
रायपुर/लेह: भारत सरकार की ‘महारत्न’ कंपनी REC लिमिटेड के सीएमडी (CMD) के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस समय लद्दाख के महत्वपूर्ण दौरे पर है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इस दौरे के शेड्यूल में ‘पावर कंपनी के निजीकरण’ का एजेंडा भी शामिल है, जिसने देशभर के बिजली विभाग के कर्मचारियों के बीच हलचल मचा दी है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियां सक्रिय हैं, वहाँ इस दौरे को लेकर काफी चर्चा है।
निजीकरण पर बड़ी प्रस्तुति (Presentation)
दस्तावेजों के मुताबिक, 09 मई को लद्दाख के मुख्य सचिव के साथ होने वाली बैठक में LPDD (लद्दाख पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट) के निजीकरण पर एक विशेष प्रेजेंटेशन दिया जाना है। हालांकि स्थानीय प्रशासन इसे केवल एक सुधार प्रक्रिया बता रहा है, लेकिन आधिकारिक एजेंडे में ‘निजीकरण’ शब्द का उल्लेख बिजली कर्मचारी संघों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
भ्रम की स्थिति: जहाँ एक तरफ दस्तावेजों में निजीकरण पर प्रेजेंटेशन की बात है, वहीं 07 मई 2026 को लद्दाख के मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में LPDD के निजीकरण की कोई योजना नहीं है और इसे लेकर फैल रही खबरें केवल अफवाहें हैं। हालांकि, प्रशासन ने माना है कि वे सुधारों के लिए ‘पावर कॉर्पोरेशन’ बनाने की संभावना तलाश रहे हैं।
सियाचिन तक ग्रिड कनेक्टिविटी की समीक्षा
निजीकरण के एजेंडे के साथ-साथ यह टीम रणनीतिक रूप से भी अहम काम कर रही है:
- सेना के साथ बैठक: टीम ने 07 मई को 14वीं कोर के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला से मुलाकात की।
- दुर्गम क्षेत्रों का दौरा: सैन्य चॉपर के जरिए टीम सियाचिन बेस कैंप और डिस्कित पहुंची, ताकि दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र तक ग्रिड के जरिए बिजली पहुंचाने के कार्यों की समीक्षा की जा सके।
देशभर में निजीकरण की सुगबुगाहट: कर्मचारी क्यों हैं चिंतित?
लद्दाख का यह मामला केवल एक केंद्र शासित प्रदेश तक सीमित नहीं है। इसे देशभर में लागू होने वाले संभावित मॉडल के रूप में देखा जा रहा है:
- उत्तर प्रदेश का उदाहरण: यूपी में बिजली कर्मचारी और इंजीनियर करीब 400 से अधिक दिनों से निजीकरण के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं।
- कर्मचारियों का तर्क: बिजली कर्मियों का मानना है कि निजीकरण से न केवल सरकारी नौकरियों और पेंशन पर खतरा बढ़ेगा, बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए बिजली महंगी हो जाएगी।
- राज्यों का अलग-अलग रुख: जहाँ ओडिशा में निजीकरण के बाद तकनीकी घाटे कम हुए हैं, वहीं चंडीगढ़ में यह प्रक्रिया भारी विरोध और कानूनी पेचों के कारण अटकी हुई है।
प्रमुख राज्यों की स्थिति और चुनौतियाँ
विभिन्न राज्य सरकारें इस मुद्दे पर बंटी हुई हैं:
| राज्य/क्षेत्र | वर्तमान स्थिति | मुख्य बिंदु |
| लद्दाख | सुधारों पर विचार | प्रशासन ने कहा है कि कर्मचारी सरकारी ही रहेंगे, केवल भविष्य की नियुक्तियाँ कॉर्पोरेशन स्तर पर हो सकती हैं। |
| उत्तर प्रदेश | भारी विरोध | सरकार दक्षता सुधारने के लिए निजी भागीदारी चाहती है, जबकि कर्मचारी उत्पीड़न और नौकरी की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। |
| ओडिशा | सफल उदाहरण | यहाँ निजीकरण के बाद AT&C (बिजली चोरी और तकनीकी) घाटे 50% से घटकर 15% से कम हो गए हैं। |
| चंडीगढ़ | कानूनी विवाद | निजीकरण की प्रक्रिया यहाँ कानूनी चुनौतियों और टेंडर प्रक्रिया में कमियों के कारण देरी का सामना कर रही है। |
निजीकरण के पक्ष और विपक्ष
- पक्ष (सरकार का तर्क): सरकारी वितरण कंपनियों (Discoms) का बढ़ता घाटा, पुरानी तकनीक और उपभोक्ताओं को 24×7 बिजली देने की आवश्यकता।
- विपक्ष (कर्मचारियों का तर्क): नौकरी की असुरक्षा, पेंशन लाभ खोने का डर और निजी कंपनियों द्वारा भविष्य में बिजली की कीमतों (Tariff) में भारी बढ़ोतरी की आशंका।
छत्तीसगढ़ पर प्रभाव?
छत्तीसगढ़ एक पावर हब है और यहाँ का बिजली कर्मचारी वर्ग हमेशा ऊर्जा सुधारों को लेकर सजग रहता है। लद्दाख में आरईसी की टीम द्वारा निजीकरण के प्रेजेंटेशन की खबर छत्तीसगढ़ के बिजली संगठनों के लिए भी एक बड़ा अलर्ट है।
निष्कर्ष: आरईसी के सीएमडी का यह दौरा लद्दाख की बिजली व्यवस्था सुधारने के साथ-साथ देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक नई दिशा (या विवाद) तय कर सकता है। क्या केंद्र सरकार अब सरकारी वितरण कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की गति तेज करने वाली है? यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।
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