Tariff रायपुर। छत्तीसगढ़ में बिजली की नई दरें तय करने की प्रक्रिया चल रही है। बिजली कंपनियों की तरफ से मिले प्रस्ताव पर विद्युत नियामक आयोग की जनसुनवाई के अंतिम दिन शुक्रवार को पावर कंपनी के कर्मचारी संगठनों ने अपना पक्ष रखा। इसमें ज्यादा सेवानिवृत्त अधिकारी, कर्मचारी और इंजीनियर और उनके संगठन शामिल हुए।
जनसुनवाई में पहुंचे सेवानिवृत्त विद्युत कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण देवांगन ने पावर कंपनी प्रबंधन पर तीखा हमला बोला। महासंघ की तरफ से प्रदेश महामंत्री पीआर साहू के साथ आयोग के सामने पक्ष रखते हुए अरुण देवांगन ने कहा कि कंपनी के एमडी और चेयरमैन के पास कर्मचारियों की समस्या और बात सुनने का समय नहीं है। इस दौरान उन्होंने कर्मचारियों से वसूली और नया रायपुर में नया मुख्यालय भवन बनाए जाने का विरोध किया।
तथ्य: CSPDCL द्वारा प्रस्तुत टैरिफ याचिका में वितरण हानियों (Distribution Losses) को नियंत्रित करने में विफलता स्पष्ट दिखाई दे रही है। हम आपका ध्यान पिछले वर्ष की टैरिफ पिटिशन के तथ्यों की ध्यान देंगे तो ज्ञात होता है कि आयोग द्वारा 15.33% निर्धारित लक्ष्य के विरूद्ध 17-42% जाना बताया गया था जबकि इस वर्ष आयोग द्वारा निर्धारित 15% के लक्ष्य के विरूद्ध 16.4 कंपनी ने लक्ष्य से अधिक लाइन लॉस दिखाया है, हालांकि कंपनी द्वारा जारी आंकडों का वि विश्लेषण किया जाना आवश्यक है क्योंकि मैदानी क्षेत्र में जिस तरह की अव्यवस्था व्याप्त है प्रबंधन की नाकामी का सबूत है, जिसका सीधा बोझ ईमानदार उपभोक्ताओं के परा डाला जा रहा है। हमारी आपत्तियां
नियामक आयोग द्वारा निर्धारित लॉस रिडक्शन ट्रेजक्टरी का पालन करने में कंपनी विफल रही है। यदि अपनी बिजली चोरी रोकने और तकनीकी सुधार करने में अक्षम है, तो उसकी अक्षमता का आर्थिक दंड (वित्तीय घाटा) टैरिफ बढ़ाकर आम जनता और पेंशनभोगियों से क्यों वसूला जा रहा है?
एक तरफ कंपनी हजारों करोड़ रुपए स्मार्ट मीटर और आईटी सिस्टम (SAP) पर खर्च कर रही है, जिसका उद्देश्य लाइन लॉस कम करना बताया गया था। उसक बावजूद यदि लाइन लॉस में अपेक्षित कमी नहीं आई है, तो यह निवेश पूरी तरह से अनुत्पादक व्यय (Unproductive Expenditure) है।
कंपनी ने बड़ी संख्या में कृषि पंपों और ग्रामीण क्षेत्रों में मीटरिंग नहीं की है. जिसके कारण अघोषित लॉस (Unaccounted Losa) को लाइन लॉस के नाम पर छुपाया जाता है। यह डेटा का हेरफेर हैं।
पुराने हो चुके ट्रांसफार्मर और जर्जर तारों के कारण तकनीकी लॉस बढ़ रहा है। कंपनी नए प्रशासनिक भवनों पर 500 करोड़ खर्च करने के बजाय इस राशि का उपयोग वितरण ढांचे (Infrastructure) को मजबूत करने में क्यों नहीं करती?
