
रायपुर । छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े कथित भ्रष्टाचार ‘शराब घोटाला’ (Liquor Scam) की परतें एक बार फिर खुलनी शुरू हो गई हैं। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने ताज़ा कार्रवाई में उन 16 वाहनों को ज़ब्त किया है, जो इस अवैध साम्राज्य की रीढ़ थे। यह घोटाला केवल पैसों की हेराफेरी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था के भीतर एक समानांतर सरकार चलाने की कोशिश थी।
ताज़ा कार्रवाई: 16 गाड़ियों की ज़ब्ती और ‘पार्ट-B’ का खुलासा
हालिया जांच में ACB-EOW ने बिलासपुर की वेलकम डिस्टिलरी और मुंगेली की भाटिया वाइंस डिस्टिलरी से 16 गाड़ियाँ ज़ब्त की हैं। जांच में सामने आया कि ये गाड़ियाँ डिस्टिलरी मालिकों के कर्मचारियों और भरोसेमंद लोगों के नाम पर थीं। इन गाड़ियों का काम था— डिस्टिलरी से बिना रिकॉर्ड वाली ‘पार्ट-B’ शराब को सीधे सरकारी दुकानों तक पहुँचाना।
क्या है पार्ट-B शराब का गणित? सामान्यतः शराब ‘पार्ट-A’ होती है, जिसका टैक्स सरकार को मिलता है। लेकिन ‘पार्ट-B’ वह शराब थी जो सरकारी दुकानों पर बिकती तो थी, लेकिन उसका पैसा सरकारी खजाने के बजाय ‘सिंडिकेट’ की जेब में जाता था। इसके लिए नकली होलोग्राम का इस्तेमाल किया गया और सरकारी वेयरहाउस को बायपास कर दिया गया।
सिंडिकेट के वो ‘चेहरे’ जिन्होंने बुना जाल
इस पूरे घोटाले को चलाने के लिए चार प्रमुख स्तंभों ने काम किया:
- अनिल टुटेजा (पूर्व IAS): इन्हें घोटाले का ‘आर्किटेक्ट’ माना जाता है, जिन्होंने नीतिगत स्तर पर बदलाव किए।
- अनवर ढेबर: सिंडिकेट के ‘किंगपिन’, जिन्होंने कैश कलेक्शन और ग्राउंड ऑपरेशन संभाला।
- निरंजन दास (पूर्व MD, CSMCL): विभाग के भीतर से सुरक्षा कवच प्रदान किया।
- अरुणपति त्रिपाठी: लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को मैनेज किया।
क्रोनोलॉजी: 2019 की प्लानिंग से 2026 की कार्रवाई तक
- 2019-20: घोटाले की नींव रखी गई और ‘पार्ट-B’ का ट्रायल शुरू हुआ।
- 2022: आयकर विभाग की छापेमारी में भ्रष्टाचार के पहले ठोस सबूत मिले।
- 2023: ED की एंट्री हुई और अनवर ढेबर समेत कई रसूखदार जेल पहुँचे।
- 2024: छत्तीसगढ़ में सत्ता बदली और जांच ACB/EOW को सौंपी गई।
- 2026: अब डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों के आधार पर गाड़ियों और संपत्तियों की ज़ब्ती जारी है।
निष्कर्ष: सरकारी खजाने को करोड़ों की चपत
इस घोटाले ने न केवल छत्तीसगढ़ के राजस्व को नुकसान पहुँचाया, बल्कि प्रशासनिक साख को भी चोट पहुंचाई। 2000 करोड़ का यह आंकड़ा केवल शुरुआती अनुमान है, जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, नए खुलासे हो रहे हैं। फिलहाल, केडिया डिस्टिलरी और अन्य ट्रांसपोर्टरों पर भी जांच की तलवार लटकी हुई है।







