
नवा रायपुर अटल नगर (chaturpost.com)। छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाने वाले एक बेहद आक्रामक विदेशी पौधे को लेकर बहुत बड़ा और सख्त फैसला लिया है। शासन के आवास एवं पर्यावरण विभाग ने छत्तीसगढ़ राजपत्र (Chhattisgarh Gazette) में एक विशेष अधिसूचना जारी कर कोनोकार्पस (Conocarpus) प्रजाति के पौधों के नए वृक्षारोपण पर तत्काल प्रभाव से पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है।
यह सरकारी आदेश छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के नाम से तथा आदेशानुसार विभाग के विशेष सचिव देवेन्द्र सिंह भारद्वाज द्वारा जारी किया गया है। सरकार का यह कदम राज्य की स्थानीय जैव विविधता और पर्यावरण को बचाने के लिए उठाया गया एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट के बाद मचा हड़कंप
वास्तव में (In fact), इस कड़े फैसले के पीछे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के आदेशों के बाद गठित की गई ‘केन्द्रीय सशक्त समिति’ (Central Empowered Committee – CEC) की एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट है। समिति ने 21 अगस्त, 2025 को “भारत में कोनोकार्पस प्रजातियों से उत्पन्न पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय जोखिम” विषय पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।
इस वैज्ञानिक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया था कि कोनोकार्पस इरेक्टस (Conocarpus erectus) एक अत्यंत आक्रामक वनस्पति प्रजाति (Invasive Species) है। इसके लगातार बढ़ते चलन के कारण पर्यावरण को ऐसे नुकसान हो रहे हैं, जिनकी भरपाई करना मुश्किल है।
क्यों खतरनाक है कोनोकार्पस? जानिए 4 बड़े कारण
इसके परिणामस्वरूप (As a result), छत्तीसगढ़ शासन का यह दृढ़ मत है कि पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन के हित में इस पौधे पर तत्काल निवारक कार्रवाई करना बेहद जरूरी हो गया था। सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) के प्रतिवेदन के अनुसार इस पौधे से होने वाले प्रमुख नुकसान निम्नलिखित हैं:
- स्थानीय जैव विविधता को खतरा: कोनोकार्पस इरेक्टस एक अत्यंत आक्रामक वनस्पति प्रजाति (Invasive Species) है, जो अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण को बिगाड़ देती है और स्थानीय पेड़-पौधों व जैव विविधता (Native Biodiversity) पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालती है。
- प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान: यह विदेशी प्रजाति जहां भी लगाई जाती है, वहां के स्थानीय और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Local Ecosystems) के संतुलन को पूरी तरह से तहस-नहस कर देती है。
- भू-जल संसाधनों का भारी दोहन: कोनोकार्पस की जड़ें ज़मीन के भीतर बहुत गहराई तक जाती हैं, जिसके कारण यह स्थानीय भू-जल संसाधनों (Groundwater Resources) का अत्यधिक शोषण करता है और आसपास के जलस्तर को तेजी से गिरा देता है。
- जनस्वास्थ्य (पब्लिक हेल्थ) पर बुरा असर: इस पौधे के पनपने और इसके परागकणों के हवा में फैलने से मानव स्वास्थ्य (Public Health) पर बहुत बुरा असर पड़ता है, जिससे लोगों में सांस, दमा और त्वचा से जुड़ी एलर्जी जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं。
राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के कड़े निर्देश
निश्चित रूप से (Certainly), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने राजपत्र में साफ और कड़े निर्देश जारी किए हैं:
- नए वृक्षारोपण पर पूर्ण रोक: छत्तीसगढ़ राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर अब कोई भी व्यक्ति, स्थानीय प्राधिकारी (जैसे नगर निगम/पालिका), शासकीय विभाग, शासकीय या अर्द्धशासकीय अभिकरण, स्वायत्त संस्था या सार्वजनिक उपक्रम कोनोकार्पस प्रजाति का नया वृक्षारोपण नहीं करेगा और न ही कराएगा।
- तत्काल प्रभाव से लागू: यह आदेश 7 जुलाई 2026 को राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से ही पूरे प्रदेश में तत्काल प्रभावशील हो गया है।
- चरणबद्ध तरीके से हटाने की योजना: केंद्रीय समिति की अनुशंसा के आधार पर, वर्तमान में जहाँ भी यह पौधे लगे हुए हैं, उन्हें आने वाले समय में चरणबद्ध रूप से हटाकर उनकी जगह उपयुक्त देशी प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे।
जनहित में बाईपास की गई आपत्तियों की प्रक्रिया
इसके अतिरिक्त (In addition), यह मामला इतना गंभीर था कि राज्य शासन ने पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 के नियम 4 के उपनियम (5) का सहारा लिया। सरकार का साफ मानना है कि पर्यावरण को हो रहे नुकसान को देखते हुए इस प्रकरण में आम जनता से आपत्तियां या अभ्यावेदन (Objections and Representations) आमंत्रित करने की लंबी प्रक्रिया का अनुपालन करना लोकहित में आवश्यक नहीं था, क्योंकि इसमें देरी से नुकसान और बढ़ता।
यही कारण है कि (That’s why), सरकार ने बिना समय गंवाए सीधे प्रतिबंध लगाने की अधिसूचना जारी कर दी। अब यदि कोई भी नर्सरी इसका विक्रय करती है या कोई विभाग इसे लगाता पाया गया, तो पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत भारी अर्थदंड और दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है।
बदलेगा शहरों का लैंडस्केप, अब देशी पौधों पर ज़ोर
अंततः (Ultimately), इस फैसले के बाद अब छत्तीसगढ़ के शहरों के सौंदर्यीकरण (Beautification) का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा। अब तक जो नगर निगम या विकास प्राधिकरण डिवाइडरों और उद्यानों में तेजी से बढ़ने वाले कोनोकार्पस को लगाते थे, उन्हें अब नीम, पीपल, बरगद, करंज और अमलतास जैसी उपयोगी देशी प्रजातियों को प्राथमिकता देनी होगी। विशेषज्ञों ने सरकार के इस त्वरित और कड़े फैसले का स्वागत किया है।
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