महासंघ ने कहा कि आयोग से निवेदन है कि कंपनी द्वारा दिखाए गए अतिरिक्त लाइन लॉस को Disallow किल्या जाए।
केवल मानक लॉस’ (Normative Loss) की ही अनुमति दी जाए। कंपनी की अकुशलता के कारण होते वाले वित्तीय घाटे को रेवेन्यू रिक्वायरमेंट (ARR) का हिस्सा न बताया जाए।
आयोग कंपनी को आदेशित करे कि वह क्षेत्रवार (Fooder-wise) लाइन तॉस का डेटा सार्वजनिक करें और जवाबदेही तय करे।
तथ्य: CSPDCL में Class I और Class II (अधिकारी अभियंता) के 100% पद भरे हुए है, जवाक विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले Class III और Class IV (तकनीकी एवं मैदानी अमता) के 60 ते अधिक पद रिक्त हैं।
आपत्तिः बिना पर्याप्त लाइन स्टाफ और ऑपरेटरों के मैदानी व्यवस्था अकुशल आउटसोर्स श्रमिकों के भरोसे है। टैरिफ में ‘Employee Cost’ केवल अधिकारियों के लिए नहीं, बल्कि मैदानी व्यपण की नियमित भर्ती के लिए स्वीकृत होनी चाहिए। प्रबंधन पिछले 5 वर्षों का आउटसोर्सिंग बर्च और श्रेणीवार पदों का डेटा सार्वजनिक करे।
तथ्यः केवल रामपुर ही नहीं, बल्कि प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में लगातार हो रहीं आगजनी की घटनाएं और करोड़ों के उपकरणों का जलना CSPDCL और CSPTCL के प्रबंधन की आपराधिक लापरवाही को दर्शाता है।
रायपुर स्टोर: 05.04.2024 को भीषण आगजनी, जिसमें 50 करोड़ से अधिक की हानि हुई। 2012 की सुरक्षा सिफारिशों की अनदेखी की गई।
रायगढ़ एरिया स्टोरः रायपुर जैसी घटना की पुनरावृत्ति रायगढ़ स्टोर में भी हुई, जहाँ सुरक्षा मानकों के अभाव में भारी नुकसान हुआ।
राजनांदगांव (पुराना ट्रांसफार्मर यार्ड): यहाँ भी सुरक्षा उपायों की कमी के कारण यार्ड में रखे पुराने ट्रांसफार्मरों में भीषण आग लगी।
मोपका (विलासपुर) 132 KV सब-स्टेशनः यहाँ रखरखाव (Maintenance) के अभाव में करोड़ों रुपये की लागत के पावर ट्रांसफार्मर पूरी तरह जलकर खाक हो गए।
रखरखाव (Maintenance) में विफलताः मोपका जैसी घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि ट्रांसफार्मरों का समय पर ‘ऑयल टेस्टिंग और ‘प्रिवेटिव मेंटेनेंस नहीं किया गया। करोड़ों के सार्वजनिक धन की हानि केवल विभागीय लापरवाही के कारण हुई है।
सुरक्षा ऑडिट का अभावः बार-बार हो रही आगजनी यह प्रमाणित करती है कि कंपनी ने अपने स्टोर पार्ड और सब-स्टेशनों का ‘फायर सेफ्टी ऑडिट नहीं कराया और न ही वहां प्रशिक्षित सुरक्षा गार्ड नियुक्त किए।
नियामक सिद्धांत (Regulatory Principle): नियामक नियमों के अनुसार, “Imprudent Expenses” और “Losses due to Negligence” (लापरवाही से हुई हानि) की भरपाई टैरिफ के माध्यम से उपभोक्ताओं से नहीं की जा सकती।
आयोग रायपुर, रायगढ़, राजनांदगांव और मोपका की घटनाओं की एक स्वतंत्र उच्च स्तरीय तकनीकी जांच (Independent Technical Audit) कराए।
इन घटनाओं से हुई करोड़ों की वित्तीय हानि को कंपनी के ‘पूंजीगत लाभ (Return on Equity) से काटा जाए, न कि इसे पूंजीगत व्यय’ (CAPEX) या ‘राजस्व आवश्यकता (ARR) में शामिल कर उपभोक्ताओं पर बोझ डाला जाए।
रखरखाव के नाम पर कागजों में खर्च किए गए करोड़ों रुपयों की जांच की जाए कि वास्तव में मोपका जैसे सब-स्टेशनों पर काम हुआ या नहीं।
