
Chhattisgarh Pensioners News: रायपुर। छत्तीसगढ़ के लाखों पेंशनरों के लिए खुशियों की खबर के बीच एक कड़वा सच सामने आया है। हाल ही में जारी 3% महंगाई राहत (DR) के आदेश में एरियर का जिक्र न होने पर भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने मोर्चा खोल दिया है। पेंशनरों ने इसे अपने हक पर ‘कुठाराघात’ और आर्थिक शोषण करार दिया है।
Consequently (परिणामस्वरूप), पेंशनर्स महासंघ ने राज्य सरकार और ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि जिन हाथों ने जीवन भर देश की सेवा की, आज वही हाथ अपने हक के लिए तरस रहे हैं।
10 हजार करोड़ का बड़ा खेल? (The Big Financial Gap)
महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री वीरेन्द्र नामदेव ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ को मिलने वाली 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि अभी तक अटकी हुई है।
Surprisingly (आश्चर्यजनक रूप से), यह राशि पेंशनरों के अधिकारों की है। महासंघ का आरोप है कि यह कोई साधारण गलती नहीं, बल्कि “ब्यूरोक्रेटिक लापरवाही” (Bureaucratic Negligence) का नतीजा है। पेंशनरों ने अब इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।

पेंशनरों की मुख्य मांगें (Key Demands)
महासंघ ने सरकार के सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी है। Specifically (विशेष रूप से), उनकी ये मांगें प्रमुख हैं:
- 88 माह का एरियर: केंद्र के समान देय तिथि से लंबित 88 महीनों का एरियर तत्काल दिया जाए।
- MP-CG विवाद का हल: मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49(6) के तहत पेंशनरी दायित्वों का निपटारा हो।
- 26% राशि का भुगतान: जब तक एमपी पैसा न दे, छत्तीसगढ़ सरकार अपना 26% हिस्सा जारी करे।
- दोषियों पर एक्शन: 10 हजार करोड़ की राशि अटकने के जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो।
वित्त मंत्री के बयान पर सवाल (Questioning the Government)
पेंशनर्स महासंघ का कहना है कि स्वयं वित्त मंत्री ओ. पी. चौधरी ने विधानसभा में स्वीकार किया है कि बड़ी राशि बकाया है। Nevertheless (इसके बावजूद), अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। पेंशनर पूछ रहे हैं कि “आखिर यह राशि किसके पास अटकी है और इसकी जिम्मेदारी किसकी है?”
आंदोलन की चेतावनी (Warning of Protest)
विज्ञप्ति में जे. पी. मिश्रा, द्रौपदी यादव और अन्य पदाधिकारियों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि इस “पेंशन अन्याय” पर शीघ्र निर्णय नहीं हुआ, तो पेंशनर सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।
In short (संक्षेप में), पेंशनरों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। वे अब और आश्वासन नहीं, बल्कि अपना हक चाहते हैं।
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