
नई दिल्ली (न्यूज डेस्क)। भारत के बिजली और ऊर्जा क्षेत्र (Power & Energy Sector) से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। देश की दो दिग्गज सरकारी कंपनियों, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PFC) और आरईसी लिमिटेड (REC) के विलय को भारत के माननीय राष्ट्रपति (Hon’ble President of India) ने अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब दोनों कंपनियां मिलकर एक हो जाएंगी। रेल और बैंकिंग के बाद सरकारी सेक्टर का यह अब तक का सबसे बड़ा एकीकरण (Consolidation) माना जा रहा है। विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power) ने 10 जून 2026 को पत्र जारी कर इस महा-विलय (Amalgamation) की आधिकारिक पुष्टि कर दी है।
क्यों हुआ यह फैसला? जानिए “विकसित भारत” का कनेक्शन
यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। दरअसल, यह महा-विलय केंद्र सरकार की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। केंद्रीय बजट 2026 (Union Budget 2026) में सरकार ने “Viksit Bharat” फ्रेमवर्क के तहत सरकारी नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के पुनर्गठन (Restructuring) का ऐलान किया था।
इस कदम का मुख्य उद्देश्य देश की ऊर्जा परियोजनाओं को और अधिक रफ्तार देना है। इस फैसले की क्रोनोलॉजी कुछ इस प्रकार है:
- 06 फरवरी 2026: PFC के बोर्ड ने विलय के लिए सैद्धांतिक मंजूरी (In-principle approval) दी थी।
- 16 मई 2026: दोनों कंपनियों के बोर्ड ने इस प्रस्ताव को अंतिम मुहर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजने का निर्णय लिया।
- 10 जून 2026: महामहिम राष्ट्रपति की ओर से इस डील को हरी झंडी मिल गई।
कैसे काम करेगा नया ढांचा? (Merger Structure)
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230-232 (Sections 230–232 of the Companies Act, 2013) के तहत इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया जाएगा।
इस बड़े बदलाव के बाद:
- REC लिमिटेड का पूरी तरह से PFC में विलय हो जाएगा।
- विलय के बाद PFC ही मुख्य कंपनी (Surviving Entity) के रूप में बनी रहेगी।
- REC की सभी संपत्तियां (Assets) और देनदारियां (Liabilities) अब PFC के नाम हो जाएंगी।
- इस प्रक्रिया के पूरे होते ही REC का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त (Cease to exist) हो जाएगा।
राहत की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान और इसके बाद भी, नई संयुक्त कंपनी का सरकारी कंपनी (Government Company) का दर्जा पूरी तरह बरकरार रहेगा।
इतिहास के पन्नों में PFC और REC
यह दोनों ही कंपनियां विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली महारत्न (Maharatna NBFCs) कंपनियां हैं, जो भारत के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को लोन देने का काम करती हैं।
- PFC की स्थापना: साल 1986 में हुई थी।
- REC की स्थापना: साल 1969 में ग्रामीण विद्युतीकरण कॉर्पोरेशन के रूप में हुई थी।
इससे पहले मार्च 2019 में, सरकार ने REC में अपनी 52.63% हिस्सेदारी को लगभग 14,500 करोड़ रुपये में PFC को बेच दिया था। तब से REC, पीएफसी की एक सहायक कंपनी (Subsidiary) के रूप में काम कर रही थी।
क्या कम हो जाएगी सरकार की हिस्सेदारी? (Ownership Implications)
इस विलय के बाद एक तकनीकी पेंच भी फंसता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, विलय के बाद संयुक्त इकाई में सरकार की ओनरशिप (Government Ownership) 51% के न्यूनतम स्तर से नीचे गिर सकती है।
हालांकि, सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए कैपिटल रिस्ट्रक्चरिंग या नई पूंजी डालने (Capital Infusion) पर विचार कर रही है। आने वाले समय में फाइनल शेयर स्वैप रेशियो (Share Swap Ratio) के जरिए इस मुद्दे को पूरी तरह सुलझा लिया जाएगा।
महत्वपूर्ण बिंदु: आम जनता और निवेशकों पर क्या होगा असर?
Chaturpost Verdict: सरकार का यह कदम देश के पावर सेक्टर को आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर का बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। शेयर बाजार के निवेशकों को फिलहाल आधिकारिक स्वैप रेशियो के एलान का इंतजार करना चाहिए।







