीं होती, तो कीमतें क्रैश हो जाती हैं।
निवेशकों के लिए खतरे की घंटी (Investor Concerns)
बिजली की कीमतों का शून्य होना आम जनता के लिए सुनने में अच्छा लग सकता है, लेकिन यह Renewable Energy सेक्टर के लिए एक बड़ा झटका (Setback) माना जा रहा है।
क्या है ‘जीरो प्राइस’ का गणित?
इलेक्ट्रिसिटी एक्सचेंज पर हर 15 मिनट के ब्लॉक के लिए बोली (Bidding) लगती है। 1 मई को दोपहर के दो ब्लॉक्स में खरीदार (Buyers) कम थे और बिजली बेचने वाले (Sellers) ज्यादा। नतीजा यह हुआ कि मार्केट क्लियरिंग प्राइस (MCP) गिरकर शून्य पर आ गया।
एक्सपर्ट व्यू: आगे क्या होगा?
ऊर्जा विश्लेषकों (Energy Analysts) का मानना है कि भारत को अब ‘डिमांड रिस्पॉन्स’ सिस्टम पर काम करना होगा। यानी जब बिजली सस्ती या शून्य हो, तब भारी उद्योगों को ज्यादा बिजली इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, ताकि ग्रिड का संतुलन बना रहे।
खबर का सार (Conclusion): बिजली की कीमतों का शून्य होना भारत की ऊर्जा क्रांति (Energy Revolution) का एक कड़वा सच है। यह दर्शाता है कि हम उत्पादन में तो आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन उस बिजली को मैनेज करने और स्टोर करने के तंत्र (Infrastructure) में अभी भी पीछे हैं।

