Site icon Chatur Post

Khabar Varta Aug 2025  लाल आतंक पर अंतिम प्रहार,  हथियार विहीन पुलिस और सियासी पारा हाई…

Khabar Varta Aug 2025 लाल आतंक पर अंतिम प्रहार, हथियार विहीन पुलिस और सियासी पारा हाई...

Khabar Varta Sep Aug रायपुर। बस्‍तर के इतिहास में पहली नक्‍सली घटना बीजापुर के वंदेपारा में हुई थी। यह 1980 के आसपास की बात है। नक्‍सलियों ने श्रमिकों को मजदूरी नहीं देने के आरोप में वन विभाग के एक कर्मचारी के साथ मारपीट की थी। इसी तरह नक्‍सलियों ने एक-एक कर आदिवासियों के साथ हो रहे शोषणा का प्रतिकार किया। धीरे-धीरे नक्‍सली लोगों के बीच अपनी पैठ के साथ ताकत बढ़ाते चले गए और वसूली करने लगे। समय के साथ जंगल में वैध- अवैध काम बढ़ने लगा, इसके साथ ही नकसलियों की उगाही भी बढ़ती चली गई।

सरकार ने छीन लिए पुलिस वालों के हथियार

छत्‍तीसगढ़ की पहली कांग्रेस सरकार के दौरान बस्‍तर में थानों पर नक्‍सली हमले बढ़ गए थे। इसे देखते हुए सरकार ने वहां के थानों से पूरे ह‍थियार हटा लिए। पुलिस को शस्‍त्र वीहिन कर दिया। सरकार का तर्क था कि नक्‍सली हथियार लूटने के लिए थानों पर हमला करते हैं, थानों में हथियार नहीं रहेंगा तो नक्‍सली हमला भी नहीं करेंगे। सरकार के इस फैसले से नक्‍सलियों को खुला मैदान मिल गया। इससे नक्‍सली घटनाएं तेजी से बढ़ने लगी।

सलवा जुडूम का दौर

2005 में नक्‍सली हिंसा के खिलाफ बस्‍तर के लोग उठ खड़े हुए। बस्‍तर टाइगर के नाम प्रसिद्ध कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के नेतृत्‍व में बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। इसे सलवा जुडूम नाम दिया गया। इस आंदोलन के कारण ग्रामीणों में जागरुकता बढ़ी और वे नक्‍सलियों के खिलाफ आवाज उठाने लगे। इससे नक्‍सलियों को खतरा महसूस होने लगा। अपनी धमक बनाए रखने के लिए नक्‍सलियों ने ग्रामीणों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 30 हजार से ज्‍यादा ग्रामीणों को राहत कैंपों में शरण लेना पड़ा। ग्रामीणों में नक्‍सलियों के खिलाफ गुस्‍सा बढ़ने लगा। बड़ी संख्‍या में युवा नक्‍सलियों के खिलाफ हथियार उठाने लगे। एसपीओ और कोया कमांडों के रुपए में उनकी भर्ती हुई। इस बीच 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सलावा जुडूम आंदोलन और एसपीओ पर रोक लगा दिया।

मोबाइल पर पीडीएफ खुलने में थोड़ा वक्‍त लग सकता है

मनवाता को शर्मसार करने वाली एर्राबोर की घटना

सलवा जुडूम के दौरान 25 अप्रैल 2006 को सुकमा जिले के थाना एर्राबोर से लगभग 12 किलोमीटर दूर मनीकोंटा में एक घटना हुई। मनीकोंटा के ग्रामीण जो उस समय दोरनापाल के सलवा जुडूम कैंप में रह रहे थे। अपना घरेलू समान लेने के लिए 58 ग्रमीणजन पैदल अपने गांव जा रहे थे तब 100-125  नक्सलियों ने उन्हें अगवा कर लिया और उन्हें जंगल में ले जाकर धारदार हथियारों से 15 ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर उनके शवों को राष्ट्रीय राजमार्ग पर फेंक दिया था।

जनअदालतों में हत्‍याएं

नक्सली संगठन जब मन में आया गांवों में जन अदालत लगाते और उल्टे-सीधे आरोप लगाकर ग्रामीणों की बेदम पिटाई की, घर फूंक दिया, दो-चार का गला रेत दिया। नक्सलियों ने सलवा जुडूम के दौरान कई अन्य गांवों में भी हमले किए। इसका सबसे बड़ा खामियाजा निर्दोष आदिवासियों को भुगतना पड़ा। अभी हाल ही में दंतेवाड़ा में एक सरपंच प्रत्याशी की हत्या कर दी गई, क्योंकि वे पंचायत चुनाव में हिस्सा ले रहे थे। नक्सलियों ने न केवल हत्याएं कीं, बल्कि ग्रामीणों को डराने के लिए लैंडमाइंस और आईईडी का इस्तेमाल किया। इन हमलों में कई बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी अपनी जान गंवा चुके हैं।

