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इतिहास की अधूरी गवाहिया और विश्वरंजन: जानिए- सलवा जुडूम का सच और तत्‍कालीन DGP पर लगे आरोपों की जमीनी हकीकत

इतिहास की अदालत में गवाहियां अक्सर अधूरी होती हैं

लेखक: जयप्रकाश मानस

आज जब दुनिया ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच खिंची युद्ध की लकीरों को देख रही है, तो पक्षधरता की एक आंधी-सी चल पड़ी है। कुछ लोग इस तरफ़ के झंडे थामे खड़े हैं, कुछ उस तरफ़ के। हैरत यह है कि दोनों ही तरफ़ के लोग खुद को सत्य का एकमात्र वारिस समझते हैं। पर क्या सत्य इतना लचीला है कि वह दोनों तरफ़ हो सके? नहीं, सत्य की अपनी एक धुरी होती है और कोई एक ही उसके अधिक क़रीब खड़ा होता है।

ठीक इसी तरह की एक धुंध हमने तब देखी थी, जब हमारे अपने भूगोल के एक अशांत हिस्से यानी छत्तीसगढ़ में राज्य के पुलिस प्रमुख की ज़िम्मेदारी विश्वरंजन को सौंपी गई। वह एक ऐसा दौर था जब लोकतंत्र की परिभाषाएँ नक्सलवादी हिंसा और आदिवासी अंचलों के आतंक के बीच लहूलुहान हो रही थीं।

तब भी बुद्धिजीवियों, लेखकों और जनचिंतकों के कुनबे दो हिस्सों में बँट हुए थे। कुछ लोग हिंसा के पक्ष में तर्क गढ़ रहे थे, तो कुछ अहिंसा की ओट में खड़े थे। कहना चाहिए कि उस समय बहसों का एक बाज़ार गर्म था। सबके पास कहने, लिखने और सुनाने का मौलिक अधिकार था और उन्होंने उसका भरपूर इस्तेमाल भी किया।

लेकिन क्या केवल शोर मचाने से कोई अंतिम न्यायी हो जाता है? कविता की भाषा में कहें तो — इतिहास की अदालत में गवाहियाँ अक्सर अधूरी होती हैं।” वे दोनों पक्ष, जो खुद को सही साबित करने की होड़ में थे, न तो पूर्णतः सही थे और न ही अंतिम न्यायी। न्याय और सत्य का चेहरा उस शोर के पीछे कहीं दब गया था। असल में, जब समाज और सत्ता के बीच बंदूकों और विचारधाराओं की जंग छिड़ी हो, तो ‘सही’ होने का दावा करना सबसे बड़ी भूल है।

अंतिम न्याय वह नहीं जो अखबारों की सुर्खियों या बहसों में तय होता है, बल्कि वह है जो उन खामोश आदिवासियों के जीवन में घटित होता है, जो इन दोनों पाटों के बीच पिस रहे थे। और यह भी कि किसी के पास उनकी मुक्ति का कोई अंतिम रोड़मैप नहीं भी था । जनतांत्रिक फाइलों में कुछ उपायों के जुमले तो थे पर हिंसक क्रांति के बाद असली जनतंत्र की स्थापना के स्वप्नदर्शी क्रांतिकारियों के पास शायद कुछ भी नहीं । पक्षधरता के इस खेल में हम अक्सर भूल जाते हैं कि सत्य किसी एक खेमे की जागीर नहीं, बल्कि उस समय की सबसे बड़ी और सबसे कठिन चुनौती है।

समय का कोहरा और असत्य के स्वर

7 मार्च 2026 की रात, जब पटना के मेदांता अस्पताल में विश्वरंजन साहब के जीवन की लौ बुझी, तो शोक के साथ-साथ बौद्धिक जगत की एक अमानवीय और शर्मनाक स्थिति भी उजागर हुई। वे लोग, जो केवल ‘आदिवासी हितैषी’ होने का मुखौटा लगाकर वाचिक दायित्व का ‘स्वयंसेवी ठेका’ चलाते हैं, अपनी अज्ञानता और पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया के चौराहों पर उतर आए। बिना किसी पुष्ट जानकारी के, उन्होंने असत्य को सत्य की तरह परोसना शुरू कर दिया।

इतिहास की तोड़-मरोड़ और सलवा जुडूम

इन तथाकथित ‘ज्ञानी’ टिप्पणीकारों का सबसे बड़ा भ्रम यह रहा कि जैसे नक्सलियों के विरुद्ध ‘सलवा जुडूम’ का आगाज़ तत्कालीन पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ने ही किया हो। वे बड़ी चतुराई से इस ऐतिहासिक तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए कि ‘सलवा जुडूम’ दरअसल एक राजनीतिक मिशन था—तत्कालीन कांग्रेसी सांसद महेंद्र कर्मा और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सहमति का प्रतिफल।

