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छत्तीसगढ़ बना ‘शिकारगढ़’? विधानसभा में जो जानकारी सार्वजनिक, RTI में वह ‘गोपनीय’ कैसे?

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Chhattisgarh Wildlife RTI Controversy: रायपुर। छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों की सुरक्षा और वन विभाग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी को विभाग ने “गोपनीय” (Confidential) और “शासन के हित में नहीं” बताकर देने से इनकार कर दिया है।

Surprisingly (आश्चर्यजनक रूप से), यह वही जानकारी है जिसे वन विभाग ने हाल ही में विधानसभा सत्र के दौरान विधायक शेषराज हरवंश के सवाल (प्रश्न क्रमांक 1641) के जवाब में सार्वजनिक रूप से सदन में पेश किया था।

आंकड़ों का मायाजाल: विधानसभा और RTI में अंतर (Data Mismatch)

नितिन सिंघवी के अनुसार, विभाग द्वारा दिए गए आंकड़ों में भारी विरोधाभास (Contradiction) है। Consequently (परिणामस्वरूप), यह आशंका गहरा गई है कि क्या विभाग अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रहा है?

RTI की धारा 8(1)(क) का गलत इस्तेमाल? (Misuse of RTI Act)

वन विभाग ने दस्तावेज न देने के लिए RTI की धारा 8(1)(क) का सहारा लिया है। Specifically (विशेष रूप से), यह धारा तब लगाई जाती है जब सूचना से देश की संप्रभुता या सुरक्षा को खतरा हो।

In fact (वास्तव में), बड़ा सवाल यह है कि जो जानकारी विधानसभा के पटल पर रखकर सार्वजनिक की जा चुकी है, उसे एक नागरिक को देने से “राज्य की सुरक्षा” या “विदेशी संबंधों” पर प्रतिकूल प्रभाव कैसे पड़ सकता है?

‘शिकारगढ़’ बनता जा रहा है छत्तीसगढ़! (Rising Poaching Cases)

सिंघवी ने विभाग पर सीधा हमला बोलते हुए छत्तीसगढ़ को ‘शिकारगढ़’ करार दिया है। Moreover (इसके अलावा), पिछले कुछ दिनों के हालात बेहद चिंताजनक रहे हैं:

क्यों जानकारी छिपा रहा है विभाग? (Expert Analysis)

  • Pol Khulne ka Darr: 562 मौतों में बिजली करंट और लापरवाही का सच सामने आ जाएगा।
  • Inconsistent Data: विधानसभा और RTI के आंकड़ों में बड़ा अंतर पकड़ा गया है।
  • Poaching Reality: छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ रहे अवैध शिकार की पोल खुल रही है।
  • Accountability: जानकारी देने से जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज गिरना तय है।

विभाग की मंशा पर सवाल (The Big Question)

नितिन सिंघवी का सीधा आरोप है कि विभाग अपनी “असफल प्रबंधन रणनीति” (Failed Management Strategy) को छिपाने के लिए पारदर्शिता से भाग रहा है। Nevertheless (इसके बावजूद), यह बेजुबान जानवरों के संरक्षण की भावना के खिलाफ है। सिंघवी का कहना है कि विभाग की लापरवाही और बिजली करंट से हुई मौतों की पोल न खुल जाए, इसलिए इस संवेदनशील जानकारी को ‘गोपनीय’ बताकर दबाया जा रहा है।

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In short (संक्षेप में), यह लड़ाई सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन बेजुबान जीवों की है जो खुद बोल नहीं सकते। नितिन सिंघवी का कहना है कि जब विभाग वन्यजीवों के लिए आवाज उठाने वालों को ही दबाने लगेगा, तो उनके संरक्षण और कल्याण की उम्मीद कैसे की जा सकती है? अब सवाल यह है कि क्या संविधान और कानून की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर शासन कोई कार्रवाई करेगा?

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