
Padma Shri रायपुर। केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस पर देश के सर्वेच्च नागरिक सम्मान पद्म सम्मान की घोषणा की। इस सूची में छत्तीसगढ़ की तीन विभूतियां शामिल हैं, जिन्हें पद्श्री देने की घोषणा की गई है। राज्य के जिन तीन लोगों को पद्मश्री के लिए चुना गया है उनमें बुधरी ताती और डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले शामिल हैं। गोडबोले दंपत्ति को संयुक्त रुप से यह सम्मान दिया जाएगा। तीनों दंतेवाड़ा जिला में समाज सेवा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हैं।
37 सालों से कर रहे हैं नि:शुल्क इलाज
पद्श्री सम्मान के लिए चुने गए डॉ. गोडबोले दंपत्ति बीते 37 साल से नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा दे रहे हैं। डॉ. गोडबोले की उम्र लगभग 61 हो गई है। डॉ. गोडबोले ने अबूझमाड़ को अपनी कर्मभूमि बना रखा है। डॉ. दंपत्ति दंतेवाड़ा के साथ ही बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर के अंदरुनी गांवों तक जाकर स्वास्थ्य कैंप लगाते हैं। डॉ. गोडबोले महाराष्ट्र, मेघालय, गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में अपनी सेवा दे चुके हैं। 1990 में छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में आए। यहां करीब 13 साल सेवा देने के बाद पारिवारिक कारणों से वापस महाराष्ट्र गए, लेकिन वहां भी आदिवासियों की सेवा में लगे रहे। 2010 वे बस्तर लौटे और बारसूर से फिर लोगों की सेवा शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि डॉ. गोडबोले पांच साल में आठ हजार पांच सौ लोगों का नि:शुल्क इलाज कर चुके हैं।
दंतेवाड़ा में महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही बुधरी ताती को मिला पद्मश्री
रायपुर। बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम में जुटी बुधरी ताती को पद्मश्री देने की घोषणा की गई है। 15 साल की उम्र से समाज सेवा कर रही बुधरी ताती वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ी हैं। उन्हें अब तक तीन राष्ट्रीय समेत 22 पुरस्कार मिल चुका है। इसमें छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से 2021 में दिया गया वीरानी पुस्कार भी शामिल है।
बुधरी ताती मूल रुप से दंतेवाड़ा गीदम ब्लॉक के हीरानार गांव की रहने वाली है। आदिवासी परिवार में जन्मीं बुधरी ताती का बचपन से ही झुकाव अध्यात्म की तरफ रहा। वे पांच साल की उम्र से ही गुमरगुंडा आश्रम से जुड़ीं। 1984 में दिव्य जीवन संघ गुमरगुंडा आश्रम से उन्होंने दीक्षा ली। इसके बाद आदिवासी क्षेत्र में महिलाओं के शिक्षाए स्वास्थ्य व पोषण के क्षेत्र में जागरुकता लाने का बीड़ा उठाया।
अभी वे बस्तर में महिलाओं को जागरूक करने से लेकर शिक्षित करने का काम किया। साथ ही वृद्धा आश्रम, अनाथ आश्रम जैसी संस्थाएं चलाती हैं। इन्होंने अपना जीवन समाजसेवा के लिए समर्पित कर दिया। अब तक वे बस्तर संभाग के अलग-अलग करीब 545 गांवों की पद यात्रा भी की हैं। समाज सेवा के लिए काम करने पर इन्हें डॉक्टर की भी उपाधि मिली है।




