
रायपुर। मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार ने ‘तबादला नीति 2026’ को हरी झंडी दे दी है। वहां 1 जून से ट्रांसफर विंडो खोलने के फैसले के बाद छत्तीसगढ़ के गलियारों में हलचल तेज है। छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को ज्ञापन सौंपकर स्थानांतरण नीति तत्काल जारी करने की मांग की है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ सरकार इस जून में तबादलों से बैन हटा पाएगी? प्रशासनिक और वित्तीय गलियारों में चर्चा है कि ट्रांसफर विंडो खुलने के आड़े “फाइनेंस का पहरा” आ सकता है, क्योंकि राज्य सरकार इस वक्त कड़े वित्तीय प्रबंधन और मितव्ययता (Austerity) के दौर से गुजर रही है।
सरकार पर भारी वित्तीय दबाव, ‘मितव्ययता’ के कड़े निर्देश
दरअसल, छत्तीसगढ़ सरकार पर इस समय कई मोर्चों से आर्थिक भार बढ़ा हुआ है। पुराने कर्ज के साथ धान खरीदी, महतारी वंदन योजना और अन्य कल्याणकारी गारंटियों के सफल क्रियान्वयन के बीच पीएम मोदी की अपील पर वित्त विभाग ने पहले ही सभी विभागों को ‘मितव्ययता बरतने’ (खर्चों में कटौती करने) के सख्त निर्देश जारी कर रखे हैं। फिजूलखर्ची रोकने के इस सरकारी संकल्प के बीच थोक तबादलों की हरी झंडी देना राजकोष के लिए एक नई चुनौती बन सकता है।
2 प्रतिशत डीए (DA) का भुगतान भी है कतार में
वित्तीय दबाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राज्य के सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों का 2 प्रतिशत महंगाई भत्ता (DA) भी लंबित है, जिसे बढ़ाए जाने का इंतजार कर्मचारी बेसब्री से कर रहे हैं। इस डीए बढ़ोतरी से हर महीने राजकोष पर करोड़ों रुपये का स्थायी वित्तीय भार बढ़ेगा। ऐसे में सरकार के सामने असमंजस यह है कि पहले कर्मचारियों को डीए की सौगात दी जाए या ट्रांसफर का आर्थिक बोझ उठाया जाए।
ट्रांसफर का ‘भारी-भरकम’ सरकारी खर्च
सिविल सेवा नियमों के मुताबिक, जब भी किसी कर्मचारी या शिक्षक का प्रशासनिक आधार पर तबादला होता है, तो सरकार को भारी-भरकम भुगतान करना पड़ता है:
- ट्रांसफर टीए (Transfer TA): कर्मचारी और उसके पूरे परिवार का यात्रा किराया।
- सामान धुलाई भत्ता: घर का सामान और गाड़ी शिफ्ट करने का वास्तविक ट्रक भाड़ा।
- एकमुश्त ट्रांसफर ग्रांट: नए शहर में बसने के लिए मूल वेतन (Basic Pay) का एक बड़ा हिस्सा एकमुश्त एडवांस के रूप में।
- जॉइनिंग टाइम का वेतन: ट्रांसफर के बाद मिलने वाले 10 से 15 दिनों के ‘ट्रांजिट पीरियड’ में बिना काम के पूरा वेतन और डीए देना पड़ता है।
इन तमाम खर्चों के कारण ही वित्त विभाग थोक तबादलों के पक्ष में खुलकर सामने आने से बच रहा है।
भूपेश सरकार के दौर का कड़ा अनुभव
शिक्षकों और कर्मचारियों में असमंजस इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि वे पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार का कार्यकाल देख चुके हैं। भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भी वित्तीय प्रबंधन और कोरोना का हवाला देकर लगभग तीन साल (2019 से 2022) तक तबादलों पर कड़ा प्रतिबंध लागू रहा था। कर्मचारी संगठन आशंकित हैं कि कहीं वित्तीय दबाव के चलते इस बार भी वैसा ही लंबा इंतजार न करना पड़ जाए।
जून कैबिनेट में ‘बीच का रास्ता’ निकलने की उम्मीद
तमाम वित्तीय चुनौतियों के बावजूद, जून के मध्य से शुरू हो रहे नए शैक्षणिक सत्र (2026-27) को देखते हुए साय कैबिनेट के सामने कर्मचारियों की मांग बेहद जायज है। सूत्रों का कहना है कि जून महीने की आगामी कैबिनेट बैठक में सरकार एक ‘बीच का रास्ता’ निकाल सकती है। राजकोष पर ज्यादा भार न पड़े, इसके लिए तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों, विशेषकर शिक्षकों के लिए महज 5 से 10 प्रतिशत की बेहद कड़ी सीमा (Cap) तय की जा सकती है और केवल 15 दिनों के लिए ही ट्रांसफर से बैन हटाया जा सकता है, जिसमें ‘स्वैच्छिक और पारस्परिक तबादलों’ (Mutual Transfers) को प्राथमिकता दी जा सकती है क्योंकि इनमें सरकार को कोई ट्रांसफर भत्ता नहीं देना पड़ता।
अब देखना होगा कि जून की कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कर्मचारियों की ‘बेचैनी’ दूर करते हैं या वित्त विभाग की ‘मितव्ययता’ हावी रहती है।
2025 की तबादला नीति का टाइमलाइन शेड्यूल
सरकार ने ट्रांसफर के आवेदन लेने से लेकर आदेश जारी करने के लिए एक बेहद सीमित और कड़ा शेड्यूल तय किया था:
- आवेदन की अवधि: 6 जून से 13 जून 2025 तक कर्मचारियों से ऑनलाइन/ऑफलाइन आवेदन लिए गए थे।
- तबादला प्रक्रिया (Transfer Window): 14 जून से 25 जून 2025 के बीच जिला और राज्य स्तर पर ट्रांसफर करने की अनुमति दी गई थी।
- बैन हटने की बढ़ी हुई मियाद: बाद में सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने अंतिम तारीख को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए 30 जून 2025 तक आदेश जारी करने और उन्हें पोर्टल पर अपलोड करने की छूट दी थी। 30 जून के बाद तबादलों पर वापस पूरी तरह से बैन लग गया था।
नीति की 3 मुख्य शर्तें (जो इस बार भी आधार बन सकती हैं)
पिछली नीति में सरकार ने कुछ कड़े मापदंड अपनाए थे ताकि प्रशासनिक व्यवस्था न बिगड़े:
- न्यूनतम सेवा अवधि: ट्रांसफर के लिए आवेदन करने हेतु कर्मचारी का वर्तमान स्थान पर कम से कम 2 वर्ष का सेवा काल पूरा होना अनिवार्य किया गया था।
- प्रतिशत की सीमा (Cap): थोक तबादलों को रोकने के लिए तृतीय श्रेणी (Class III) के कर्मचारियों के लिए अधिकतम 10% और चतुर्थ श्रेणी (Class IV) के कर्मचारियों के लिए अधिकतम 15% तबादलों की ही सीमा तय की गई थी।
- प्रभारी मंत्रियों का अनुमोदन: जिला स्तर के जितने भी तबादले थे, वे सभी जिलों के प्रभारी मंत्रियों (In-charge Ministers) के अनुमोदन के बाद ही जारी किए गए थे, जबकि राज्य स्तर के तबादलों में विभागीय मंत्रियों की स्वीकृति अनिवार्य थी।







