
बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट (Bilaspur High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में विभागीय जांच (Departmental Inquiry) की प्रक्रिया को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि कोई कर्मचारी अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करता है, तो जांच अधिकारी की यह जिम्मेदारी है कि वह साक्ष्य (Evidence) जुटाए और गवाहों के बयान दर्ज करे।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला दुर्गूकोंदल जनपद पंचायत में ‘ग्राम सहायक’ के पद पर कार्यरत रहे दिवंगत लीला राम जांगड़े से जुड़ा है। वर्ष 2003 में विभाग द्वारा उन्हें एक चार्जशीट (Charge Sheet) जारी की गई थी, जिसमें उन पर 17 गंभीर आरोप लगाए गए थे। कर्मचारी ने अपने जवाब में इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया था।
इसके बावजूद, जांच प्रक्रिया के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) को दरकिनार किया गया। जांच अधिकारी ने 2015 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें आरोपों को सही ठहराया गया और अंततः दिवंगत कर्मचारी पर ₹1,62,843 की रिकवरी का आदेश थमा दिया गया।
कानूनी लड़ाई और हाई कोर्ट का हस्तक्षेप
दिवंगत कर्मचारी के बेटे आशीष जांगड़े ने इस अन्याय के खिलाफ बस्तर संभाग के कमिश्नर के समक्ष अपील की थी, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। अंततः, उन्होंने बिलासपुर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
महत्वपूर्ण अवलोकन: जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की सिंगल बेंच में हुई सुनवाई के दौरान यह बात स्पष्ट हुई कि पूरी जांच ‘छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999’ के नियम-7 के विपरीत थी।
कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि आरोप अस्वीकार किए जाते हैं, तो ‘ओरल इंक्वायरी’ (Oral Inquiry) अनिवार्य है। कोर्ट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- साक्ष्य का अभाव: बिना गवाहों के बयान और ठोस सबूतों के केवल कागजों के आधार पर रिकवरी करना गैर-कानूनी है।
- नियमों की अनदेखी: विभागीय जांच में ‘छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा नियम, 1999’ के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।
- प्राकृतिक न्याय: कर्मचारी को अपना पक्ष रखने और क्रॉस-एग्जामिनेशन (Cross-examination) का उचित अवसर नहीं दिया गया।
- बड़ी राहत: कोर्ट ने 1.62 लाख की रिकवरी और कमिश्नर के आदेश को निरस्त कर दिया है।
सरकारी लाभ जारी करने का निर्देश
इस कानूनी लड़ाई (Legal Battle) के बाद अब राज्य सरकार को यह निर्देश दिया गया है कि वे दिवंगत कर्मचारी के सभी सेवानिवृत्ति लाभ (Retirement Benefits) का भुगतान नियमानुसार जल्द से जल्द सुनिश्चित करें। यह फैसला उन सभी कर्मचारियों के लिए एक मिसाल है जो विभागीय मनमानी का शिकार होते हैं।







