
UPDATE नवा रायपुर। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए राज्य सरकार ने प्रशासनिक तंत्र में बहुत बड़ा फेरबदल किया है। सामान्य प्रशासन विभाग (General Administration Department – GAD) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत दागी और भ्रष्ट लोक सेवकों के खिलाफ जांच, पूछताछ और अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Approval) की पूरी व्यवस्था को पूरी तरह से री-स्ट्रक्चर (युक्तियुक्तकरण) कर दिया है।
जीएडी (GAD) द्वारा जारी दो अलग-अलग आधिकारिक पत्रों (नस्ती क्रमांक F. No. GENCOR/2779/2025-GAD-7 और F.No. RULE-8/10/2026-GAD-7) के अनुसार, अब भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों को बचाने का खेल खत्म हो जाएगा। इस नए आदेश के तहत अब हर एक्शन के लिए तय समय-सीमा (Time Limit) निर्धारित की गई है, जिससे फाइलों को दबाकर बैठना नामुमकिन होगा।
अखिल भारतीय सेवा (IAS/IPS) और क्लास-1 की चाबी सीधे CM के पास
सरकारी आदेश के मुताबिक, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 17(क) के तहत किसी भी लोक सेवक द्वारा शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या निर्णयों की जांच या अन्वेषण (Investigation) के लिए पूर्वानुमोदन (Prior Approval) की आवश्यकता होती है। सरकार ने अब इसके लिए सक्षम प्राधिकारियों का वर्गीकरण नए सिरे से तय किया है:
महत्वपूर्ण नोट: विभाग को धारा 17(क) के तहत मिलने वाले किसी भी प्रस्ताव की सबसे पहले एक चेकलिस्ट (Checklist) के अनुसार पूरी जांच करनी होगी कि प्रस्ताव पूर्ण है या नहीं, इसके बाद ही आगे की कार्यवाही होगी।
किस अधिकारी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति कौन देगा?
श्रेणीवार तय किए गए सक्षम प्राधिकारी
| अधिकारी/कर्मचारी की श्रेणी | अभियोजन स्वीकृति के लिए सक्षम प्राधिकारी |
| अखिल भारतीय सेवा (IAS, IPS, IFS) एवं वर्ग-1 अधिकारी | मुख्यमंत्री के समन्वय से निर्णय |
| वर्ग-2 एवं वर्ग-3 के कार्यपालिक (Executive) अधिकारी | संबंधित विभाग का मुख्य प्रशासनिक विभाग |
| वर्ग-3 एवं वर्ग-4 के गैर-कार्यपालिक अधिकारी/कर्मचारी | संबंधित नियुक्तिकर्ता (Appointing Authority) |
| प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर पदस्थ अधिकारी | जहां पदस्थ हैं वह विभाग, मूल विभाग से समन्वय कर कार्रवाई करेगा |
| दैनिक वेतनभोगी, संविदा एवं अस्थायी कर्मचारी | संबंधित नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी |
| आउटसोर्स कर्मचारी | अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं |
विशेष: सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले में पहले संबंधित विभाग प्रस्ताव की जांच करेगा। प्रस्ताव पूर्ण पाए जाने पर निर्धारित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष भेजकर अभियोजन स्वीकृति संबंधी निर्णय लिया जाएगा।
“बड़े अफसरों के मामलों में CM स्तर पर होगी समीक्षा”
नई व्यवस्था के तहत IAS, IPS और अन्य अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों तथा वर्ग-1 अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति संबंधी निर्णय मुख्यमंत्री के समन्वय से लिया जाएगा। वहीं निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों के मामलों में विभागीय एवं नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी को अधिकार दिए गए हैं।
नए कानून ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)’ का दिखेगा दम
इस नए आदेश में सबसे खास बात यह है कि इसमें देश के नए कानूनों को समाहित किया गया है। अब अभियोजन की स्वीकृति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के साथ-साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 218 के तहत जारी की जाएगी।
अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के मामलों में, विधि विभाग (Law Department) जांच एजेंसी से प्राप्त प्रस्ताव और प्रशासकीय विभाग के अभिमत का परीक्षण कर समन्वय में आदेश प्राप्त करेगा। जहां केवल BNSS की धारा 218 के तहत मंजूरी चाहिए, वहां विधि विभाग सीधे औपचारिक आदेश जारी करेगा। लेकिन जहां धारा 218 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 दोनों लागू होंगी, वहां राज्य शासन अपना मत तय कर फाइल केंद्र सरकार (Central Government) को भेजने के लिए प्रशासकीय विभाग को सौंपेगा। राज्य सेवा के अधिकारियों के मामले में यह अंतिम निर्णय राज्य सरकार खुद करेगी।
फाइलों के निपटारे के लिए ‘डेडलाइन’ तय, जानिए कब क्या होगा?
