कर्मचारी हलचल

पड़ोसी राज्यों में संविदा कर्मियों की चमकी किस्मत, छत्तीसगढ़ में गूंजा सवाल- ‘मोदी की गारंटी’ का 100 दिन का वादा कब होगा पूरा?

चतुरपोस्ट डेस्क रायपुर।

पंजाब और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा संविदा व आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने के ऐतिहासिक फैसलों ने छत्तीसगढ़ के संविदा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। पड़ोसी राज्यों में संविदा कर्मियों को मिली बड़ी सौगात के बाद अब छत्तीसगढ़ के लाखों कर्मचारियों के परिवारों ने साय सरकार को ‘मोदी की गारंटी’ (Modi Ki Guarantee) का वो वादा याद दिलाना शुरू कर दिया है, जिसमें सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर ही कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों को मिलाकर एक हाई-लेवल कमिटी बनाने की बात कही गई थी।

छत्तीसगढ़ का संविदा नेटवर्क: 2 लाख से अधिक परिवारों का भविष्य दांव पर

छत्तीसगढ़ में वर्कफोर्स मैनेजमेंट (Workforce Management) के तहत संविदा और अनियमित कर्मचारियों की संख्या बहुत बड़ी है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो प्रदेश में इस वक्त विभिन्न सरकारी विभागों में लगभग 45,000 से अधिक संविदा कर्मचारी और करीब 1.80 लाख अनियमित व दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

इन सभी विभागों के कर्मचारियों में लंबे समय से वेतन विसंगति (Pay Anomaly) और समान कार्य-समान वेतन न मिलने को लेकर असंतोष की स्थिति देखी जाती रही है।

क्या थी ‘मोदी की गारंटी’ की वो मूल घोषणा?

छत्तीसगढ़ भाजपा के 2023 के आधिकारिक संकल्प पत्र में संविदा और अनियमित कर्मचारियों के लिए स्पष्ट रूप से नीतिगत निर्णय (Policy Decision) दर्ज है, जिसे अब कर्मचारी संगठन सोशल मीडिया पर पुरज़ोर तरीके से उठा रहे हैं। घोषणा पत्र के मुताबिक:

“हम सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर छत्तीसगढ़ के सरकारी विभागों में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों की समस्याओं एवं मांगों की समीक्षात्मक प्रक्रिया आरम्भ करने एवं मार्ग प्रशस्त करने हेतु एक कमिटी का गठन करेंगे जिसमें अनियमित कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारी भी सदस्य होंगे।”

एमपी और पंजाब के फैसलों से साय सरकार पर बढ़ा प्रशासनिक दबाव

छत्तीसगढ़ के कर्मचारी संघों का कहना है कि जब मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार अनुकंपा पर नियुक्त संविदा कर्मियों को सीधे नियमित पदों पर नवीन नियुक्ति दे सकती है, और पंजाब की भगवंत मान सरकार ‘आउटसोर्स पर्सनल विधेयक-2026’ लाकर 65,000 से अधिक कर्मचारियों को सीधे सरकारी अनुबंध के दायरे में ला सकती है, तो छत्तीसगढ़ में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

कर्मचारी नेताओं के मुताबिक, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की प्रशासनिक संरचना काफी हद तक समान है। ऐसे में मध्य प्रदेश के ऊर्जा विभाग का आदेश छत्तीसगढ़ के लिए एक बेहतरीन नज़ीर या मॉडल फ्रेमवर्क (Model Framework) बन सकता है। पड़ोसी राज्यों के इन फैसलों ने छत्तीसगढ़ के संविदा कर्मचारी महासंघों को अपनी मांगों को लेकर दोबारा लामबंद होने का एक बड़ा मौका दे दिया है।

एक्सपर्ट ओपिनियन: क्या हैं प्रशासनिक अड़चनें और आगे की राह?

चतुरपोस्ट के प्रशासनिक और वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि संविदा नियमितीकरण (Regularization of Contractual Employees) का मुद्दा केवल नीतिगत नहीं बल्कि भारी वित्तीय उत्तरदायित्व (Financial Accountability) से भी जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ जैसे विकासशील राज्य में एक साथ दो लाख से अधिक कर्मचारियों को नियमित वेतनमान और भत्ते देना सरकारी खजाने पर बड़ा असर डालता है।

यही कारण है कि सरकारें इस प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध (Time-bound Process) बनाने के लिए कानूनी व वित्तीय पहलुओं की बारीक जांच करवाती हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि यदि साय सरकार मध्य प्रदेश की तरह चरणबद्ध तरीके से, यानी पहले चरण में सबसे महत्वपूर्ण या रिस्की जॉब्स वाले विभागों को प्राथमिकता दे, तो बिना किसी बड़े वित्तीय संकट के इस गारंटी को पूरा किया जा सकता है।

S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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