
विशेष रिपोर्ट: सुधीर नायक पूर्व महामंत्री विद्युत कर्मचारी संघ फेडरेशन, 56, इंटक ,छत्तीसगढ़,
हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक जलते हुए ट्रांसफार्मर का वीडियो केवल एक तकनीकी खराबी की कहानी नहीं है, बल्कि यह बिजली विभाग की वर्तमान कार्यप्रणाली का एक ज्वलंत आईना है। जब एक निर्जीव मशीन अपनी क्षमता से अधिक भार पाकर आग की लपटों में घिर जाती है, तो सोचिए उन जीवित कर्मचारियों का क्या हाल होगा जो वर्षों से रिक्त पदों के कारण ‘ओवरलोड’ का सामना कर रहे हैं?
रिक्त पदों का संकट: एक कर्मचारी, तीन का काम प्रदेश में वर्तमान में 50% से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। इसका सीधा असर मैदानी और कार्यालयीन कर्मचारियों पर पड़ रहा है। जिस तरह वोल्टेज बढ़ने पर फ्यूज उड़ जाता है, वैसे ही काम के बोझ तले दबकर कर्मचारी मानसिक और शारीरिक रूप से टूट रहे हैं।
अदृश्य जोखिम: क्या हम किसी बड़ी त्रासदी का इंतज़ार कर रहे हैं?
- मानसिक स्वास्थ्य: हाई-वोल्टेज करंट सिर्फ तारों में नहीं, बल्कि कर्मचारियों के दिमाग में तनाव बनकर दौड़ रहा है।
- सुरक्षा से समझौता: अत्यधिक थकान और काम के दबाव में अक्सर सुरक्षा मानकों (Safety Protocols) की अनदेखी हो जाती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है।
- झुलसता पारिवारिक जीवन: स्टाफ की कमी के कारण छुट्टियां न मिलना और 24 घंटे ड्यूटी के तनाव ने कर्मचारियों के सामाजिक जीवन को समाप्त कर दिया है।

प्रबंधन के लिए एक गंभीर संदेश मशीनें खरीदी जा सकती हैं, ट्रांसफार्मर बदले जा सकते हैं, लेकिन एक कुशल कर्मचारी का ‘बर्न आउट’ होना अपूरणीय क्षति है।
“यदि ट्रांसफार्मर का जलना विभाग के लिए आर्थिक नुकसान है, तो एक कर्मचारी का ‘बर्न आउट’ होना एक मानवीय त्रासदी है।”
निष्कर्ष: अब समय आ गया है कि प्रबंधन केवल उपकरणों के रखरखाव पर ही नहीं, बल्कि ‘मानव संसाधन’ के संरक्षण पर भी ध्यान दे। रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती ही वह एकमात्र ‘कूलिंग सिस्टम’ है जो इस विभाग को भविष्य के बड़े हादसों से बचा सकता है। उम्मीद है कि इस जलते ट्रांसफार्मर की रोशनी में प्रबंधन उन चेहरों को देख पाएगा, जो खुद जलकर प्रदेश को रोशन कर रहे हैं।







