
नई दिल्ली न्यूज डेस्क। भारत की स्ट्रीट फूड संस्कृति (Street Food Culture) में दशकों से अखबारों का इस्तेमाल एक अनिवार्य हिस्से के रूप में किया जाता रहा है। चाय की दुकान हो या चाट का ठेला, समोसे, कचौड़ी और पकोड़े से अतिरिक्त तेल सोखने (Absorbent Sheets) या उन्हें पैक करने के लिए अखबार सबसे सस्ता और आसान साधन माना जाता रहा है। इसके बावजूद (However), भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक ने एक बार फिर इस लापरवाही पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने चेतावनी दी है कि यह मासूम दिखने वाली आदत आम उपभोक्ताओं को जानलेवा रसायनों, खतरनाक भारी धातुओं और गंभीर संक्रमण की ओर धकेल रही है।
नियामक संस्था FSSAI ने देश भर के सभी खाद्य व्यवसाय ऑपरेटरों (Food Business Operators) जैसे कि स्ट्रीट वेंडर्स, रेस्टोरेंट, हलवाइयों और छोटे भोजनालयों के लिए एक कड़क एडवायजरी (Strong Advisory) जारी की है। इस निर्देश में साफ तौर पर कहा गया है कि भोजन को पैक करने, परोसने या स्टोर करने के लिए अखबारों या किसी भी छपे हुए कागज का उपयोग तुरंत बंद कर दिया जाए। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने जोर देकर कहा है कि समाचार पत्र फूड-ग्रेड सामग्री (Food-Grade Materials) की श्रेणी में नहीं आते हैं, और जब इनके संपर्क में गर्म, तैलीय या नमी वाला भोजन आता है, तो स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरे पैदा हो जाते हैं।
मुंबई की घटना के बाद अचानक जागा प्रशासन (Recent Inspection Enforcements)
यह ताजा चेतावनी हाल ही में मुंबई में हुई एक गंभीर घटना के बाद जारी की गई है। वहां औचक निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने एक वड़ा पाव विक्रेता (Vada Pav Vendor) को धड़ल्ले से अखबार में खाना पैक करते हुए रंगे हाथों पकड़ा। इस खुलासे के बाद खाद्य सुरक्षा विभाग ने ताबड़तोड़ छापेमारी और निरीक्षण शुरू कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप (Consequently), इस ढर्रे पर अब नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जो खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत पूरी तरह से प्रतिबंधित होने के बावजूद देश के कोने-कोने में धड़ल्ले से चल रहा था।
वैज्ञानिक शोध और विशेषज्ञों के अनुसार, अखबार के इस्तेमाल में सबसे बड़ा जोखिम उसकी छपाई में इस्तेमाल होने वाली स्याही (Printing Ink) से जुड़ा है। आज के आधुनिक युग में छपाई की स्याही को गाढ़ा और चमकदार बनाने के लिए कई तरह के केमिकल कंपाउंड्स, हानिकारक पिगमेंट, प्रिजर्वेटिव और खतरनाक एडिटिव्स मिलाए जाते हैं। जब खौलता हुआ या गर्म खाना सीधे इस छपे हुए कागज पर रखा जाता है, तो थर्मल रिएक्शन के कारण ये जहरीले तत्व पिघलकर भोजन में मिल जाते हैं। विशेष रूप से समोसे, कचौड़ी, पकोड़े और भजिया जैसे तैलीय खाद्य पदार्थ (Oily Foods) इस केमिकल माइग्रेशन के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वसा (Fat) इन रसायनों को बहुत तेजी से सोख लेती है।
केवल स्याही नहीं, धूल और बैक्टीरिया का भी है तगड़ा संजाल (Environmental Contaminants)
अखबार से होने वाला नुकसान सिर्फ केमिकल टॉक्सिसिटी (Chemical Toxicity) तक ही सीमित नहीं है। प्रिंटिंग प्रेस से निकलने के बाद एक अखबार उपभोक्ताओं के हाथों तक पहुँचने से पहले कई अस्वच्छ चरणों से होकर गुजरता है। इस यात्रा के दौरान अखबारों को धूल, मिट्टी, नमी, सीलन और अनगिनत इंसानी हाथों का सामना करना पड़ता है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अखबार जिन खतरों के संपर्क में आते हैं, उन्हें नीचे दिए गए बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- ■ असुरक्षित भंडारण (Unsafe Warehouses): छपने के बाद बंडलों को जमीन और धूल भरे गोदामों में रखा जाता है।
- ■ परिवहन की गंदगी (Unsanitary Transport): बिना किसी कडिंग या सुरक्षा के इन्हें खुले वाहनों में लाया जाता है।
- ■ बैक्टीरिया का हमला (Bacterial Pollution): नमी के संपर्क में आने से इनमें खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस पनप जाते हैं।
- ■ दूषित खाना (Food-Borne Illnesses): जब इस पर भोजन रखा जाता है, तो यह धूल और बैक्टीरिया सीधे पेट में जाकर फूड पॉइजनिंग का कारण बनते हैं।
साल 2018 से ही लागू है प्रतिबंध, फिर भी अनदेखी (Regulatory Prohibitions)
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह कोई नया नियम नहीं है। खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) विनियम, 2018 (Food Safety and Standards Packaging Regulations 2018) के तहत भारत में अखबारों और रीसायकल किए गए कागजों में खाना पैक करने या परोसने पर सालों पहले से कानूनी प्रतिबंध लगा हुआ है। इस कानून में तली हुई चीजों से अतिरिक्त तेल सोखने के लिए अखबार की शीट बिछाने को भी अवैध घोषित किया गया है। इसके बावजूद (Despite This), कम लागत और आसानी से उपलब्धता होने के कारण स्ट्रीट वेंडर्स आज भी धड़ल्ले से इसका उपयोग कर रहे हैं।
