
Chaturpost Desk: देश में इस समय सूरज की तपिश और heat waves (भीषण लू) ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस रिकॉर्डतोड़ गर्मी के बीच देश में बिजली की खपत (Electricity Demand) अपने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ चुकी है। इसी बीच, देश के पावर सेक्टर से एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है।
सोलर इंडस्ट्री के एक प्रमुख संगठन ने भारत के पावर मार्केट रेगुलेटर से बिजली एक्सचेंजों पर electricity prices (बिजली की कीमतों) की ऊपरी सीमा को बढ़ाने की जोरदार वकालत की है। उद्योग जगत का साफ कहना है कि वर्तमान सीमा के कारण कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है, जिससे इस सेक्टर में नया निवेश (Investment) पूरी तरह से थमने की कगार पर पहुंच गया है।
⚠️ NSEFI ने CERC के सामने उठाई मांग: क्या है पूरा मामला?
National Solar Energy Federation of India (NSEFI) ने इस संबंध में Central Electricity Regulatory Commission (CERC) के समक्ष एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की है। संगठन का कहना है कि बिजली एक्सचेंजों पर वर्तमान में लागू 10 रुपये प्रति यूनिट का price cap (मूल्य सीमा) व्यावहारिक नहीं रह गया है।
इस सीमा के कारण बाजार में काम करने वाले कई बड़े खिलाड़ी, विशेष रूप से energy storage (ऊर्जा भंडारण) कंपनियां, मुनाफे के साथ अपना ऑपरेशन चलाने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो रही हैं। वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में, $1 की कीमत लगभग 96.91 भारतीय रुपये के स्तर पर होने के कारण लागत में भी बदलाव आया है।
📈 रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची बिजली की डिमांड (Peak Demand)
यह याचिका ऐसे समय में आई है जब पिछले कुछ दिनों से देश के कई हिस्सों में जारी गंभीर heat waves की वजह से बिजली की मांग ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है। ऊर्जा मंत्रालय (Power Ministry) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार:
- 📌 मंगलवार का नया रिकॉर्ड: देश में पीक पावर डिमांड 260.45 gigawatts (GW) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर जा पहुंची।
- 📌 सोमवार का रिकॉर्ड टूटा: इसने महज 24 घंटे पहले यानी सोमवार को बने 257.37 GW के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है।
🛠️ क्यों फेल साबित हुआ अलग मार्केट सेगमेंट?
💸 बिजली उत्पादकों का दोहरा नुकसान
याचिका में कंपनियों की पीड़ा को उजागर करते हुए बताया गया है कि जब देश में बिजली की मांग कम होती है (Weak Demand Period), तब उत्पादक कंपनियां बहुत कम कीमतों पर बिजली बेचने के लिए मजबूर होती हैं।
इसके विपरीत, जब heat waves जैसी स्थिति में मांग चरम पर होती है, तो वे price ceiling (कीमत की ऊपरी सीमा) लागू होने के कारण अपने पुराने नुकसान की भरपाई भी नहीं कर पातीं। इस दोहरी मार की वजह से कंपनियां वित्तीय संकट से जूझ रही हैं।
🚀 भविष्य के निवेश पर संकट के बादल
विशेषज्ञों का मानना है कि price cap में बदलाव न होने से energy storage (ऊर्जा भंडारण) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नया निवेश हतोत्साहित हो रहा है। भविष्य में ग्रिड की स्थिरता और बिजली की मांग-आपूर्ति के उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए यह तकनीक बेहद जरूरी है।







