
लेखक: विकास शर्मा (प्रबंधक – जनसंपर्क एवं औद्योगिक संबंध, छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड)
वैश्विक तनाव की पृष्ठभूमि और गर्मी के मौसम में बढ़ते पारे ने निर्बाध बिजली आपूर्ति को अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। देश की अधिकतम विद्युत मांग विगत वर्षों में लगातार बढ़ी है। जीवाश्म ईंधन के स्थान पर हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते भारत में विद्युत मांग में बढ़ोत्तरी से संकेत स्पष्ट हैं कि विद्युत क्षेत्र के लिए नई चुनौतियाँ आने वाली हैं।
इस वृद्धि के कारकों में मौसम तो है ही पर हमें ध्यान देना होगा कि अब देश में तेजी से परिवहन से लेकर रसोई घर तक बिजली, ईंधन बनकर दौड़ रही है। यह सकारात्मक संकेत हैं कि विद्युत मांग में वृद्धि को देखते हुए दीर्घकालिक उपायों पर काम तेजी से चल रहा है पर यह भी जरूरी है कि एक नागरिक के नाते हम अपनी भूमिका निभाएं।
पीक डिमांड है चुनौती (Peak Demand Challenge)
पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता कम करने के प्रयासों का सीधा असर विद्युत क्षेत्र पर पड़ा है। वर्ष 2014 में देश में पीक डिमांड 148 गीगावॉट थी जो बढ़कर इस वर्ष 25 अप्रैल को 256 गीगावॉट तक आ चुकी है।
अब दो करोड़ ई-चूल्हा और लगभग 2.8 करोड़ ई-व्हीकल विद्युत खपत में और वृद्धि करने जा रहे हैं। सीईए (CEA), ऊर्जा दक्षता ब्यूरो समेत विभिन्न संस्थाओं के अध्ययनों के आधार पर अनुमान है कि:
- ई-चुल्हे से: 27 गीगावॉट तक विद्युत की मांग बढ़ सकती है।
- ई-व्हीकल से: 40 गीगावॉट तक विद्युत की मांग बढ़ सकती है।
इसके अलावा, देश में बीते पाँच वर्षों में एयरकंडिशनर (एसी) का उपयोग दोगुना हो गया है और प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।
क्या है स्मार्ट ग्रिड प्रणाली? (Smart Grid System)
बढ़ती विद्युत मांग से निपटने के लिए पॉवर सेक्टर में कई सुधार और नवाचार किए जा रहे हैं। उत्पादन, पारेषण और वितरण के बीच बेहतर समन्वय, बढ़ती किन्तु असमान मांग से निपटने में सबसे बेहतर विकल्प है।
असल में यह वो प्रणाली है जिसमें विद्युत उत्पादन, वितरण और खपत तीनों को वास्तविक समय (रीयल टाइम) में समझा और नियंत्रित किया जा सके। इसी पूरी प्रणाली का हिस्सा है स्मार्ट मीटर, डिमांड रिस्पांस, स्मार्ट उपकरणों तथा हरित ऊर्जा का नियोजित समन्वय।
मांग प्रबंधन: एक बेहतर विकल्प (Demand Side Management)
स्मार्ट ग्रिड प्रणाली का बड़ा फायदा मांग प्रबंधन के तौर पर होता है। मांग प्रबंधन का अर्थ यह है कि बिजली की मांग बढ़ जाने पर उपभोक्ताओं को खपत कम करने के लिए प्रेरित करना।
इस प्रकार की व्यवस्था निर्मित होने से पीक ऑवर में आम उपभोक्ताओं को अपनी खपत को संतुलित एवं नियंत्रित करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके लिए उपभोक्ताओं को प्रोत्साहन के तौर पर नॉन-पीक आवर में खपत करने पर छूट जैसे विकल्प अपनाए जाते हैं। विकसित देशों में जहाँ बिजली की खपत हमारे देश से कई गुना अधिक है, वहाँ इस प्रकार से प्रबंधन किया जाता है।
स्मार्ट उपभोक्ता और स्मार्ट मीटर की भूमिका
विद्युत उत्पादन, वितरण और खपत के बीच संतुलन के लिए ग्रिड प्रबंधन एक विकल्प है जिसकी सफलता स्मार्ट मीटरों के अधिकाधिक उपयोग पर निर्भर है। इसकी सहायता से:
- विद्युत उपभोक्ता जहाँ अपनी विद्युत खपत की निगरानी कर सकता है।
- वहीं विद्युत कंपनियाँ पल-प्रतिपल विद्युत मांग और खपत की जानकारी एकत्र कर आगामी योजना पर काम कर सकती हैं।
इससे बिजली चोरी रोकने में सफलता मिलती है, वहीं वितरण हानि में कमी आने से अंततः उपभोक्ता को बेहतर सुविधा मिलती है। भारत से कई गुना अधिक खपत करने वाले विकसित राष्ट्रों में विद्युत मांग की सुगम आपूर्ति स्मार्ट ग्रिड प्रणाली से ही संभव हो पा रही है। इस प्रणाली के माध्यम से ऊर्जा अनुशासन बनाए रखना संभव होता है।
ऊर्जा सम्पन्नता बनाम ऊर्जा साक्षरता (Energy Literacy)
ऊर्जा सम्पन्नता को अनियंत्रित उपयोग की छूट समझ लेना बड़ी चूक है। दुर्भाग्य से हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को लेकर संवेदनशीलता कम ही नजर आती है। विद्युत संपन्नता जहाँ विद्युत अपव्यय की अनुमति नहीं देती, वहीं ऊर्जा संरक्षण का अर्थ विद्युत सुविधा छोड़ना नहीं बल्कि संतुलित उपयोग से है।
विकसित राष्ट्रों में ऊर्जा साक्षरता पर बड़ा जोर दिया जाता है। भारत में आंकड़ों की स्थिति इस प्रकार है:
| उपभोक्ता वर्ग | संख्या / हिस्सेदारी | बिजली खपत प्रतिशत |
| घरेलू उपभोक्ता | 28 करोड़ से अधिक | लगभग 25% |
| औद्योगिक उपभोक्ता | – | लगभग 42% |
यदि इन लोगों में ऊर्जा साक्षरता पर बल दिया जाए तो थोड़ी बचत भी करोड़ों यूनिट बिजली की बर्बादी रोक सकती है।
राष्ट्रहित के लिए ऊर्जा संरक्षण
विकसित होने के लिए ऊर्जा खपत ही महत्वपूर्ण नहीं, अधिक उपयोग की जगह स्मार्ट और जिम्मेदार उपयोग अधिक आवश्यक है। नागरिक, सरकार और उद्योग सभी स्तर पर ऊर्जा बचत जीवन शैली का हिस्सा बने। ऊर्जा समृद्ध होने के साथ ही ऊर्जा दक्ष होना भी आवश्यक है।
सामान्य से लेकर विशेष वर्ग में ऊर्जा अनुशासन और ऊर्जा साक्षरता की कमी विकसित भारत की संकल्पना में बड़ी चुनौती साबित होगी। ऐसे में बिजली के संतुलित और अधिकतम उपयोग के लिए सजग होना होगा।
निष्कर्ष: हमें समझना होगा कि बिजली की बचत, हमारी जेब के लिए नहीं, राष्ट्रहित और पर्यावरण की रक्षा के लिए सबसे अधिक जरूरी है।