विश्वरंजन पर इसका ठीकरा फोड़ना न केवल तथ्यहीन था, बल्कि यह उस औसत दर्जे की सोच का परियचक है जिसे ‘सत्ता’ और ‘तंत्र’ के बीच का महीन अंतर कभी समझ नहीं आता। लोकतांत्रिक मुल्कों में एक सरकारी कारिंदा नीति-निर्धारक नहीं, बल्कि नीति-पालक होता है। उस आसंदी पर विश्वरंजन नहीं होते, कोई औऱ होता, वही करता जैसी व्यवस्था चाह रही थी । आज उन दिनों वाले आदिवासी हितैषी कहाँ चले गये ? क्यों उन्हें साँप सूँघ गया है – जब प्रदेश से नक्सलवाद की देह पर अंतिम कील ठोंकी जा रही है । दरअसल उन्हें आदिवासी हित से कोई लेना देना ही न था तब और न ही अब ।

विचार बनाम वर्दी: विरोध का असली केंद्र

विश्वरंजन के प्रति इस व्यक्तिगत विरोध की जड़ें उनके वर्दीधारी होने में नहीं, बल्कि उनके निर्द्वंद्व सहनशीलता, वैचारिकता और ‘विद्वान साहित्यकार’ होने में थीं। मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा और हरिशंकर परसाई जैसे महान कलमकारों के सखा रहे डॉ. प्रमोद वर्मा की स्मृति में ‘प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान’ के माध्यम से जब उन्होंने राज्य की सांस्कृतिक चेतना को नया आयाम देना चाहा, तो एक खास तबका तिलमिला उठा था।

विरोधी स्वर उठे थे — “साहित्य में पुलिस का क्या काम?” सच्चाई यह थी कि यह विरोध उन लोगों की ओर से था जिन्हें उस बौद्धिक और सांस्कृतिक विमर्श में वह ‘तवज्जो’ नहीं मिली जिसकी वे अपेक्षा रखते थे। स्थानीय स्तर पर दुर्ग के कुछ ‘स्वयंभू’ लेखकों ने इस विरोध को हवा दी, क्योंकि उनके लिए साहित्य साधना नहीं, बल्कि स्व-प्रतिष्ठा का ज़रिया था।

जब बौद्धिक विमर्श व्यक्तिगत कुंठाओं की भेंट चढ़ने लगे, तो सत्य का चेहरा धुंधला हो जाता है। विश्वरंजन का विरोध दरअसल उस श्रेष्ठता का विरोध था जो सत्ता की सीमाओं के भीतर रहकर भी संस्कृति और वैचारिकता का दीया जलाए रखना चाहती थी। यह विडंबना ही है कि जो लोग खुद को जनचिंतक कहते हैं, वे ही एक व्यक्ति के निधन के समय सबसे अधिक संवेदनहीन और अतार्किक साबित हुए।

लोकतांत्रिक शुचिता के प्रति अटूट निष्ठा

बहरहाल…. विश्वरंजन जी लोकतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों के प्रति केवल आस्था ही नहीं रखते थे, बल्कि वे स्वयं उन मूल्यों के जीवंत प्रतिमान थे। वे एक ऐसी ‘माटी’ से निर्मित थे, जहाँ शक्ति और विनम्रता का अद्भुत सह-अस्तित्व था। राज्य के सर्वोच्च सुरक्षा पद पर आसीन होने के बावजूद, उनके भीतर सत्ता का मद कभी प्रवेश नहीं कर पाया।

आलोचना के प्रति साधुतापूर्ण दृष्टिकोण

उनकी महानता का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि किसी भी कथित विरोधी या टीकाकार की ‘असंसदीय’ और यहाँ तक कि ‘हिंसक मंशा’ वाली टिप्पणियों को भी उन्होंने कभी व्यक्तिगत नहीं लिया। जहाँ आम तौर पर शक्तिसंपन्न व्यक्ति विरोध को कुचलने या वाचिक कुंठा व्यक्त करने का मार्ग चुनते हैं, वहाँ विश्वरंजन जी ने कभी अपनी गरिमा से समझौता नहीं किया। उनके आचरण में न तो कोई कायिक आक्रामकता थी और न ही शब्दों की कड़वाहट।

मौन की प्रखरता और तटस्थता

वे हर तरह के विचारों—चाहे वे उनके समर्थन में हों या तीव्र विरोध में—पर पूर्णतः मौन और तटस्थ होकर विचार करते थे। उनका यह मौन उनकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उनकी वैचारिक प्रखरता का सूचक था। वे प्रतिक्रिया देने के बजाय ‘प्रतिसाद’ देने में विश्वास रखते थे। उनकी यह ‘तटस्थता’ उन्हें एक सामान्य पुलिस अधिकारी से ऊपर उठाकर एक ऐसे ‘प्रशासक-मनीषी’ की श्रेणी में खड़ा करती है, जो समय के शोर के बीच भी अपना संतुलन बनाए रखना जानता था।