स्‍कूल और अस्‍पातालों को बनाया निशाना

नक्सलवाद ने बस्तर को आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा बना दिया। नक्सलियों ने शिक्षा को निशाना बनाया। स्कूलों को ढहाया और शिक्षकों को धमकाया गया। इससे आदिवासी बच्चों को शिक्षा से वंचित होना पड़ा। अस्पतालों और स्वास्थ्य कर्मियों को निशाना बनाया, जिससे ग्रामीणों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं भी नहीं मिलीं। सड़कों, पुलों और मोबाइल टॉवर, बिजली लाइनों को नष्ट किया, जिससे बस्तर विकास की मुख्यधारा से कट गया। नक्सलियों ने युवाओं को भ्रमित कर उन्हें हथियार उठाने के लिए मजबूर किया, जिससे कई परिवार अपने बच्चों को खो बैठे।

2004 से शुरु हुई नक्‍सलवाद के खिलाफ लड़ाई

बस्‍तर में नक्‍सलवाद से मुक्‍त कराने का प्रयास 2004 में शुरु हुआ। तब प्रदेश में पहली बार डॉ. रमन सिंह के नेतृत्‍व में भाजपा की सरकार थी।  केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे ओपी राठौर को सरकार ने राज्‍य पुलिस की कमान सौंपी। इसके साथ नक्‍सलियों के खिलाफ रणनीति बनने लगी। नक्‍सलियों की गोरिल्‍ला लड़ाई का मुकाबला करने के लिए पुलिस वालों को भी इसकी ट्रेनिंग दी जाने लगी। इसके लिए कांकेर में जंगल वारफेयर कॉलेज की स्‍थापना हुई। जंगल की लड़ाई के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई।

पुलिस पर आरोपों और मुकदमों की झड़ी

बस्‍तर में पुलिस ने जैसे ही नक्‍सलियों के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार किया, पुलिस और सरकार के सामने नई संकट खड़ी हो गई। पुलिस पर मानव अधिकारों के हनन के आरोपों की झड़ी लग गई। लगभग हर मुठभेड़ पर सवाल उठाए जाने लगे। तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता और एनजीओ पुलिस की कार्यवाही रोकने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लगाने लगे। इससे सरकार और पुलिस पर दबाव बढ़ने लगा। 

2009 के बाद एक साथ कई मोर्चों पर जंग

दिल का दौरा पड़ने की वजह से डीजीपी ओपी राठौर का निधन हो गया। इसके बाद सरकार ने केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी में काम कर रहे छत्‍तीसगढ़ कैडर के आईपीएस विश्‍वरंजन को डीजीपी की जिम्‍मेदारी सौंपी। विश्‍वरंजन के कार्यालय में नक्‍सलियों और नक्‍सलवाद के खिलाफ एक साथ कई मोर्चों पर जंग शुरू हुई। केंद्र सरकार ने स्‍वीकार किया कि नक्‍सलवाद केवल राज्‍य की कानून- व्‍यवस्‍था का विषय नहीं है बल्कि यह राष्‍ट्रीय सुरक्षा का विषय भी है। 

नक्‍सल प्रभावित क्षेत्रों में केंद्रीय बलों की तैनाती शुरू हुई।  जंगल में फोर्स ने सर्चिंग और नक्‍सल उन्‍मूलन अभियान शुरू किया तो इधर, शहरी क्षेत्रों में बैठे उनके लोग भी बेनकाब होने लगे। लाल आतंक के इस शहरी नेटवर्क के साथ लड़ाई इतनी आसान नहीं थी, इसके लिए विश्‍वरंजन को व्‍यक्तिगत देश के बाहर भी विरोध और आलोचनाओं और हमलों का सामना करना पड़ा।

एसआईबी और एएनओ हुआ सक्रिय

जंगल वारफेयर कॉलेज के जरिये जवान गोरिल्‍ला वार में तो ट्रेंड होने लगे, लेकिन पुलिस के पास खुफिया सूचनाओं का आभाव था। जंगल में बैठे नक्‍सलियों को फोर्स की हर हरकत से लेकर सरकार के कदम की जानकारी तो मिल जाती थी, लेकिन फोर्स को उनकी जानकारी नहीं मिल पाती थी। नक्‍सलियों की खुफिया सूचना जुटाने के लिए स्‍पेशल इंटेलिजेंस ब्‍यूरो (एसआईबी) की स्‍थापना की गई। आईपीएस गिरधारी लाल नायक के बाद डीआईजी पवन देव को एसआईबी की कमान सौंपी गई। इसके बाद पीएचक्‍यू में एंटी नक्‍सल ऑपरेशन (एएनओ)  भी सक्रिय हो गया। सुरक्षा के लिए जवानों को एंटी लैंड माइन और बुलेट प्रूफ गाड़ि‍यों के साथ नाइट विजन के साथ नए-नए ह‍थियार और संसाधन से लैस किया गया। 

