
रायपुर (Chaturpost.com)। छत्तीसगढ़ का इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार मुद्दा विश्वविद्यालय के उन सेवानिवृत्त प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों और कर्मचारियों का है, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी संस्थान को दी, लेकिन रिटायरमेंट के बाद वे अपनी ही जमा पूंजी और पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रांताध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने इस गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सीधे तौर पर विश्वविद्यालय प्रशासन पर आर्थिक अन्याय (Financial Injustice) और प्रशासनिक भेदभाव के आरोप लगाए हैं।
शासन के नियमों की अनदेखी (Ignoring State Rules)
वीरेन्द्र नामदेव ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकांश नियम विश्वविद्यालय में लागू किए जाते हैं, लेकिन जब बात पेंशनरों के हक की आती है, तो नियमों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर आए अधिकारियों, विशेषकर वित्त विभाग के लेखा नियंत्रक की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा, “कुलपति, लेखा नियंत्रक और लोकल फंड ऑडिट अधिकारियों के बीच तालमेल की भारी कमी (Lack of Coordination) है। इस प्रशासनिक विफलता का सीधा खामियाजा उन बुजुर्ग पेंशनरों को भुगतना पड़ रहा है जो मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं।”

महंगाई राहत (DR) में बड़ा खेल: 46% की जगह सीधे 50%?
महासंघ को सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय में महंगाई राहत (Dearness Relief) के वितरण में गंभीर अनियमितताएं (Irregularities) हुई हैं।
अन्याय की पूरी लिस्ट: क्यों परेशान हैं पेंशनर्स?
विश्वविद्यालय के भीतर चल रही मनमानी को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- PPO और ग्रेच्युटी पर कुंडली: वर्तमान में लगभग 10 से 12 ऐसे कर्मचारी हैं जिनके पेंशन भुगतान आदेश (PPO) महीनों से लंबित हैं। उनकी ग्रेच्युटी (Gratuity) की राशि भी रोक कर रखी गई है।
- पारदर्शिता का अभाव (Lack of Transparency): एक तरफ साधारण कर्मचारियों को दौड़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ रसूखदार लोगों के प्रकरणों का ‘चुपचाप’ निपटारा कर उन्हें पूर्ण भुगतान कर दिया गया है।
- जारी आदेश निरस्त करना: महासंघ के पास ऐसे मामले भी आए हैं जहाँ PPO जारी होने के बाद उन्हें बिना किसी ठोस कारण के निरस्त (Cancelled) कर दिया गया, जिससे पेंशनर्स आर्थिक संकट में आ गए हैं।
- वैज्ञानिकों के साथ उम्र का धोखा: विश्वविद्यालय ने वर्षों तक वैज्ञानिकों से 65 वर्ष की आयु तक अध्यापन (Teaching) कार्य लिया। इसके लिखित आदेश भी मौजूद हैं। लेकिन अब पेंशन देते समय उन्हें “टीचिंग स्टाफ” नहीं माना जा रहा और 62 वर्ष के आधार पर लाभ दिए जा रहे हैं।
कुलपति की ‘बेबसी’ या प्रशासनिक अड़चन?
वीरेन्द्र नामदेव ने बताया कि महासंघ का प्रतिनिधिमंडल इस संबंध में कई बार कुलपति से मिल चुका है। चर्चा (Discussion) के दौरान कुलपति ने भी पेंशनरों की समस्याओं पर सहानुभूति जताई और शीघ्र समाधान (Solution) का आश्वासन दिया। हालांकि, धरातल पर स्थिति यह है कि लेखा नियंत्रक स्तर पर फाइलें प्रशासनिक अड़चनों (Administrative Hurdles) में फंसी हुई हैं। ऐसा लगता है कि कुलपति की इच्छा के बावजूद निचला प्रशासन सहयोग नहीं कर रहा है।
महासंघ की अंतिम चेतावनी
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने अब सीधे तौर पर राज्य शासन और विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि:
- लंबित PPO और ग्रेच्युटी का तत्काल भुगतान हो।
- डीआर (DR) विसंगति को सुधार कर एरियर दिया जाए।
- वैज्ञानिकों को 65 वर्ष की पात्रता के अनुसार पेंशन लाभ मिले।
महासंघ ने स्पष्ट किया है कि यदि इन मांगों पर जल्द कार्यवाही (Action) नहीं हुई, तो वे चुप नहीं बैठेंगे और इस आर्थिक अन्याय के खिलाफ बड़े स्तर पर प्रदर्शन करेंगे।
Editor’s Note: यह खबर छत्तीसगढ़ के पेंशनर्स के हितों से जुड़ी है। चतुर पोस्ट इस मामले में पारदर्शिता और न्याय की उम्मीद करता है।
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