
रायपुर (न्यूज डेस्क)। छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) में नियमों और कायदे-कानूनों को ताक पर एचटी (HT) औद्योगिक कनेक्शनों में बिना किसी पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया (Transparent Tender Process) के स्मार्ट मीटर लगाने का ठेका देने की अंदरूनी और गुपचुप तैयारी चल रही है। बिजली कंपनी के कुछ आला अधिकारियों की यह संदिग्ध कार्यप्रणाली न केवल पावर कंपनी के सालाना राजस्व (Revenue) के लिए बड़ा खतरा बन सकती है, बल्कि प्रदेश के लाखों आम बिजली उपभोक्ताओं के हितों पर भी सीधा प्रहार कर सकती है।
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी और विभागीय दस्तावेजों (Official Documents) से यह खुलासा हुआ है कि केंद्र सरकार की क्रय नीतियों और दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन करते हुए मौजूदा ठेकेदारों से ही गोपनीय तरीके से मूल्य (Quotes) ले लिए गए हैं। बिना कोई नया और पारदर्शी टेंडर आमंत्रित किए, करोड़ों रुपये के इस संवेदनशील ठेके को उन्हीं पुराने ठेकेदारों के हवाले करने का आधिकारिक प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है।
आर.डी.एस.एस. योजना के मूल टेंडर से क्यों बाहर रखे गए थे HT कनेक्शन?
केंद्र सरकार की प्रतिष्ठित पुनरुत्थान वितरण क्षेत्र योजना यानी आर.डी.एस.एस. (RDSS Scheme) के तहत वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ प्रदेश में स्मार्ट मीटर लगाने का व्यापक ठेका मेसर्स टाटा पावर (Tata Power) और जयपुर की जीनस ग्रुप (Genus Power) नाम की दो कंपनियों को दिया गया था।
उस समय तत्कालीन कंपनी प्रबंधन और तकनीकी विशेषज्ञों ने सोच-समझकर हाईेंशन (HT) औद्योगिक कनेक्शनों और बड़े लो-वोल्टेज औद्योगिक कनेक्शनों को इस टेंडर से पूरी तरह बाहर रखा था। इसके पीछे मुख्य वजह यह थी कि इन औद्योगिक कनेक्शनों में भारी-भरकम राशि के बिजली बिल आते हैं, और इनमें हाई-करंट आपूर्ति होने के कारण मुख्यालय (Headquarters) से सीधे लाइन काटने की प्रीपेड व्यवस्था तकनीकी रूप से काफी जोखिमभरी और अव्यावहारिक थी।
केंद्र सरकार की गाइडलाइंस और ‘FAQ’ का भी उल्लंघन
गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा आर.डी.एस.एस. (RDSS) योजना के संचालन के लिए जारी की गई गाइडलाइंस और ‘फ्रीक्वेंटली आस्क्ड क्वेश्चंस’ (FAQ) में भी यह बात पूरी तरह साफ की गई थी। केंद्र ने स्पष्ट कहा था कि चूंकि औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए प्रयुक्त होने वाले विशेष स्मार्ट मीटर बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए ऐसे कनेक्शनों में केवल ऑटोमैटिक मीटर रीडिंग या दूरवर्ती मीटर रीडिंग (AMR System) प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।
क्योंकि छत्तीसगढ़ में बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी अपने स्वयं के संसाधनों से पिछले 10 वर्षों से AMR प्रणाली को सफलतापूर्व लागू कर चुकी है, इसलिए यहां अलग से नया प्रावधान करने की कोई तकनीकी या प्रशासनिक आवश्यकता ही नहीं थी। इसके बावजूद पहले बड़े लो-वोल्टेज और अब 3 साल बाद HT औद्योगिक कनेक्शनों का ठेका बिना टेंडर के देने का खेल शुरू कर दिया गया है।
बिजली कंपनी के राजस्व की रीढ़ हैं 4,200 औद्योगिक कनेक्शन
यहाँ यह समझना बेहद आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ की विद्युत वितरण व्यवस्था में HT यानी उच्च दाब औद्योगिक कनेक्शनों की क्या भूमिका है। वर्तमान में राज्य में लगभग 4,200 ऐसे बड़े औद्योगिक कनेक्शन हैं, जिन्हें 11 के.वी. (11 KV) या उससे अधिक की उच्च क्षमता पर बिजली की निर्बाध आपूर्ति की जाती है।
बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी को हर महीने प्राप्त होने वाले कुल राजस्व (Total Revenue) का लगभग 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले इन्हीं 4200 औद्योगिक उपभोक्ताओं से हासिल होता है। इसी भारी-भरकम राजस्व की बदौलत बिजली कंपनी पूरे प्रदेश के आम घरेलू उपभोक्ताओं, बीपीएल (BPL) परिवारों और किसानों को सस्ती तथा रियायती दरों (Affordable Tariffs) पर बिजली उपलब्ध करा पाती है।
100% वसूली वाली व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की जिद क्यों?
