Chhattisgarh

विभागीय जांच के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: … तो सरकारी कर्मचारी का निलंबन स्वतः समाप्त, बहाली के निर्देश

बिलासपुर न्‍यूज डेस्‍क। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Bilaspur High Court) ने सरकारी कर्मचारियों के निलंबन (Suspension) और विभागीय जांच (Departmental Inquiry) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाली कानूनी व्यवस्था दी है। हाई कोर्ट के इस बड़े फैसले से राज्य के लाखों शासकीय सेवकों को सीधा लाभ मिलेगा।

जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच (Single Bench) ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के एक निलंबित अधिकारी की याचिका को स्वीकार करते हुए उनके निलंबन आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त (Terminated) कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तय समय-सीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी न होने पर निलंबन को वैध नहीं माना जा सकता।

नियमों का हवाला: 90 दिन के भीतर Charge-sheet अनिवार्य

हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966′ (CG Civil Services Rules 1966) का कड़ा हवाला दिया। अदालत ने साफ तौर पर स्पष्ट किया कि यदि किसी शासकीय सेवक (Government Servant) को निलंबित करने के 90 दिनों के भीतर उसे आरोप पत्र (Charge-sheet) नहीं सौंपा जाता है, या फिर उसके निलंबन की अवधि (Suspension Period) को कानूनी रूप से आगे बढ़ाने का कोई नया आदेश जारी नहीं किया जाता, तो ऐसा निलंबन कानूनन स्वतः ही समाप्त (Automatically Revoked) माना जाएगा।

क्या है पूरा मामला (Case History)?

यह पूरा मामला लोक निर्माण विभाग (Public Works Department) से जुड़ा हुआ है। उत्तर बस्तर कांकेर के आर.ई.एस. कॉलोनी (RES Colony Kanker) निवासी एम.के. खरे लोक निर्माण विभाग (PWD) में पदस्थ थे। पदस्थापना के दौरान राज्य शासन ने 9 जनवरी 2026 को एक आदेश जारी कर उन्हें निलंबित कर दिया था।

निलंबन की इस कार्रवाई के बाद विभाग गहरी नींद में सो गया। तय समय-सीमा (Time-limit) बीत जाने के बाद भी विभाग द्वारा न तो एम.के. खरे को चार्जशीट (Charge-sheet) दी गई और न ही उनके निलंबन की अवधि को आगे बढ़ाने का कोई औपचारिक आदेश जारी किया गया। इसके बाद पीड़ित अधिकारी ने न्याय के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट में अधिवक्ता ने रखी मजबूत दलील (Legal Argument)

अधिकारी एम.के. खरे ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली (Advocate Jitendra Pali) के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका (Writ Petition) दायर कर निलंबन समाप्त करने की मांग की। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच में मामले की सुनवाई हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता जितेंद्र पाली ने कोर्ट को बताया:

  • याचिकाकर्ता को निलंबित हुए 90 दिनों से अधिक का समय बीत चुका है।
  • सिविल सेवा नियम 1966 के नियम 9(5)(a) के दूसरे प्रावधान (Proviso) के अनुसार, निलंबन के 90 दिनों के भीतर चार्जशीट जारी करना अनिवार्य (Mandatory) है।
  • यदि विभाग ऐसा करने में विफल रहता है, तो कर्मचारी स्वतः ही सेवा में बहाली (Reinstatement) का हकदार हो जाता है।
  • इस मामले में सरकारी विभाग ने स्थापित नियमों का खुला उल्लंघन (Violation of Rules) किया है।

सरकारी वकील ने कोर्ट में स्वीकार की गलती

मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य शासन की ओर से उपस्थित डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट (Deputy Government Advocate) ने भी कोर्ट के सामने सच्चाई को स्वीकार किया। उन्होंने माना कि यह सच है कि विभाग द्वारा याचिकाकर्ता को निर्धारित 90 दिनों के भीतर न तो आरोप पत्र जारी किया गया है और न ही निलंबन की अवधि का कोई औपचारिक विस्तार (Extension) किया गया है।

हाई कोर्ट का अंतिम फैसला: निलंबन आदेश निरस्त, तत्काल बहाल करने का निर्देश

बिलासपुर हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपने फैसले में लोक निर्माण विभाग (PWD) की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून में किसी प्रक्रिया के लिए समय-सीमा (Time-limit) तय कर दी गई है, तो कार्यपालिका या कोई भी सरकारी विभाग उससे ऊपर नहीं हो सकता।

क्लीन चिट नहीं: कोर्ट ने राज्य सरकार को दी यह विशेष छूट

हाई कोर्ट ने जहां एक तरफ पीड़ित शासकीय सेवक को प्रक्रियात्मक राहत दी, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक शुचिता और न्याय के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए राज्य सरकार के अधिकारों को भी सुरक्षित रखा है।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि निलंबन निरस्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि याचिकाकर्ता अधिकारी को उनके ऊपर लगे आरोपों से ‘क्लीन चिट’ (Clean Chit) मिल गई है या वे दोषमुक्त हो गए हैं।

अदालत ने राज्य शासन (State Government) को कानूनी छूट देते हुए अपने आदेश में लिखा है:

  • यदि विभाग के पास अधिकारी के खिलाफ पर्याप्त आधार हैं, तो वह कानून के दायरे (Legal Framework) में रहते हुए अपनी कार्रवाई जारी रख सकता है।
  • राज्य सरकार और लोक निर्माण विभाग याचिकाकर्ता अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) शुरू करने या उसे आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
  • इसके साथ ही, यदि मामला गंभीर है तो शासन नियमानुसार अन्य विधिक कार्यवाही (Legal Proceedings) को आगे बढ़ाने के लिए भी स्वतंत्र रहेगा।

फैसले का निष्कर्ष: हाई कोर्ट के इस आदेश का सीधा संदेश यह है कि सरकार किसी भी कर्मचारी के खिलाफ जांच तो कर सकती है, लेकिन जांच के नाम पर या चार्जशीट लटकाकर किसी भी शासकीय सेवक को 90 दिनों से अधिक समय तक बिना कानूनी आधार के निलंबित (Under Suspension) नहीं रखा जा सकता। विभागीय देरी का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेगा।

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S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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