तथ्यः स्मार्ट मीटरिंग के नाम पर निकाले गए लाखों ‘स्वस्थ मीटरों’ (Healthy Meters) को कबाड़ में फेंका जा रहा है।
आपत्तिः एक तरफ कृषि पंप और कई घरेलू कनेक्शन बिना मीटर के (Unmetered) चल रहे हैं, जिससे राजस्व हानि हो रही है, दूसरी तरफ चालू मीटरों को नष्ट किया जा रहा है। इन मीटरों को तुरंत कृषि क्षेत्र में लगाकर राजस्व चोरी रोकी जाए। या इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लाइन लॉस छुपाने का माध्यम बनने वाले अनमीटर्ड/स्टाप डिफेक्टिव मीटर की जगह शत प्रतिशत सही मीटर लगाये जाने से वास्तविकता सामने आ सकेगा ।
मांगः सेवानिवृत्त कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित करने हेतु पेंशन भुगतान को राजस्व से जोड़कर ‘Escrow Account’ बनाया जाए। पेंशन फंड का अंशदान ‘Actuarial Valuation’ के आधार पर सुनिश्चित हो ताकि भुगतान में कभी बाधा न आए।
तथ्य: 2018-2025 के बीच छत्तीसगढ़ शासन की ‘हाफ बिजली बिल (50% सब्सिडी) योजना का लाभबिजली कर्मचारियों को नहीं दिया गया।
आपत्तिः इस भेदभाव के कारण CSPDCL शासन से करोड़ों की सब्सिडी राशि क्लेम (Claim) नहीं कर सका। प्रबंधन की इस वित्तीय अदुरदर्शिता का दंड उपभोक्ताओं और कर्मचारियों को क्यों मिले
राज्य शासन की हाफ बिजली बिल योजना (400 यूनिट तक 50% छूट) का लाभ विद्युत कर्मियों और पेंशनभोगियों को नहीं दिया जा रहा है।
SAP और IT सिस्टम पर करोड़ों खर्च के बाद भी पिछले 15 वर्षों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को गलत बिलिंग (25% के स्थान पर 50% छूट) दी गई। अब अचानक बिना किसी नोटिस के 1950 पेंशनभोगियों से भारी एरियर की वसूली की जा रही है और भुगतान न करने पर लाइन काटने की धमकी दी जा रही है।
विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 56(2) के अनुसार, 2 वर्ष से अधिक पुराने किसी भी एरियर की वसूली कानूनी रूप से वर्जित है। अतः यह अवैध वसूली तत्काल रोकी जाए।
आपत्तिः पूर्ववर्ती विद्युत मंडल व वर्तमान कंपनीज से सेवानिवृत्त 1950 कर्मचारियों नियमानुसार दी जाने वाली 25% के स्थान पर 50% बिजली देने के लिए प्रबंधन की कार्यप्रणाली दोषी है जिसके लिए सेवानिवृत्तों को दोषी ठहराकर नियम विपरीत सीधे नियमित बिल में जोड़कर लाइन काटने की धमकी दिया जाना सरासर अनुचित है।
यह राजस्व लिकेज में प्रबंधन की विफलता का जीवंत प्रमाण भी है। साथ ही विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 56 (2) का भी उल्लंघन है जिसमें दो वर्ष पूर्व सनी बकाया राशि की वसूली को अवैधानिक बताया गया है। इस संबंध में न तो कंपनी ने कोई गाईडलाइन जारी किया है और न ही इसके लिए किसी कि जिम्मेदारी तय की है। पिछली राशि की अवैध वसूली (Recovery) तुरंत बंद की जाए, क्योंकि यह मूल सेवा शर्तों का उल्लंघन है।
यहां यह तथ्य भी लाना चाहेंगे कि वर्ष 2018 से वर्ष 2025 मार्च तक राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के समस्त घरेलू उपभोक्ताओं को 400 यूनिट तक मुफ्त हाफ बिजली योजना प्रारंभकी गई थी जिसका लाभ विद्युत कर्मचारियों/ सेवानिवृत्तों को प्रदान नहीं किया गया, यह भी राजस्व कुप्रबंधन का प्रमाण है।
