
न्यूज डेस्क। देश के पावर सेक्टर की सबसे बड़ी खबर इस वक्त कर्नाटक से आ रही है। जहां लंबे समय से चल रहे जन-आंदोलन और कर्मचारियों के विरोध के सामने एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी को झुकना पड़ा है। Tata Power ने कर्नाटक में समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस (Parallel Power Distribution License) के लिए दिए गए अपने विवादास्पद आवेदन को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है।
यह जीत न केवल बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों, बल्कि किसान संघों और उन तमाम नागरिकों के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है, जिन्होंने बिजली वितरण के निजीकरण (Privatization) के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाई थी।
क्या था पूरा मामला और टाटा पावर का आवेदन?
टाटा पावर ने Karnataka Electricity Regulatory Commission (KERC) के समक्ष एक आवेदन प्रस्तुत किया था। इस आवेदन के जरिए कंपनी राज्य के 19 जिलों में समानांतर बिजली वितरण नेटवर्क स्थापित करना चाहती थी। इसमें बेंगलुरु स्थित BESCOM जैसे बड़े सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (Escoms) के क्षेत्र भी शामिल थे।
क्यों हो रहा था भारी विरोध?
इस प्रस्ताव के सार्वजनिक होते ही राज्य भर में तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली। Federation of Karnataka Electricity Board Employees Unions, All India Power Engineers Federation (AIPEF) और Karnataka Rajya Raitha Sangha (KRRS) जैसे प्रभावशाली संगठनों ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया।
सरकार की भूमिका और टर्निंग पॉइंट (The Turning Point)
विरोध की लहर इतनी तेज थी कि कर्नाटक सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। राज्य के ऊर्जा विभाग और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस मामले पर गंभीरता दिखाई। सरकार ने Electricity Act की धारा 108 को लागू करने पर विचार किया। इसके तहत KERC को यह निर्देश देने की तैयारी थी कि टाटा पावर को तब तक अनुमति न दी जाए, जब तक कि वे सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का उपयोग करने के बजाय अपना खुद का नया नेटवर्क शून्य से न बनाएं।
सामूहिक एकता की जीत (The Outcome)
संस्थागत प्रतिरोध और सरकारी सख्ती को देखते हुए, टाटा पावर ने अंततः अपना आवेदन वापस लेने का निर्णय लिया। यह जीत कर्नाटक के 124 साल पुराने सार्वजनिक बिजली बुनियादी ढांचे को संरक्षित करने में एक बड़ी कामयाबी मानी जा रही है।
Also Read छत्तीसगढ़ पावर कंपनी ने जारी किया महत्वपूर्ण Corrigendum आदेश, देखें पूरी डिटेल
इस आंदोलन से यह स्पष्ट होता है कि जब कर्मचारी यूनियन और नागरिक अपने अधिकारों के लिए एकजुट होते हैं, तो वे बड़े नीतिगत बदलावों को भी प्रभावित कर सकते हैं।







