रायपुर। वर्षों तक नक्सलवाद की मार झेलते रहे बस्तर और छत्तीसगढ़ के अन्य प्रभावित इलाकों के लिए अब सरकार ने विकास की नई पटकथा लिखनी शुरू कर दी है। सुरक्षा मोर्चे पर लगातार बेहतर होती स्थिति के बीच अब फोकस उन गांवों और परिवारों पर है, जो लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहे। इसी दिशा में मुख्य सचिव विकास शील की अध्यक्षता में आयोजित राज्यस्तरीय परामर्श कार्यशाला में नक्सल प्रभावित जिलों के लिए आजीविका आधारित विकास का बड़ा खाका सामने रखा गया।
सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि अब नक्सल प्रभावित इलाकों में केवल बुनियादी ढांचा खड़ा करना ही लक्ष्य नहीं होगा, बल्कि वहां के परिवारों की आमदनी, रोजगार, बाजार से जुड़ाव और आत्मनिर्भरता को विकास का असली पैमाना बनाया जाएगा। यही वजह है कि वामपंथी उग्रवाद प्रभावित 8 जिलों के परिवारों की मासिक आय को अगले ढाई से तीन वर्षों में बढ़ाकर न्यूनतम 30 हजार रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
मुख्य सचिव विकास शील ने कार्यशाला में कहा कि जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से मुक्त हो रहा है, वैसे-वैसे सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ रही है। जिन इलाकों तक अब तक योजनाएं पूरी ताकत से नहीं पहुंच सकीं, वहां अब स्थायी और समावेशी विकास सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने सभी विभागों को समन्वित दृष्टिकोण अपनाते हुए अगले तीन वर्षों की ठोस कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए।
अब फोकस सिर्फ सुरक्षा नहीं, आजीविका पर भी
कार्यशाला का सबसे अहम संदेश यही रहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति को स्थायी बनाने के लिए लोगों की जिंदगी में आर्थिक बदलाव जरूरी है। सरकार अब ऐसे मॉडल पर काम करेगी, जिसमें स्थानीय संसाधनों के आधार पर रोजगार और आय के अवसर विकसित किए जाएं।
इस मॉडल में कृषि, पशुपालन, वनोपज, मत्स्य पालन, हस्तशिल्प और सूक्ष्म उद्यम को एक साथ जोड़कर गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत करने की योजना है। इसे क्लस्टर आधारित और ब्लॉक केंद्रित मॉडल के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि किसी एक क्षेत्र की स्थानीय ताकत को पहचानकर उसी के आधार पर विकास किया जा सके।
85 फीसदी परिवारों की आय 15 हजार से कम
कार्यशाला में सामने आए आंकड़े इस योजना की जरूरत को और मजबूत करते हैं। एनसीएईआर के सर्वे के अनुसार, एलडब्ल्यूई प्रभावित इलाकों के 85 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 15 हजार रुपये से कम है। यही वजह है कि सरकार अब सीधे आय बढ़ाने वाले मॉडल पर फोकस कर रही है।
योजना के तहत केवल अनुदान या पारंपरिक योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय परिवारों को कई स्रोतों से जोड़ने की रणनीति बनाई गई है। लक्ष्य यह है कि हर परिवार को कम से कम तीन अलग-अलग आजीविका गतिविधियों से जोड़ा जाए, ताकि उनकी आय स्थिर और टिकाऊ बन सके।
चार स्तंभों पर टिकेगा पूरा मॉडल
प्रमुख सचिव निहारिका बारीक ने बताया कि इस पूरी रणनीति का आधार चार स्तंभ होंगे—विविधीकरण, सामूहिकीकरण, प्रौद्योगिकी और संतृप्ति। यानी एक परिवार की आय सिर्फ एक काम पर निर्भर न रहे, समूह आधारित गतिविधियों को बढ़ावा मिले, तकनीक का इस्तेमाल बढ़े और योजनाओं का लाभ ज्यादा से ज्यादा पात्र परिवारों तक पहुंचे।
प्रत्येक जिले में चार प्रमुख आजीविका क्षेत्रों की पहचान कर वहां उसी हिसाब से योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाएगा। सरकार की कोशिश है कि विकास योजनाएं ऊपर से थोपी हुई न लगें, बल्कि वे स्थानीय जरूरतों और संभावनाओं से निकली हुई हों।
बाजार से जोड़ने पर सबसे ज्यादा जोर
सरकार ने यह भी साफ किया है कि केवल उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा। अगर ग्रामीण उत्पादों को सही बाजार नहीं मिला, तो आय वृद्धि का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा। इसलिए उत्पादन से लेकर विपणन तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की बात कार्यशाला में प्रमुखता से उठी।
नाबार्ड, एफईएस और प्रदान जैसे सहयोगी संगठनों ने भी लघु वनोपज मूल्य श्रृंखला, एफपीओ और बाजार उन्मुख मॉडल को मजबूत करने के सुझाव दिए। इसका उद्देश्य है कि बस्तर और अन्य प्रभावित इलाकों में तैयार होने वाले उत्पादों को बेहतर दाम, बेहतर पहुंच और स्थायी खरीदार मिल सकें।
60 दिनों में तैयार होगा अगला रोडमैप
कार्यशाला में अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि हर विकासखंड में संभावित आजीविका क्लस्टरों की पहचान कर 60 दिनों के भीतर विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जाए। इस योजना में सर्वे, स्थानीय संसाधनों का आकलन, गतिविधियों का चयन और क्रियान्वयन की स्पष्ट रूपरेखा शामिल होगी।
जिला, विकासखंड और क्लस्टर स्तर पर त्रिस्तरीय योजना निर्माण की व्यवस्था भी बनाई जाएगी, ताकि योजनाओं को कागज से निकालकर तेजी से जमीन पर उतारा जा सके।
बस्तर के लिए क्यों अहम है यह फैसला
बस्तर जैसे इलाकों में लंबे समय तक विकास की चर्चा सड़कों, पुलों और इमारतों तक सीमित रही। लेकिन अब सरकार जिस दिशा में बढ़ रही है, उसमें गांव के परिवार की आय, युवाओं का कौशल, स्थानीय उत्पादों का बाजार और समुदाय की आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखा गया है। यही वजह है कि यह पहल सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यशाला नहीं, बल्कि नक्सलवाद से उबरते बस्तर के लिए आर्थिक और सामाजिक पुनर्निर्माण का रोडमैप मानी जा रही है।
अगर यह मॉडल जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो बस्तर में विकास की कहानी केवल सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि गांव-गांव में दिखेगी।

