
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) अंबिकापुर में हुए करोड़ों रुपये के कथित वित्तीय घोटाले (Financial Scam) की जांच में ढीली कार्यप्रणाली को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने जांच में तेजी लाने (Speedy Investigation) का निर्देश देते हुए पुलिस प्रशासन को जवाबदेह बनाया है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा (Chief Justice Ramesh Sinha) और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच (Division Bench) ने सरगुजा पुलिस को बेहद कड़ा आदेश (Strict Order) जारी किया है। माननीय अदालत ने स्पष्ट कहा है कि पुलिस इस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच (Impartial Investigation) को शीघ्र पूरा करे और चार सप्ताह के भीतर सक्षम न्यायालय में अंतिम रिपोर्ट (Final Report) अथवा चार्जशीट प्रस्तुत करे।
क्या है पूरा मामला (Case Background)?
यह पूरा आदेश आरटीआई कार्यकर्ता डीके सोनी की ओर से दायर एक आपराधिक याचिका (Criminal Petition) पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। याचिकाकर्ता (Petitioner) के अनुसार, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अंबिकापुर के निर्देश पर 27 अप्रैल 2025 को अंबिकापुर थाने में एक एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी।
इस मामले में तत्कालीन अधिकारियों और ठेकेदारों (Contractors) के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust), धोखाधड़ी (Cheating), जालसाजी (Forgery) और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल (Use of Fake Documents) सहित विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया था।
इस तरह दिया गया वारदात को अंजाम
आरोप है कि बिजली कंपनी के तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों ने निजी ठेकेदारों के साथ मिलकर एक सोची-समझी साजिश (Conspiracy) रची। इस कथित मिलीभगत के तहत:
- फर्जी हाजिरी (Fake Attendance): कर्मियों की झूठी उपस्थिति दर्ज कराई गई।
- जाली दस्तावेज (Forged Documents): फर्जी ईपीएफ (EPF) और ईएसआई (ESI) दस्तावेज तैयार किए गए।
- अवैध भुगतान (Illegal Payment): बैंकों से सांठगांठ कर अवैध रूप से सरकारी राशि का आहरण किया गया।
इस पूरी जालसाजी के कारण सरकारी बिजली कंपनी को करीब 1 करोड़ 82 लाख 86 हजार 907 रुपये का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान (Financial Loss) उठाना पड़ा।
जांच में देरी पर हाई कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता
हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता स्वेक्षा शर्मा ने अदालत को बताया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद एक लंबा समय बीत चुका है, लेकिन अब तक न तो पुलिस द्वारा चार्जशीट (Chargesheet) पेश की गई और न ही कोई अंतिम रिपोर्ट दाखिल हुई।
अधिवक्ता ने कोर्ट को यह भी अवगत कराया कि कुछ मुख्य आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं (Anticipatory Bail Pleasures) निचली अदालत से खारिज भी हो चुकी हैं, जबकि महज एक आरोपी को हाई कोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। इसके बावजूद सरगुजा पुलिस की जांच अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही थी, जो कि न्याय प्रक्रिया में देरी (Delay in Justice) को दर्शाता है।
सरकार और पुलिस ने कहा- अंतिम चरण में है जांच
सुनवाई के दौरान जब डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार (State Government) से जांच की प्रगति (Investigation Progress) और चार्जशीट दाखिल करने की समय-सीमा पर सीधा जवाब मांगा, तब सरकार की ओर से उपस्थित अधिवक्ता प्रियंक राठी ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने अदालत को आश्वासन (Assurance) दिया कि पुलिस की जांच अब अंतिम चरण (Final Stage) में है। उन्होंने रिपोर्ट और चार्जशीट प्रस्तुत करने के लिए न्यायालय से चार सप्ताह का समय मांगा।
हाई कोर्ट का अंतिम अल्टीमेटम
राज्य सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मामले को लटकाने की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म कर दिया है। कोर्ट ने सरगुजा पुलिस को आदेशित किया है कि आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) प्राप्त होने के ठीक चार सप्ताह के भीतर हर हाल में निष्पक्ष जांच पूरी की जाए और कानून के अनुसार सक्षम न्यायालय में अंतिम चालान पेश किया जाए। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।







