
दंतेवाड़ा/रायपुर। अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (International Biodiversity Day) के अवसर पर छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बस्तर संभाग से एक बेहद गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। दंतेवाड़ा जिले में आयरन ओर के लिए प्रसिद्ध बैलाडीला की सुरक्षित और घने जंगलों वाली पहाड़ियों में वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने ‘जंगली अरहर‘ (Jungli Arhar) की एक बेहद दुर्लभ और अनमोल प्रजाति की खोज की है। वनस्पति विज्ञान की दुनिया में इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केजानस केजानीफोलियस (Cajanus cajanifolius) है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अभूतपूर्व खोज (Unprecedented Discovery) न केवल बस्तर, बल्कि पूरे देश के कृषि और वानिकी क्षेत्र के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
क्यों खास है बस्तर की यह दुर्लभ ‘जंगली अरहर‘?
वैज्ञानिकों के अनुसार, बैलाडीला की पहाड़ियों में पाई गई जंगली अरहर की इस विशेष प्रजाति में कुछ ऐसे दुर्लभ आनुवंशिक गुण (Genetic Traits) मौजूद हैं, जो इसे बेहद खास बनाते हैं। इस पौधे में अत्यधिक गर्मी सहन करने की क्षमता के साथ-साथ गंभीर पौधों की बीमारियों और कीटों से लड़ने की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity Power) पाई गई है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और लगातार बढ़ते तापमान के इस दौर में, पारंपरिक फसलों को बचाने के लिए यह खोज एक मील का पत्थर (Milestone) साबित होने वाली है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस जंगली प्रजाति के क्रॉस-ब्रीडिंग और जीन संवर्धन (Gene Enrichment) से भविष्य में ऐसी नई फसलें विकसित की जा सकेंगी, जो कम पानी, सूखे और अत्यधिक तापमान में भी बंपर पैदावार दे सकेंगी। इसमें उच्च प्रोटीन (High Protein) जैसे पोषक तत्व भी प्रचुर मात्रा में मिलने की संभावना है, जो खाद्य सुरक्षा (Food Security) के क्षेत्र में बड़ी क्रांति ला सकता है।
💡 मुख्य विशेषताएं: क्यों दुनिया के नक्शे पर चमका बस्तर?
वैज्ञानिकों के इस विशेष सर्वेक्षण (Scientific Survey) के बाद बस्तर और बैलाडीला क्षेत्र को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं, जिन्हें रंगीन इंफोग्राफिक टेबल के माध्यम से समझा जा सकता है:
जैव विविधता विरासत स्थल घोषित करने की उठी मांग
इस महा-खोज के सामने आने के बाद इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV Raipur) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा और डॉ. केएल भज, डॉ. पंकज कुमार कार्तिकेय समेत नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR) की संयुक्त टीम ने सरकार से एक बड़ी मांग की है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी और अपील: “बैलाडीला, किरंदुल और बचेली के इन विशिष्ट क्षेत्रों में लगातार बढ़ती खनन गतिविधियों (Mining Activities) के कारण इस बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Sensitive Ecosystem) को भारी खतरा है। अगर इस अमूल्य प्राकृतिक धरोहर को बचाना है, तो सरकार को इन पहाड़ी क्षेत्रों को तुरंत ‘जैव विविधता विरासत स्थल‘ (Biodiversity Heritage Site) घोषित करना चाहिए, ताकि खनन से इस दुर्लभ वनस्पति का अस्तित्व खत्म न हो जाए।”
इस खोज ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह प्रमाणित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग प्राकृतिक संपदा, वन संपदा और असीमित जैव विविधता (Global Biodiversity Hotspot) का एक अनमोल और अटूट खजाना है।