टूटने लगा शहरी सप्‍लाई लाईन

एसआईबी ने थोड़े ही समय में न केवल जंगल बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी सक्रिय नक्‍सली और उनके समर्थकों की जानकारी जुटाने लगी। नक्‍सलियों के लिए शहरी क्षेत्रों में काम करने वालों पर लगाम कस गया। शहरी क्षेत्रों से कई लोग पकड़े गए। इसका असर जंगल में बैठे नक्‍सलियों की सप्‍लाई पर पड़ा। इसका असर बस्‍तर में नक्‍सल विरोधी अभियानों पर भी दिखा।

अब खुफिया सूचनाओं पर ही ऑपरेशन

बस्‍तर में पुलिस का खुफिया नेटवर्क काफी मजबूत हो चुका है। अब बस्‍तर में पुलिस पुख्‍ता खुफिया सूचनाओं के आधार पर ही नक्‍सलियों के खिलाफ ऑपरेशन चला रही है। खुफिया इनपुट के आधार पर ही सुरक्षाबलों ने नक्‍सली संगठन के महासचिव वसवराजू समेत कई बड़े नक्‍सली लीडरों को पिछले आठ महीने में ढेर किया है।

पुलिस और फोर्स को बड़ा नुकसान

 नक्‍सलवाद के खिलाफ इस जंग में बस्‍तर के लोगों के साथ पुलिस और सुरक्षाबल के जवानों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा है। 6 अप्रैल 2010 ताड़मेटला में 75 जवान शहीद हो गए थे, जो देश के नक्‍सल इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। बीते 20 सालों में बस्‍तर में नक्‍सली हमले में शहीद होने जवानों की एक हजार से अधिक है।

छत्‍तीसगढ़ के सीमावर्ती जिलों में नक्‍सलवाद

छत्‍तीसगढ़ के सभी सीमावर्ती क्षेत्रों में नक्‍सली सक्रिय रहे हैं। राज्‍य की सीमाएं सात राज्‍यों से लगी हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा के साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। झारखंड से लगा सरगुजा संभाग काफी पहले नक्‍सलवाद से मुक्‍त कराया जा चुका है। इसी तरह मध्‍य प्रदेश से लगे कवर्धा जिला में भी लंबे समय से नक्‍सली घटना नहीं हुई है। महाराष्‍ट्र से लगे अविभाजित राजनांदगांव जिला में भी नक्‍सलवाद लगभग खात्‍मे की ओर है। ओडिशा से लगे गरियाबंद, धमतरी और रायगढ़ में अब नक्‍सली सिमट चुके हैं। तेलंगाना और आंधप्रदेश से बस्‍तर संभाग लगा हुआ है। नक्‍सल हिंसा के कारण सबसे ज्‍यादा प्रभावित यही क्षेत्र रहा है।

सुरक्षा बलों के टारगेट में बड़े नक्‍सली लीडर

पुलिस अफसरों के अनुसार मार्च 2026 तक देश से नक्‍सलवाद के खात्‍मे की डेड लाइन तय करने के साथ ही सरकार ने फोर्स के लिए टारगेट भी तय कर दिया था। फोर्स को नक्‍सलियों के 31 टॉप लीडर की सूची सौंपी गई है। इनमें पोलित ब्यूरो, सेंट्रल कमेटी के साथ रीजन और राज्‍यों की कमेटी के नक्‍सली लीडर शामिल हैं। इनमें से कुछ लीडरों को हाल ही में छत्‍तीसगढ़ पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान ढेर भी कर दिया है। इनमें नक्‍सली संगठन का सेंट्रल कमेटी का सदस्‍य और महासचिव बसव राजू भी शामिल है।

33 में से 14 जिले नक्‍सल प्रभावित

बस्‍तर को नक्‍सल मुक्‍त जिला घोषित किए जाने के बाद छत्‍तीसगढ़ के 33 में से 14 जिला अब भी प्रभावित हैं। इनमें बीजापुर, दंतेवाडा, सुकमा, धमतरी, गरियाबंद, कांकेर, कोंडागांव, महासमुंद और नारायणपुर के साथ राजनांदगांव, मोहला मानपुर अंबागढ़, खैरागढ़ छुईखदान गंडई, कबीरधाम और मुंगेली शामिल हैं।

पूरे देश में सिमट रहा नक्‍सलवाद

इसी साल मई में जारी केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में देश में नक्‍सलवाद के सिमटने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2024 में नक्सल विरोधी अभियानों की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, 2025 में चल रहे नक्सल विरोधी अभियानों के तहत सुरक्षा बलों ने पिछले 4 महीनों में 197 कट्टर नक्सलियों को ढेर किया है। 2014 में 35 जिले नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित थे और 2025 तक यह संख्या घटकर सिर्फ 6 रह गई है।

Exit mobile version