छत्तीसगढ़ के कथित 2000 करोड़ के शराब घोटाले में ‘पार्ट-B’ (Part-B) शब्द बार-बार सामने आ रहा है। सामान्य पाठक के लिए यह समझना जरूरी है कि आखिर यह तकनीक क्या थी जिसने सरकारी सिस्टम के भीतर ही एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ खड़ी कर दी थी।
1. क्या है ‘पार्ट-B’ शराब?
आसान भाषा में कहें तो ‘पार्ट-B’ वह शराब है जो वैध डिस्टिलरी (शराब बनाने वाली फैक्ट्री) में ही बनती थी, लेकिन इसे सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जाता था।
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- पार्ट-A: वह शराब जिस पर एक्साइज ड्यूटी (आबकारी शुल्क) चुकाई गई और जिसका रिकॉर्ड सरकारी फाइलों में है।
- पार्ट-B: वह ‘कच्ची’ या ‘अवैध’ शराब जो बिना टैक्स चुकाए सीधे दुकानों तक पहुँचाई गई।
2. कैसे होता था यह पूरा खेल? (स्टेप-बाय-स्टेप)
जांच एजेंसियों (ED/ACB/EOW) के अनुसार, इस सिंडिकेट ने एक पूरा नेटवर्क तैयार किया था:
- फैक्ट्री में सेटिंग: डिस्टिलरी मालिकों को अतिरिक्त शराब बनाने के लिए कहा जाता था जिसे कागजों पर नहीं दिखाया जाता था।
- नकली होलोग्राम: शराब की बोतल पर असली जैसा दिखने वाला ‘नकली होलोग्राम’ लगाया जाता था ताकि आम ग्राहक को शक न हो कि वह अवैध शराब खरीद रहा है।
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- निजी गाड़ियों का इस्तेमाल: जैसा कि हालिया कार्रवाई में 16 गाड़ियां ज़ब्त हुई हैं, इन निजी वाहनों का उपयोग डिस्टिलरी से सीधे सरकारी दुकानों तक माल पहुँचाने में होता था। ये गाड़ियाँ सरकारी वेयरहाउस (गोदाम) नहीं जाती थीं।
- कैश का कलेक्शन: सरकारी दुकानों के सेल्समैन को निर्देश थे कि पहले ‘पार्ट-B’ (बिना रिकॉर्ड वाली) शराब बेचें। इसका जो भी कैश आता था, उसे सरकारी खाते में जमा करने के बजाय ‘सिंडिकेट’ के कारिंदे इकट्ठा कर लेते थे।
3. सरकारी खजाने को कैसे लगी चपत?
नॉर्मल शराब बिकने पर उसका पैसा सरकार के पास जाता है जिससे विकास कार्य होते हैं। लेकिन ‘पार्ट-B’ शराब की बिक्री का 100% पैसा सीधा सिंडिकेट और उससे जुड़े रसूखदारों की जेब में गया। इसमें न तो आबकारी ड्यूटी मिली और न ही बिक्री का मुनाफा सरकार तक पहुँचा।
4. क्यों नहीं पकड़ी गई यह चोरी?
जांच में यह सामने आया है कि इस सिंडिकेट में आबकारी विभाग के बड़े अधिकारी (जैसे तत्कालीन एमडी और सचिव) खुद शामिल थे। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो दुकानों की चेकिंग करने वाला कोई नहीं बचा। अधिकारियों ने ही डिस्टिलरी मालिकों और ट्रांसपोर्टरों को इस अवैध काम के लिए ‘प्रोटेक्शन’ दे रखा था।
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शराब घोटाला: सिंडिकेट के 4 प्रमुख स्तंभ
1. अनिल टुटेजा (पूर्व IAS अधिकारी)
- भूमिका: इन्हें घोटाले का ‘मुख्य आर्किटेक्ट’ माना जाता है।
- प्रोफाइल: टुटेजा छत्तीसगढ़ कैडर के 2003 बैच के IAS अधिकारी रहे हैं। जांच एजेंसियों का आरोप है कि सरकारी पद पर रहते हुए उन्होंने नियमों में ऐसे बदलाव किए जिससे ‘सिंडिकेट’ को शराब बेचने और कमीशन वसूलने का रास्ता मिल सके। वे आबकारी विभाग के फैसलों को पर्दे के पीछे से नियंत्रित कर रहे थे।
2. अनवर ढेबर (रायपुर के रसूखदार कारोबारी)
- भूमिका: सिंडिकेट के ‘किंगपिन’ और मुख्य संग्रहकर्ता (Collector)।
- प्रोफाइल: अनवर ढेबर, रायपुर के मेयर एजाज ढेबर के भाई हैं। आरोप है कि अनवर ने ही डिस्टिलरी मालिकों से ‘कमीशन’ तय किया और ‘पार्ट-B’ शराब की बिक्री का पूरा कैश कलेक्शन अपने हाथों में रखा। उन्होंने शराब की बोतलों पर लगने वाले नकली होलोग्राम और अवैध परिवहन की पूरी चेन को मैनेज किया।
3. निरंजन दास (पूर्व MD, CSMCL)
- भूमिका: विभाग के भीतर ‘कवर’ प्रदान करना।
- प्रोफाइल: तत्कालीन आबकारी सचिव और छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CSMCL) के एमडी के रूप में, निरंजन दास ने सुनिश्चित किया कि दुकानों पर होने वाली अवैध बिक्री की कोई जांच न हो। उन्हीं के कार्यकाल में प्लेसमेंट एजेंसियों (दुकान चलाने वाले कर्मचारी) के चयन में गड़बड़ी की गई ताकि वे सिंडिकेट के निर्देशों पर काम करें।
4. अरुणपति त्रिपाठी (पूर्व आबकारी अधिकारी/ITS)
- भूमिका: ‘ऑपरेशनल हेड’ और मैनेजमेंट।
- प्रोफाइल: त्रिपाठी भारतीय दूरसंचार सेवा (ITS) के अधिकारी थे जिन्हें प्रतिनियुक्ति पर आबकारी विभाग में लाया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने डिस्टिलरी मालिकों से अवैध शराब बनवाने और उसे सरकारी दुकानों तक पहुँचाने का पूरा ‘लॉजिस्टिक्स’ संभाला।
घोटाले की ‘चेन’ कैसे काम करती थी?
- डिस्टिलरी: वेलकम, भाटिया और केडिया जैसी डिस्टिलरी से अवैध शराब (Part-B) बनवाई गई।
- होलोग्राम: प्रिज्म होलोग्राफी कंपनी के जरिए नकली होलोग्राम छपवाए गए।
- ट्रांसपोर्ट: जैसा कि हाल ही में 16 गाड़ियां ज़ब्त हुई हैं, इन निजी वाहनों से शराब सीधे दुकानों तक गई।
- दुकानें: प्लेसमेंट एजेंसियों के कर्मचारियों ने इस शराब को बिना बिल के बेचा।
- संग्रहण: सारा कैश अनवर ढेबर और उनके साथियों तक पहुँचा, जिसे बाद में रसूखदारों में बांट दिया गया।

