रायपुर । छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव (Arun Sao) से हाल ही में ‘भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ’ के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। प्रांतीय अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव के नेतृत्व में हुई इस बैठक में बुजुर्गों ने अपनी समस्याओं के साथ-साथ ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए पेंशनर्स की मांग (Pensioners Demand) को प्रमुखता से रखा।
क्रांतिकारी सुखदेव राज की विरासत को बचाने की अपील
प्रतिनिधिमंडल ने डिप्टी सीएम को बताया कि अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के साथी सुखदेव राज (Revolutionary Sukhdev Raj) ने अपने जीवन के अंतिम 10 साल दुर्ग में बिताए थे। जिस भवन में उन्होंने अंतिम सांस ली, वह आज जर्जर अवस्था में है।
मुख्य चिंताएं (Concerns):
- स्मारक का निर्माण: पेंशनर्स चाहते हैं कि सुखदेव राज की कर्मस्थली को एक भव्य स्मारक के रूप में विकसित किया जाए।
- भवन को खतरा: नगर निगम वहां मल्टीलेवल पार्किंग बनाने की योजना बना रहा है, जिससे इस ऐतिहासिक इमारत के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
- प्रतिमा स्थापना: यदि भवन को तोड़ा जाता है, तो पार्किंग के डिजाइन में क्रांतिकारी सुखदेव राज की प्रतिमा के लिए विशेष जगह (Provision) दी जाए।
पेंशनर्स भवन के लिए फंड की मांग (Financial Support)
इस मुलाकात (Meeting) के दौरान दूसरी बड़ी मांग दुर्ग में पेंशनर्स भवन के निर्माण को लेकर थी। प्रतिनिधिमंडल ने इसके लिए 6.50 लाख रुपये की राशि स्वीकृत करने का आग्रह किया।
क्यों जरूरी है यह भवन?
- सैकड़ों पेंशनर सदस्यों के पास बैठक के लिए कोई स्थायी जगह (Permanent Place) नहीं है।
- जगह के अभाव में बुजुर्गों को अक्सर खुले में मीटिंग करनी पड़ती है।
- महासंघ ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से इस प्रस्ताव (Proposal) पर विचार चल रहा है, जिसे अब अमलीजामा पहनाना जरूरी है।
डिप्टी सीएम का आश्वासन: वरिष्ठ नागरिकों की मांगों पर सरकार का रुख सकारात्मक दिख रहा है। उप मुख्यमंत्री ने आश्वासन (Assurance) दिया है कि दोनों ही मांगों पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी। यह कदम न केवल स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करेगा, बल्कि बुजुर्गों के प्रति सरकार की जवाबदेही (Accountability) भी तय करेगा।
प्रतिनिधिमंडल में ये रहे शामिल (Important Members)
इस महत्वपूर्ण चर्चा (Discussion) के दौरान महासंघ के कई प्रमुख चेहरे मौजूद थे:
- वीरेन्द्र नामदेव (प्रांतीय अध्यक्ष)
- राजेश तिवारी (संभागीय सचिव)
- पी.आर. साहू (दुर्ग जिला महासचिव)
- सुरेश साव
चतुर विचाार: स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को संजोने और बुजुर्गों की सुविधाओं को लेकर पेंशनर्स की मांग (Pensioners Demand) पर अब सबकी निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई (Next Action) पर टिकी हैं। क्या सरकार शहीद सुखदेव राज की यादों को संरक्षित कर पाएगी? यह आने वाला वक्त बताएगा।
“लेकिन कौन थे सुखदेव राज जिनके लिए बुजुर्ग पेंशनर्स इतने भावुक हैं? आइए जानते हैं उस क्रांतिकारी की अनसुनी कहानी जो 1931 के उस खौफनाक एनकाउंटर का गवाह था…”
