रायपुर (Chaturpost): छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी (CSPDCL) एक बड़े कानूनी विवाद (Legal Dispute) में घिर गई है। सर्वहित संघ ने कंपनी मैनेजमेंट पर आरोप लगाया है कि वह ‘आरक्षित संघ’ के दबाव में आकर माननीय उच्च न्यायालय (High Court) के आदेशों की सरेआम अवमानना (Contempt) कर रही है। इससे सामान्य और पिछड़ा वर्ग के कर्मचारियों में भारी आक्रोश है।
हाई कोर्ट का फैसला और ‘डेडलाइन’ का उल्लंघन
सर्वहित संघ के मुताबिक, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 2019 में एक महत्वपूर्ण फैसला (Verdict) सुनाया था, जिसमें ‘पदोन्नति नियम 2003’ के आरक्षण वाले बिंदु-5 को पूरी तरह अपास्त (Quashed) कर दिया गया था।
अदालत ने निर्देश दिया था कि प्रमोशन की प्रक्रिया (Process) सुप्रीम कोर्ट के ‘एम. नागराज’ केस के मानदंडों के आधार पर तय हो। लेकिन आरोप है कि:
- कंपनी ने पिछले 7 सालों से इस आदेश को ठंडे बस्ते (Cold Storage) में डाल रखा है।
- कोर्ट के तीन बार आरक्षण को अमान्य ठहराने के बावजूद पुरानी व्यवस्था थोपी जा रही है।
“2004 के बाद के प्रमोशन अमान्य”
सर्वहित संघ के महासचिव आशिष अग्निहोत्री ने सीधे शब्दों में कहा:
“आरक्षित संघ द्वारा वर्ष 2004 के बाद कराए गए सभी प्रमोशन असंवैधानिक (Unconstitutional) हैं। नियमानुसार इन कर्मचारियों को पदावनत (Demote) किया जाना चाहिए, लेकिन कंपनी मैनेजमेंट दबाव की राजनीति (Pressure Politics) के आगे झुका हुआ है।”
विवाद के मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- कोर्ट की अवमानना: 2019 के आदेश का क्रियान्वयन (Implementation) अब तक अटका हुआ है।
- विश्वासघात: सामान्य और पिछड़ा वर्ग के हितों की अनदेखी का आरोप।
- आंदोलन की राह: जल्द सुधार न होने पर प्रदेशव्यापी उग्र प्रदर्शन (Protest) की चेतावनी।
मैनेजमेंट का मौन और बढ़ता तनाव
हैरानी की बात यह है कि कंपनी ने इस मामले में एक सर्कुलर (Circular) तो जारी किया था, लेकिन उसे जमीन पर लागू नहीं किया गया। संघ का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का बहाना बनाकर प्रमोशन रोके जा रहे हैं, जबकि वहां से कोई ‘स्टे’ (Stay) नहीं है।
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अब देखना यह है कि बिजली कंपनी प्रबंधन इस कानूनी उलझन (Legal Tangle) को कैसे सुलझाता है या फिर यह विवाद सड़कों पर उग्र आंदोलन का रूप लेगा।
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