नियामक अधिकारियों का कहना है कि आज बाजार में अखबार के मुकाबले कई सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हैं। दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले चाहें तो निम्नलिखित फूड-ग्रेड विकल्पों का उपयोग आसानी से कर सकते हैं:
- फूड-ग्रेड पेपर (Food-Grade Paper Sheets)
- बटर पेपर और पार्चमेंट पेपर (Butter Paper)
- बायोडिग्रेडेबल कंटेनर (Biodegradable Eco-Friendly Boxes)
- पत्ते से बने दोने और पत्तल (Natural Leaf Plates)
ये सभी विकल्प विशेष रूप से भोजन के सीधे संपर्क में आने के लिए ही बनाए जाते हैं, जिससे रासायनिक संदूषण (Chemical Contamination) का खतरा शून्य हो जाता है।
उपभोक्ताओं की जागरूकता ही बदलेगी तस्वीर (Consumer Awareness & Conclusion)
FSSAI द्वारा जारी की गई इस नई एडवायजरी का एक मुख्य उद्देश्य जनता के बीच जागरूकता बढ़ाना भी है। खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कुप्रथा को केवल कानून के दम पर नहीं, बल्कि उपभोक्ता जागरूकता (Consumer Empowerment) से ही खत्म किया जा सकता है। जब ग्राहक खुद सजग होंगे और अखबार में लिपटा हुआ खाना लेने से मना करेंगे, तो वेंडर्स को मजबूरन सुरक्षित पैकेजिंग को अपनाना ही पड़ेगा।
भारत में भले ही अखबार में लिपटे गरमा-गरम समोसे की छवि एक पुरानी यादों या पुरानी परंपरा (Nostalgia and Traditions) से जुड़ी हो, लेकिन जब वैज्ञानिक प्रमाण सेहत के बड़े नुकसान की तरफ इशारा करते हैं, तो परंपराओं को बदलना ही बुद्धिमानी है। FSSAI का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है: अखबार सिर्फ देश-दुनिया की खबरें पढ़ने के लिए बने हैं, उसमें खाना परोसकर अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने के लिए नहीं। सुविधा की यह सस्ती कीमत असल में बहुत महंगी पड़ सकती है।
FSSAI क्या है? (What is FSSAI)
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI) भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Health & Family Welfare) के तहत संचालित एक स्वायत्त वैधानिक निकाय (Statutory Body) है। इसकी स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (Food Safety and Standards Act, 2006) के तहत की गई है।
FSSAI का मुख्य काम देश में बिकने वाले खाद्य पदार्थों के निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात की निगरानी करना है ताकि इंसानी उपभोग के लिए सुरक्षित और शुद्ध भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। भारत में किसी भी छोटे या बड़े खाद्य व्यवसाय ऑपरेटर (Food Business Operators – FBOs) के लिए FSSAI का लाइसेंस या पंजीकरण होना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs – Frequently Asked Questions)
उत्तर: FSSAI का फुल फॉर्म Food Safety and Standards Authority of India है। इसे हिंदी में ‘भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण’ कहा जाता है। इसका केंद्रीय मुख्यालय देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित है।
उत्तर: अखबार की छपाई में प्रयुक्त स्याही में सीसा (Lead), हानिकारक पिगमेंट और रासायनिक प्रिजर्वेटिव होते हैं। जब गर्म या तैलीय भोजन इस पर रखा जाता है, तो ये जहरीले रसायन भोजन में मिलकर शरीर के अंदर चले जाते हैं। इससे कैंसर, किडनी की बीमारी, लिवर डैमेज और पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
उत्तर: हाँ, खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) विनियम, 2018 के तहत देश में भोजन को पैक करने, परोसने, स्टोर करने या तली हुई चीजों से अतिरिक्त तेल सोखने के लिए अखबार या किसी भी छपे हुए कागज के उपयोग पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध लागू है।
उत्तर: दुकानदार भोजन को सुरक्षित रखने के लिए फूड-ग्रेड पेपर (Food-Grade Paper), बटर पेपर, पार्चमेंट पेपर, एल्युमिनियम फॉयल, इको-फ्रेंडली बायोडिग्रेडेबल बॉक्स या पारंपरिक पत्तों से बने दोने-पत्तल का उपयोग कर सकते हैं। ये सभी सामग्रियां केमिकल फ्री और सेहत के लिए सुरक्षित होती हैं।
उत्तर: खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित वेंडर या भोजनालय संचालक पर खाद्य सुरक्षा अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, दुकान का लाइसेंस सस्पेंड हो सकता है और बार-बार गलती दोहराने पर दुकान को सील करने का भी प्रावधान है।
उत्तर: ग्राहकों को जागरूक होना पड़ेगा। जब भी कोई दुकानदार आपको अखबार में खाना परोसता है, तो उसे तुरंत मना करें और सुरक्षित फूड-ग्रेड पेपर या प्लेट की मांग करें। जन-जागरूकता से ही इस जानलेवा आदत को पूरी तरह बदला जा सकता है।