अक्सर भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन स्वीकृति की फाइलें सालों लटकी रहती थीं, जिससे कानूनी कार्यवाही (Legal Action) कमजोर हो जाती थी। अब सरकार ने कड़े टाइम-फ्रेम (Time Frame) सेट कर दिए हैं:
- 7 दिनों के भीतर त्रुटि सुधार: यदि एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) या ईओडब्ल्यू (EOW) जैसी जांच एजेंसियों से प्राप्त प्रस्ताव अपूर्ण या अपठनीय है, तो नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी को 7 दिनों के भीतर इसकी कमी सुधारने के लिए एजेंसी को वापस भेजना होगा।
- 45 दिनों में मंजूरी: यदि नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी जांच एजेंसी के प्रस्ताव से सहमत है, तो उसे रिकॉर्ड मिलने के 45 दिनों के भीतर हर हाल में अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) जारी करनी होगी।
- 30 दिन और 15 दिन का नियम (असहमत होने पर): यदि नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी प्रस्ताव से असहमत है, तो वह 30 दिनों के भीतर सकारण निष्कर्ष के साथ फाइल विधि विभाग को भेजेगा। यदि नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी राज्य शासन के अधीनस्थ है, तो वह 15 दिनों के भीतर अपनी असहमति का कारण प्रशासकीय विभाग को भेजेगा।
- विधि विभाग को 15 दिन: विधि और विधायी कार्य विभाग को फाइल मिलने के 15 दिनों के भीतर अपना लिखित अभिमत प्रशासकीय विभाग को देना होगा।
- अधिकतम 3 महीने की सीमा: किसी भी परिस्थिति में, असहमति या पुनर्विचार के मामलों में भी, आवेदन मिलने से लेकर अंतिम निर्णय तक की पूरी कार्यवाही अधिकतम 03 माह (90 दिन) के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी करनी होगी।
विवाद की स्थिति में कैबिनेट कमेटी (Cabinet Committee) करेगी फैसला
यदि किसी मामले में पुनर्विचार के बाद भी प्रशासकीय विभाग का निष्कर्ष और विधि विभाग का विधिक अभिमत अलग-अलग (भिन्न) होता है, तो मामला सीधे अटकेगा नहीं। ऐसे मामलों को सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से अभियोजन स्वीकृति के लिए गठित मंत्रि-परिषद् समिति (Cabinet Committee) के विचारार्थ भेजा जाएगा या समन्वय में इसका अंतिम निराकरण किया जाएगा।
आउटसोर्स और मानदेय कर्मचारियों पर सीधे एक्शन, प्राइवेट कंप्लेंट पर सुनवाई का मौका
सरकार ने संविदा, आउटसोर्स और प्राइवेट कंप्लेंट (Private Complaint) को लेकर भी स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है:
कोर्ट में अफसर को साक्ष्य के लिए बुलाना आसान नहीं; ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट के वैधानिक सिद्धांतों (Legal Principles) के अनुसार, अभियोजन स्वीकृति देने वाले अधिकारी को अपने विवेक का स्वतंत्र उपयोग करते हुए एक स्पीकिंग ऑर्डर (Speaking Order) यानी सकारण आदेश जारी करना होगा। अधिकारियों को नोटशीट में स्पष्ट लिखना होगा कि उन्होंने बयान, जब्ती मेमो समेत सभी दस्तावेजों का अध्ययन किया है।
इसके अलावा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 76 एवं 78 के तहत यह मंजूरी एक लोक दस्तावेज (Public Document) मानी जाएगी। इसका प्रमाणीकरण कार्यालय का लिपिक (Clerk) भी कर सकता है, इसलिए मंजूरी देने वाले बड़े अधिकारियों को बार-बार कोर्ट में साक्ष्य (Evidence) के लिए चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि, अगर आरोपी इसकी वैधानिकता को चुनौती देता है, तो विचारण न्यायालय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 348 के तहत अधिकारी को समन कर सकता है।
चतुरपोस्ट एनालिसिस: छत्तीसगढ़ सरकार का यह नया आदेश प्रशासनिक सुचिता की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। जहाँ एक तरफ फाइलों को अटकाने वाले अफसरों पर 45 दिन की टाइम-लिमिट का हंटर चलेगा, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सीधे क्लास-1 अफसरों की फाइलों की कमान अपने हाथ में रखेंगे। कलेक्टोरेट, मंत्रालय और पुलिस कप्तानों को इसके कड़े पालन के निर्देश जारी कर दिए गए हैं।
📋 छत्तीसगढ़ GAD नए नियम: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
उत्तर: सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए समय-सीमा (Time Limit) निर्धारित कर दी है। अब जांच एजेंसियों के प्रस्ताव पर अधिकतम 45 दिनों के भीतर अभियोजन स्वीकृति देनी होगी, वहीं पूरी प्रक्रिया को 90 दिनों के भीतर समाप्त करना अनिवार्य कर दिया गया है।
उत्तर: नए नियमों के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17(क) के तहत क्लास-1 और ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारियों के खिलाफ शुरुआती जांच या पूछताछ का पूर्वानुमोदन देने का अंतिम अधिकार सीधे माननीय मुख्यमंत्री जी के पास होगा।
उत्तर: संविदा और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के लिए नियमित कर्मचारियों की तरह ही नियम लागू होंगे। लेकिन, आउटसोर्सिंग (Outsourced) और मानदेय (Honorarium) पर काम करने वाले कर्मियों के लिए किसी भी तरह की अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी, उनके खिलाफ सीधे एफआईआर (Legal Action) दर्ज की जा सकेगी।
उत्तर: यदि जांच एजेंसी से प्राप्त अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव अपूर्ण या अपठनीय है, तो सक्षम प्राधिकारी को फाइल मिलने के 07 दिनों के भीतर त्रुटि सुधार के लिए प्रस्ताव वापस एजेंसी को भेजना होगा।
उत्तर: यदि कोई नागरिक सीधे कोर्ट के जरिए मंजूरी मांगता है, तो सक्षम प्राधिकारी संबंधित लोक सेवक को सुनवाई का अवसर (Opportunity of Being Heard) दिए बिना मंजूरी जारी नहीं करेगा। इसका निपटारा भी 3 महीने के भीतर करना होगा।