विभागीय आंकड़ों और जानकारों के मुताबिक, HT कनेक्शनों की निगरानी के लिए बिजली कंपनी का एक अलग और समर्पित विशेष विभाग काम करता है। इस सख्त निगरानी और AMR तकनीक की वजह से इन कनेक्शनों में बिजली चोरी (Electricity Theft) की गुंजाइश शून्य (Zero Percent) हो चुकी है। इन उपभोक्ताओं से 100% राजस्व की शत-प्रतिशत समय पर वसूली होती है और कोई भी बकाया शेष नहीं रहता।
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जो व्यवस्था पहले से बेहद कुशलता और पारदर्शिता के साथ संचालित हो रही है, उसे उखाड़कर निजी ठेकेदारों (Private Contractors) के हवाले क्यों किया जा रहा है? इतने बड़े और संवेदनशील राजस्व स्रोत को ठेकेदारों के हाथ में सौंपना पूरी विद्युत व्यवस्था को गहरे संकट में डाल सकता है।
देशभर में स्मार्ट मीटरों का विरोध, फिर भी ठेकेदारों पर मेहरबानी!
स्मार्ट मीटरों में अचानक ज्यादा बिल आने, तकनीकी खराबी होने और पारदर्शी व्यवस्था न होने के कारण न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश में भारी जन-आक्रोश और विरोध (Public Protest) देखने को मिल रहा है। देश के सबसे बड़े उपभोक्ता आधार वाले राज्य उत्तर प्रदेश में तो विरोध के बाद स्मार्ट मीटर लगाने का काम पूरी तरह बंद तक कर दिया गया है।
अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो निर्धारित समय-सीमा में 6 महीने की विशेष वृद्धि किए जाने के बाद भी प्रदेश के 60 लाख लक्षित उपभोक्ताओं में से अब तक केवल लगभग 40 लाख स्मार्ट मीटर ही स्थापित किए जा सके हैं। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इन 40 लाख स्मार्ट मीटरों में से किसी भी एक जगह अब तक कार्यशील प्रीपेड व्यवस्था (Prepaid System) शुरू नहीं हो सकी है।
लेकिन इसके बावजूद, ठेकेदार कंपनियों को हर महीने प्रीपेड मीटरिंग के नाम पर बिलों का पूरा भुगतान नियमित रूप से किया जा रहा है। उद्योग जगत के सूत्रों का दावा है कि पूरे देश में बिहार के एक छोटे इलाके को छोड़कर कहीं भी प्रीपेड स्मार्ट मीटर प्रणाली काम नहीं कर रही है।
क्या किसी बड़े वित्तीय घोटाले की रची जा रही है साजिश?
एक तरफ जहाँ आम जनता स्मार्ट मीटरों की गड़बड़ियों से त्रस्त है, वहीं दूसरी ओर बिजली कंपनी के कुछ जिम्मेदार अफसर शत-प्रतिशत राजस्व देने वाले HT औद्योगिक कनेक्शनों की मजबूत प्रणाली को खत्म कर निजी कंपनियों की जेब भरने में लगे हैं।
बिना किसी पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया, बिना किसी खुली प्रतिस्पर्धा (Open Competition) और केंद्र की नीतियों को ताक पर रखकर पुरानी कंपनियों को करोड़ों का काम सौंपने का यह प्रस्ताव न केवल प्रशासनिक नैतिकता के खिलाफ है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक बड़े वित्तीय घोटाले (Financial Scam) और गहरी साजिश की ओर साफ इशारा कर रहा है।
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