आपत्तिः लाखों डिफेक्टिव मीटरों के कारण हो रही ‘औसत बिलिंग’ और गलत असेसमेंट उपभोक्ताओं का शोषण कर रहे हैं। जब तक 100% सही मीटरिंग सुनिश्चित न हो, तब तक टैरिफ वृद्धि का कोई नैतिक आधार नहीं है।
जवाबदेहीः स्टोर अग्निकांड की स्वतंत्र जांच कर दोषियों से नुकसान की वसूली हो।
समानताः बिजली कर्मचारियों को भी शासन की 50% सब्सिडी का लाभ पिछली तिथि से दिया जाए।
नियमित भर्ती: Class III और IV के रिक्त पदों पर तत्काल नियमित भर्ती का रोडमैप तैयार हो।
संसाधन उपयोगः कबाड़ किए जा रहे स्वस्थ मीटरों को तुरंत कृषि पंपों में अनिवार्य रूप से लगाया जाए।
सुरक्षाः पेंशन भुगतान हेतु ‘Escrow Account’ का प्रावधान टैरिफ आदेश में अनिवार्य रूप से शामिल हो।
तथ्यः CSPDCL द्वारा प्रदेश में करोड़ों की लागत से स्मार्ट मीटर लगाने का प्रस्ताव दिया गया है। इस योजना की पारदर्शिता और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले इसके आर्थिक प्रभाव को लेकर महासंघ निम्नलिखित आपत्तियां दर्ज करता है:
हमें आशंका है कि स्मार्ट मीटरों की खरीदी बाजार दर से काफी अधिक कीमतों पर की गई है या प्रस्तावित है। माननीय आयोग से निवेदन है कि इस खरीदी प्रक्रिया का ‘विशेष ऑडिट’ कराया जाए और यह जांचा जाए कि क्या ‘प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive Bidding) के नियमों का कड़ाई से पालन हुआ है। यदि अधिक कीमत पर खरीदी की गई है, तो उस अतिरिक्त बोझ को ‘पूंजीगत व्यय’ (CAPEX) के रूप में टैरिफ में शामिल न किया जाए।
स्मार्ट मीटर की अत्यधिक लागत के कारण कंपनी भविष्य में इसके ‘मीटर रेंट’ में बड़ी वृद्धि करने की योजना बना रही है। यह उन उपभोक्ताओं के साथ घोर अन्याय है जिनकी मासिक खपत बहुत कम है।
छत्तीसगढ़ में ‘हाफ बिजली बिल योजना’ के कारण लगभग 50% से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं का मासिक विल मात्र 90 से 100 रुपये के बीच आता है। ऐसी स्थिति में यदि स्मार्ट मीटर के नाम पर 50 से 70 रुपये प्रतिमाह का रेंट वसूला जाता है, तो उपभोक्ता का कुल बिल लगभग 60-70% बढ़ जाएगा। यह विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 61(d) के विरुद्ध है, जो उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश देती है।
जब वर्तमान में लगे इलेक्ट्रॉनिक मीटर सही ढंग से कार्य कर रहे हैं, तो उन्हें जबरन हटाकर महंगे स्मार्ट मीटर लगाना जनता के पैसे की बर्बादी है। कंपनी को प्राथमिकता के आधार पर उन क्षेत्रों में मीटर लगाने चाहिए जहाँ मीटर खराब हैं या जहाँ मीटरिंग ही नहीं हुई है (जैसे कृषि उपभोक्ता), न कि अच्छे चल रहे मीटरों को बदलना चाहिए।
आयोग कंपनी को निर्देश दे कि स्मार्ट मीटर की खरीदी लागत और अन्य राज्यों में इसके प्रचलित दरों का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाए।
निम्न आय वर्ग के उपभोक्ताओं (बीपीएल एवं 100 यूनिट से कम खपत वाले) के लिए ‘मीटर रेंट’ की अधिकतम सीमा (Cap) तय की जाए, ताकि उन पर आर्थिक प्रहार न हो।
स्मार्ट मीटर योजना के क्रियान्वयन से पहले इसका ‘लागत-लाभ विश्लेषण’ (Cost-Benefit Analysis) आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।