27 फरवरी 1931… इलाहाबाद का अल्फर्ड पार्क। गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच पंडित चंद्रशेखर आजाद ने अपनी अंतिम गोली खुद को मार ली थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस मुठभेड़ (Encounter) के वक्त आजाद के साथ कौन बैठा था? वह शख्स थे क्रांतिकारी सुखदेव राज (Revolutionary Sukhdev Raj), जिन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी साल छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में गुमनामी और सेवा के बीच बिताए।
आजाद की वो आखिरी हिदायत (The Last Order)
सुखदेव राज अपने साथियों को अक्सर सुनाते थे कि उस दिन आजाद बहुत परेशान थे। जब पुलिस ने पार्क की घेराबंदी (Siege) शुरू की, तब आजाद ने सुखदेव राज को आदेश दिया कि वे तुरंत वहां से निकल जाएं ताकि क्रांति की ज्वाला जलती रहे। सुखदेव राज वहां से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहे, लेकिन उनके आंखों के सामने उनका सबसे अजीज दोस्त ‘आजाद’ शहीद हो गया।
लाहौर से दुर्ग तक का सफर (Journey from Lahore to Durg)
- जन्म: 8 दिसंबर 1906 को लाहौर के एक खत्री परिवार में।
- क्रांति का आगाज: पढ़ाई के दौरान महान क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा के संपर्क में आए।
- सजा-ए-कालापानी जैसा संघर्ष: क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें दो बार तीन-तीन साल की सजा हुई।
- विनोबा भावे का साथ: आजादी के बाद 1963 में वे आचार्य विनोबा भावे (Vinoba Bhave) के संपर्क में आए और उनके कहने पर कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए दुर्ग पहुंच गए।
दुर्ग में सेवा और अंतिम समय (Service in Durg)
सुखदेव राज ने दुर्ग के अंडा (Anda) गांव को अपनी कर्मस्थली बनाया। कोलिहापुरी के चंद्राकर परिवार ने कुष्ठ आश्रम के लिए 5 एकड़ जमीन दी, जहां सुखदेव राज ने 10 साल तक मरीजों की सेवा की। 1973 में इस महान क्रांतिकारी ने अंतिम सांस ली। उनकी यादें आज भी दुर्ग के ‘पंचशील स्टूडियो’ की पुरानी बैठकों में जिंदा हैं।
आज क्या है हाल? (Current Situation – A Bitter Truth)
दुख की बात यह है कि जिस क्रांतिकारी ने फिरंगियों के छक्के छुड़ा दिए, उनकी समाधि आज बदहाली (Dilapidated Condition) का शिकार है।
- प्रतिमा की दुर्दशा: 1976 में तत्कालीन सीएम श्यामा चरण शुक्ल और भगत सिंह के भाई कुलतार सिंह ने जिस प्रतिमा का अनावरण किया था, वह अब देखरेख के अभाव में खराब हो रही है।
- जमीन पर कब्जा: 5 एकड़ की वह ऐतिहासिक जमीन कहां गई, इसका आज कोई हिसाब नहीं है।
- गुमनाम इतिहास: यहाँ तक कि गूगल (Google) पर भी उनके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
Expert Insight: “ज्योति जगी” (Jyoti Jagi) नाम की पुस्तक सुखदेव राज के जीवन का सबसे बड़ा प्रमाण है, जो नागपुर से प्रकाशित हुई थी। प्रशासन की अनदेखी ने इस ऐतिहासिक दस्तावेज और विरासत को हाशिए पर धकेल दिया है।
पेंशनर्स की मांग क्यों है जायज?
अब जब पेंशनर्स महासंघ ने डिप्टी सीएम अरुण साव से मुलाकात की है, तो मुख्य मुद्दा यही है कि क्या हम अपने शहीदों की यादों को ‘मल्टीलेवल पार्किंग’ के नीचे दबने देंगे? सुखदेव राज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भारत की आजादी के उस संघर्ष का जीवंत हिस्सा (Living Proof) हैं जिसने हमें खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया।