एक ऐतिहासिक विडंबना और मानवीय सेतु

इतिहास की विडंबना देखिए कि जिस समय छत्तीसगढ़ का बस्तर और मैदानी इलाका वैचारिक संघर्ष और हिंसा की आग में झुलस रहा था, उसी समय दुर्ग की एक जेल में संवाद की एक झीनी-सी पगडंडी तैयार हो रही थी। अजय टी.जी. की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की कैद नहीं थी, बल्कि वह ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ के प्रोफेसर जोनाथन पैरी जैसे अकादमिक जगत के लिए एक विचलित कर देने वाली घटना थी।

छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित पत्रकार और संपादक सुनील कुमार बताते हैं : जब जोनाथन पैरी ने मुझसे अजय की गिरफ्तारी पर अपनी चिंता साझा की तो मैंने अपने पुराने मित्र होने के नाते विश्वरंजन जी को बताया । उन्होंने उसे केवल एक ‘पुलिस फाइल’ की तरह नहीं देखा। अगले ही दिन एक डीजीपी का खुद चलकर जेल जाना और एक विचाराधीन कैदी से मुलाक़ात करना, भारतीय पुलिसिंग के इतिहास में एक ‘अनहोनी’ जैसी घटना थी।

विश्वरंजन जानते थे कि कानून अपनी जगह है और न्याय प्रक्रिया अपनी गति से चलेगी, इसलिए उन्होंने केस में हस्तक्षेप नहीं किया। लेकिन उन्होंने उस ‘मनुष्य’ को पहचान लिया जो सलाखों के पीछे रहकर भी ‘अच्छी किताबों’ की प्यास रखता था। जब अजय टी.जी. ने जेल में पढ़ने के लिए किताबों की इच्छा ज़ाहिर की, तो विश्वरंजन ने सरकारी तंत्र से किताबें नहीं मंगवाईं, बल्कि अपनी ‘निजी लाइब्रेरी’ के द्वार खोल दिए। अपनी पसंदीदा किताबें एक ऐसे व्यक्ति को भेज देना, जो आपकी व्यवस्था द्वारा ही बंदी बनाया गया हो—यह केवल एक ‘विद्वान’ ही कर सकता था।

वे किताबें केवल काग़ज़ के पन्ने नहीं थे, वे वैचारिक स्वतंत्रता का वह संदेश थे जो यह बताते थे कि – विचारों की जंग बंदूकों से नहीं, संवाद से जीती जाती है। बंदी शरीर को बनाया जा सकता है, प्रज्ञा को नहीं। एक पुलिस अधिकारी अपने कर्तव्य के प्रति जितना निष्ठुर हो सकता है, एक साहित्यकार के रूप में वह उतना ही उदार भी हो सकता है।

उपहार की राजनीति और एक इनकारकी नैतिकता

एक बार प्रदेश के एक बड़े आयोजन के दौरान विभाग में यह विचार उभरा कि पक्ष और विपक्ष के तमाम विधायकों को पुलिस विभाग की ओर से एक विशिष्ट वार्षिक ‘स्मृति चिह्न’ या कीमती उपहार भेंट किया जाए। प्रशासनिक गलियारों में इसे एक ‘सद्भावना’ की पहल के रूप में देखा जा रहा था, जिस पर एक बड़ी धनराशि व्यय होनी थी। चूंकि विभाग के मुखिया विश्वरंजन थे, इसलिए फाइल उनकी औपचारिक सहमति के लिए मेज पर पहुँची। अपेक्षा यही थी कि वे भी अन्य प्रशासनिक प्रमुखों की तरह इस परिपाटी को आगे बढ़ा देंगे।

प्रस्ताव सुनते ही विश्वरंजन के चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कुराहट तैर गई। उन्होंने फाइल पर हस्ताक्षर करने के बजाय एक ऐसी बात कही, जो आज के दौर में किसी ‘प्रशासनिक दर्शन’ से कम नहीं है। उन्होंने कहा: ऐसी परंपराओं को बिलकुल विकसित मत होने दीजिए। यह उपहार नहीं, बल्कि सत्ता और तंत्र के बीच की एक अघोषित सांठगांठजैसा दिखाई देगा।”

उनका तर्क स्पष्ट था—पुलिस विभाग का काम कानून का शासन स्थापित करना है, न कि राजनीतिक वर्ग के साथ ‘उपहारों’ के माध्यम से मधुर संबंध बनाना। वे जानते थे कि जब ‘उपहार’ और ‘अनुग्रह’ की अदला-बदली शुरू होती है, तो निष्पक्षता की नींव हिलने लगती है। उन्होंने बेहद विनम्रता लेकिन उतनी ही दृढ़ता के साथ उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

