
Chhattisgarh Pensioners बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होकर सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहे बुजुर्गों के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। बिलासपुर हाई कोर्ट (Bilaspur High Court) की डिवीजन बेंच ने राज्य के हजारों पेंशनभोगियों के पक्ष में एक ऐतिहासिक और निर्णायक फैसला सुनाया है।
यह मामला पेंशनर्स के उन बकायों (Arrears) से जुड़ा है, जो लंबे समय से राज्य और केंद्र के बीच वित्तीय तालमेल के अभाव में अटके हुए थे। अब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी प्रशासनिक विवाद या वित्तीय जटिलता का खामियाजा बुजुर्ग पेंशनर्स को नहीं भुगतना पड़ेगा।
क्या है कोर्ट का यह बड़ा आदेश?
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की उस रिट अपील को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती दी गई थी। सिंगल बेंच ने पहले ही इन पेंशनभोगियों को उनके वैध एरियर्स का भुगतान करने का निर्देश दिया था।
कोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद संवेदनशील टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच ‘आपसी सहमति’ (Mutual Consent) या वित्तीय जवाबदेही न होने के बहाने बुजुर्गों के हक को रोका नहीं जा सकता। जिन कर्मचारियों ने अपनी पूरी जिंदगी सरकारी सेवा में समर्पित कर दी, वे अपनी मेहनत की कमाई पाने के हकदार हैं।
कितने महीने का बकाया एरियर मिलेगा?
इस फैसले के बाद राज्य के हजारों पेंशनर्स के लिए 59 महीने के एरियर (Arrears) भुगतान का रास्ता साफ हो गया है। आइए समझते हैं कि यह बकाया किन दो बड़े वेतन आयोगों (Pay Commissions) से संबंधित है:
- छठवां वेतन आयोग (Sixth Pay Commission): 2006 से पहले रिटायर हुए कर्मचारियों को लाभ केवल 1 सितंबर 2008 से दिया गया था, जिससे 32 महीने का एरियर प्रभावित हुआ था।
- सातवां वेतन आयोग (Seventh Pay Commission): 2016 से पहले रिटायर हुए कर्मचारियों को लाभ 1 अप्रैल 2018 से दिया गया था, जिसके चलते 27 महीने का एरियर लंबित था।
क्यों फंसा था मामला? (Legal Dispute)
‘छत्तीसगढ़ पेंशनर्स समाज’ की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि राज्य सरकार ने भेदभावपूर्ण सर्कुलर जारी किए थे। छत्तीसगढ़ सरकार ने छठवां वेतन आयोग 2006 से और सातवां वेतन आयोग 2016 से लागू किया था, लेकिन पेंशनर्स को लाभ देने के लिए अलग-अलग ‘कट-ऑफ डेट’ (Cut-off Date) तय कर दी गई थी।
राज्य सरकार का तर्क था कि ‘मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000’ की धारा 49 के तहत मध्य प्रदेश सरकार की सहमति जरूरी है। लेकिन, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। वहीं, केंद्र सरकार भी पहले स्पष्ट कर चुकी थी कि पेंशन भुगतान के लिए राज्यों के बीच किसी विशेष सहमति की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट की टिप्पणी: सरकारी सेवा और मानवीय दृष्टिकोण
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि सरकार अपना भुगतान करने के बाद, बाद में मध्य प्रदेश सरकार से हिस्सा क्लेम (Claim) कर सकती है, लेकिन इसके लिए पेंशनर्स को परेशान करना कानूनी और मानवीय दृष्टि से गलत है।
- भेदभावपूर्ण नीति: कोर्ट ने पूर्व में जारी सरकारी सर्कुलर को ‘मौलिक अधिकारों का उल्लंघन’ (Violation of Fundamental Rights) माना है।
- समय सीमा: सिंगल बेंच ने 120 दिनों के भीतर एरियर भुगतान का आदेश दिया था, जिसे डिवीजन बेंच ने पूरी तरह वैधानिक करार दिया है।
- वित्तीय जवाबदेही: सरकार का यह कहना कि मामला वित्तीय और नीतिगत है, पेंशनर्स के कानूनी अधिकारों के सामने टिक नहीं सका।
पेंशनभोगियों के लिए राहत की बात
इस फैसले के बाद अब राज्य के पेंशनर्स में खुशी की लहर है। वर्षों से चल रहे इस कानूनी संघर्ष (Legal Battle) के समाप्त होने से हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। यह फैसला उन सभी कर्मचारियों के लिए एक मिसाल है, जो सेवानिवृत्ति के बाद अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।







