
रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने पावर ट्रांसमिशन कंपनी (CSPTCL) के आईपीओ (IPO) को मंजूरी दिए जाने की खबर के बाद अब बिजली गलियारों में एक नई और गंभीर बहस छिड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार सिर्फ ट्रांसमिशन कंपनी का शेयर बेच रही है या फिर इस एक फैसले के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से तीनों बिजली कंपनियों का भविष्य दांव पर लग गया है?
यह आशंका इसलिए मजबूत हो रही है क्योंकि साल 2022 के मर्जर (विलय) के बाद ट्रांसमिशन कंपनी के पास ही ‘होल्डिंग कंपनी‘ का सुपर-पावर (प्रशासनिक नियंत्रण) मौजूद है।
एक तीर से तीन शिकार? क्यों डरे हैं कर्मचारी
तकनीकी रूप से देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में जनरेशन (बिजली उत्पादन) और डिस्ट्रीब्यूशन (बिजली वितरण) कंपनियां अलग-अलग दिखती जरूर हैं, लेकिन इनका ‘रिमोट कंट्रोल’ ट्रांसमिशन कंपनी के मुख्यालय में ही बैठता है।
कर्मचारी संगठनों और जानकारों का मानना है कि चूंकि ट्रांसमिशन कंपनी का बोर्ड ही बाकी दोनों कंपनियों के लिए नीतिगत, प्रशासनिक और वित्तीय आदेश जारी करता है, इसलिए ट्रांसमिशन के शेयर बाजार में लिस्टेड होते ही उसका असर बाकी दोनों कंपनियों पर पड़ना तय है। कर्मचारी नेता इसी ‘प्रशासनिक पेच’ को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।
ये 3 बड़े तकनीकी कारण, जो इस आशंका को सच साबित करते हैं:
1. होल्डिंग का पावर यानी ‘कमांड सेंटर‘ अब बाजार के हवाले
विलय के बाद से होल्डिंग कंपनी का पूरा प्रशासनिक ढांचा ट्रांसमिशन में समाहित है। ट्रांसफर-पोस्टिंग, कॉमन कैडर के सर्विस रूल, अनुकंपा नियुक्ति की नीतियां और एचआर (HR) से जुड़े तमाम बड़े फैसले ट्रांसमिशन बोर्ड ही तय करता है। जब इस बोर्ड में निजी निवेशक या पब्लिक शेयरहोल्डर्स आकर बैठेंगे, तो उनके दबाव में जो नीतियां बनेंगी, वे जनरेशन और डिस्ट्रीब्यूशन के कर्मचारियों पर भी थोपी जाएंगी। यानी शेयर भले ट्रांसमिशन का बिकेगा, लेकिन असर तीनों कंपनियों के कर्मचारियों पर होगा।
2. डिस्ट्रीब्यूशन और जनरेशन की वित्तीय चाबी ट्रांसमिशन के पास
ट्रांसमिशन कंपनी का मुख्य काम जनरेशन कंपनी से बिजली लेकर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी तक पहुंचाना है, जिसके बदले वह दोनों से पैसे (टैरिफ/व्हीलिंग चार्ज) वसूलती है।
- अभी तक सरकारी ढर्रे में अगर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी घाटे में होती थी, तो सरकार या होल्डिंग कंपनी आपसी तालमेल से वित्तीय प्रबंधन कर लेती थी।
- लेकिन शेयर बाजार में आने के बाद ट्रांसमिशन कंपनी को पाई-पाई का हिसाब सेबी (SEBI) को देना होगा। वह डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी (CSPDCL) पर बकाया वसूलने के लिए कड़ा रुख अपनाएगी। ऐसे में डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी को मजबूरन बिजली दरें बढ़ानी पड़ेंगी या फिर अपने खर्चों में कटौती करनी होगी, जिसका सीधा असर आम जनता और कर्मचारियों पर पड़ेगा।
3. ‘रिलेटेड पार्टी‘ के नियमों का जाल
शेयर बाजार के नियमों के मुताबिक, जब कोई लिस्टेड कंपनी अपनी ही सहयोगी कंपनियों (जैसे जनरेशन और डिस्ट्रीब्यूशन) के साथ कोई बिजनेस करती है, तो उस पर निवेशकों की कड़ी नजर होती है। ट्रांसमिशन कंपनी अब अपनी मर्जी से जनरेशन या डिस्ट्रीब्यूशन को कोई रियायत नहीं दे पाएगी। इसका मतलब यह है कि ट्रांसमिशन को ‘प्रॉफिटेबल’ (मुनाफे में) बनाए रखने के लिए बाकी दोनों कंपनियों के वित्तीय हितों से समझौता करना पड़ सकता है।
कर्मचारी संगठनों का कड़ा सवाल- “यह बैकडोर एंट्री तो नहीं?”
बिजली कर्मचारी नेताओं की यही सबसे बड़ा संशय है कि यह कहीं “बैकडोर से पूरे पावर सेक्टर के कॉर्पोरेटाइजेशन (निजीकरण की ओर कदम)” की शुरुआत तो नहीं है?
कर्मचारियों का कहना है कि जब तीनों कंपनियों का प्रशासनिक ढांचा एक-दूसरे से गुंथा हुआ है, तो केवल एक कंपनी का आईपीओ लाकर उसे स्वतंत्र कैसे रखा जा सकता है? संचालक मंडल को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जब ट्रांसमिशन कंपनी के फैसलों से बाकी दोनों कंपनियां संचालित होती हैं, तो इस आईपीओ के बाद बनने वाली नई व्यवस्था में जनरेशन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की स्वायत्तता (Independence) कैसे सुरक्षित रहेगी?
‘एकतरफा फैसला उचित नहीं, पहले हो डेमोंसट्रेशन’: सुधीर नायक
इस पूरे मामले पर बिजली कर्मचारी नेता सुधीर नायक ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने सरकार के इस फैसले को एकतरफा बताते हुए कहा:
“बिना कर्मचारी संगठनों से सलाह-मशविरा किए, एकतरफा तरीके से छत्तीसगढ़ शासन द्वारा इतना बड़ा निर्णय लिया जाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के संचालक मंडल को चाहिए कि वे कर्मचारी संगठनों और पेंशनर संगठनों के सामने इस पूरे प्रपोजल का विस्तृत डेमोंसट्रेशन (प्रस्तुतीकरण) दें।”
कर्मचारी नेता ने सीधे तौर पर प्रबंधन और सरकार से सवाल किया है कि वर्तमान में सुचारू रूप से चल रही सरकारी कंपनी को अचानक आईपीओ (IPO) और शेयर मार्केट में लिस्टिंग की क्या आवश्यकता पड़ गई? उन्होंने मांग की है कि संपूर्ण जानकारी कर्मचारी संगठनों और आम कर्मचारियों के साथ साझा की जाए, ताकि वे समझ सकें कि भविष्य में विभाग का अगला कदम किस प्रकार होगा।