विश्वरंजन का यह निर्णय यह बताता है कि एक सच्चा अधिकारी वही है जो जानता हो कि कहाँ रुकना है। उनके लिए पद की गरिमा उपहारों के लेन-देन में नहीं, बल्कि दूरी बनाए रखने की उस शुचिता में थी, जो लोकतंत्र के दो अलग-अलग स्तंभों (विधायिका और कार्यपालिका) को अपनी-अपनी मर्यादा में रखती है। यह घटना साबित करती है कि वे केवल एक ‘पुलिस कप्तान’ नहीं, बल्कि एक ‘संवैधानिक प्रहरी’ भी थे।

पारदर्शिता का साहस

विश्वरंजन संभवतः उन विरल पुलिस महानिदेशकों में से थे, जिन्होंने ‘अधिकार’ और ‘अहं’ के बीच की खाई को पाट दिया था। एक ऐसे पद पर, जहाँ गोपनीयता और दूरी को ही अक्सर सुरक्षा का मानक मान लिया जाता है, वहाँ उनका कोई भी दरवाजा कभी किसी पत्रकार के लिए बंद नहीं रहा। वे केवल मिलते ही नहीं थे, बल्कि तकनीकी और रणनीतिक बारीकियों को इतनी सहजता से समझाते थे कि जटिल से जटिल मुद्दा भी पारदर्शी हो जाता था। शर्त बस एक थी—राष्ट्र और राज्य की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।

यह खुलापन शायद उस अनुभव की देन था, जो उन्होंने भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के सर्वोच्च पदों पर रहते हुए अर्जित किया था। वे जानते थे कि सूचनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें सही संदर्भ में साझा करना ही लोकतंत्र को मज़बूत बनाता है। वे ‘चौथे स्तंभ’ के न केवल समर्थक थे, बल्कि उसके प्रहरी भी थे।

अहं-शून्य संवाद: शत्रुके प्रति भी न्यायपूर्ण दृष्टि

उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका ‘संकोच-रहित’ व्यक्तित्व था। पद का कोई भारीपन उनके व्यवहार में कभी आड़े नहीं आया। वे किसी भी जिज्ञासु या पीड़ित से उसी आत्मीयता से मिलते थे, जिससे किसी पुराने मित्र से। यहाँ तक कि यदि उनके सामने कोई घोषित ‘नक्सल-हितैषी’ भी खड़ा होता, तो वे उसे किसी पूर्वाग्रह से नहीं देखते थे। उनकी शब्दावली में शायद ही तुम या तड़ाक था । वे सदैव हर छोटे-बड़े को ‘आप’ के संबोधन से बतियाने तैयार रहते थे । इसके मूल में थी जनतांत्रिक उत्तरदायित्व की संस्कारित चेतना और उस पर अटूट विश्वास ।

विश्वरंजन के इस व्यवहार को वे लोग कभी नहीं समझ सकते, जो सत्ता को केवल ‘दमन’ और ‘दूरी’ के चश्मे से देखने के आदी हैं। जो लोग आदतन एक तयशुदा ढर्रे पर सोचते हैं, उनके लिए एक डीजीपी का इतना सहज होना किसी पहेली जैसा हो सकता है। असल में, उनका यह आचरण उस परिपक्वता का प्रमाण था, जहाँ शक्ति स्वयं को प्रदर्शन में नहीं, बल्कि ‘लोक-संवाद’ और ‘लोक-कल्याण’ में सार्थक मानती है।

वे देश के उन विरल और शीर्षस्थ सुरक्षा विशेषज्ञों में से थे, जिनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा निर्विवाद रही। उनके करियर का फलक अत्यंत व्यापक था, जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मिशनों का सफ़ल नेतृत्व किया। वे केवल एक पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि रणनीतिक कौशल और अडिग सिद्धांतों के मेल थे।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विश्वरंजन जी छत्तीसगढ़ में केवल ‘डीजीपी’ का पद संभालने की आकांक्षा लेकर नहीं आए थे। उनकी सेवाओं और विशेषज्ञता की आवश्यकता को देखते हुए, तत्कालीन राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से विशेष आग्रह और अनुनय करके उन्हें प्रतिनियुक्ति पर राज्य में बुलाया था। उनका यहाँ आना किसी प्रशासनिक फेरबदल का हिस्सा नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा चुनौतियों के समाधान हेतु एक सोची-समझी रणनीतिक आवश्यकता थी। उनका पूरा कार्यकाल यह दर्शाता है कि वे ‘पद’ के पीछे नहीं, बल्कि ‘दायित्व’ के पीछे चलते थे।

S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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