
रायपुर (chaturpost.com)। 1992 बैच के सीनियर आईपीएस (IPS) अधिकारी अरुण देव गौतम (Arun Dev Gautam) फुलटाइम डीजीपी (Full-time DGP) नियुक्त किया गया है। अरुण देव गौतम फरवरी 2025 से राज्य के कार्यवाहक डीजीपी (Acting DGP) के रूप में चालू प्रभार संभाल रहे थे।
अब उनकी इस स्थायी नियुक्ति के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय (PHQ) से लेकर सियासी गलियारों तक में एक ही चर्चा सबसे तेज है— क्या नए डीजीपी अरुण देव गौतम पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा (Ashok Juneja) का वह ऐतिहासिक और अनोखा रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे, जिसे तोड़ना किसी भी आईपीएस के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है? आइए जानते हैं इस पूरी नियुक्ति की इनसाइड स्टोरी (Inside Story) और सीनियरिटी का वो गणित, जिसने इस फैसले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
क्या अरुण देव गौतम तोड़ पाएंगे अशोक जुनेजा का रिकॉर्ड? जानिए गणित
अरुण देव गौतम के रिकॉर्ड तोड़ने की चर्चा छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हल्के में ऐसे ही नहीं हो रही है। इसके पीछे नियमों और तारीखों का एक बड़ा दिलचस्प समीकरण काम कर रहा है।
नियमों के मुताबिक, आईपीएस अरुण देव गौतम जुलाई 2027 में अपनी 60 साल की उम्र पूरी कर लेंगे और उनकी सेवानिवृत्ति (Retirement) की तारीख आ जाएगी। लेकिन राज्य सरकार ने उन्हें मई 2026 में पूर्णकालीन डीजीपी बनाया है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े दिशानिर्देशों के तहत, एक बार फुलटाइम डीजीपी बनने के बाद उस अधिकारी को कम से कम 2 साल का न्यूनतम कार्यकाल (Minimum Tenure) मिलना अनिवार्य है।
इस नियम के अनुसार, अब डीजीपी अरुण देव गौतम मई 2028 तक अपने पद पर बने रहेंगे। यानी वे अपनी तय रिटायरमेंट उम्र के बाद भी करीब 10 महीने तक छत्तीसगढ़ पुलिस की कमान संभालेंगे। यहीं से यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या वे पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा के 20 महीने वाले रिकॉर्ड की बराबरी कर पाएंगे या उसे तोड़ पाएंगे?
जानिए… क्यों पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा को कहा जाता है ‘किस्मत का धनी’
छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) अशोक जुनेजा ने इस पद पर रहते हुए एक ऐसा रिकॉर्ड (Historical Record) कायम कर दिया है, जिसे कोई भी दूसरा आईपीएस अधिकारी अपनी मर्जी से नहीं तोड़ सकता। उनके इस रिकॉर्ड की चर्चा केवल रायपुर में नहीं, बल्कि दिल्ली के केंद्रीय मंत्रालयों और दूसरे राज्यों के नौकरशाहों (Bureaucrats) के बीच भी खूब होती है।
अशोक जुनेजा के बारे में पुलिस महकमे में दो बातें हमेशा कही जाती हैं— पहली यह कि वे किस्मत के बेहद धनी (Fortunate) हैं, और दूसरी चर्चा उनके इसी लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड की होती है। जुनेजा अपनी पूरी सर्विस के दौरान हमेशा मलाईदार और बेहद महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
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उन्होंने रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जैसे वीवीआईपी जिलों की कप्तानी (SSP/SP) की। वे बिलासपुर रेंज के आईजी (IG) रहे और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर का पद भी संभाला। जब वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति (Central Deputation) पर गए, तो उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स की सुरक्षा इंचार्ज जैसी बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।
कैसे अचानक चमकी थी जुनेजा की किस्मत?
पुलिस मुख्यालय (PHQ) के गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय यह रहा है कि एक समय अशोक जुनेजा के डीजीपी बनने की संभावना बेहद कम मानी जा रही थी। उनसे पहले छत्तीसगढ़ के डीजीपी डीएम अवस्थी थे। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अचानक नवंबर 2021 में अवस्थी को पद से हटाकर अशोक जुनेजा को चालू प्रभार (Current Charge) सौंप दिया था।
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समीकरण यह था कि डीएम अवस्थी मार्च 2023 में रिटायर होने वाले थे और जुनेजा का खुद का रिटायरमेंट जून 2023 में था। यानी अवस्थी के रिटायर होने के ठीक दो महीने बाद जुनेजा भी रिटायर हो जाते। सामान्य परिस्थितियों में महज दो महीने के लिए किसी को पूर्णकालीन डीजीपी नहीं बनाया जाता, लेकिन सरकार ने समय से बहुत पहले 11 नवंबर 2021 को ही जुनेजा को कमान सौंप दी। इसी वजह से उन्हें ‘किस्मत का धनी’ माना गया।
अशोक जुनेजा का वो रिकॉर्ड, जिसे तोड़ना नामुमकिन सा है
आईपीएस अशोक जुनेजा छत्तीसगढ़ के इतिहास के पहले ऐसे डीजीपी बने, जो अपने तय रिटायरमेंट की उम्र पार करने के बाद भी पूरे 20 महीने तक पद पर जमे रहे। वे जून 2023 में ही रिटायर होने वाले थे, लेकिन विभिन्न सेवा विस्तारों (Extensions) के बाद वे फरवरी 2025 तक इस पद पर बने रहे।
यह सब कैसे संभव हुआ? नीचे दिए गए रंगीन चार्ट से समझिए इसकी पूरी टाइमलाइन:
सुप्रीम कोर्ट और UPSC के कड़े नियम: क्यों कोई अधिकारी लंबे समय तक रहता है ‘कार्यवाहक’?
अक्सर आम जनता और मीडिया के मन में यह सवाल उठता है कि किसी भी राज्य में कोई सीनियर अधिकारी इतने लंबे समय तक कार्यवाहक डीजीपी (Acting DGP) के रूप में क्यों काम करता है? उसे तुरंत फुलटाइम डीजीपी क्यों नहीं बना दिया जाता? दरअसल, इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह फैसले और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के बेहद कड़े नियम हैं।
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राज्य सरकार अपनी मर्जी से सीधे किसी भी आईपीएस को पूर्णकालीन पुलिस चीफ नियुक्त नहीं कर सकती। इसके लिए एक बेहद जटिल और पारदर्शी चयन प्रक्रिया (Selection Process) से गुजरना होता है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- पैनल तैयार करना (Panel Preparation): राज्य सरकार को डीजीपी का पद खाली होने से कम से कम तीन महीने पहले अपने राज्य के सबसे सीनियर और योग्य आईपीएस अधिकारियों के नामों की एक सूची संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजनी होती है।
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- यूपीएससी की स्क्रूटनी (UPSC Scrutiny): UPSC इन नामों पर विचार करने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाती है। यह कमेटी संबंधित अधिकारियों के पूरे सेवा रिकॉर्ड, फील्ड अनुभव, ईमानदारी (Integrity) और वरिष्ठता (Seniority) की बारीकी से जांच करती है।
- पैनल एम्पैनलमेंट (Empanelment): पूरी जांच-परख के बाद यूपीएससी राज्य सरकार को सबसे योग्य 3 अधिकारियों के नामों का एक शॉर्टलिस्टेड पैनल वापस भेजती है।
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- अंतिम चयन (Final Selection): राज्य सरकार के पास विवेकाधिकार (Discretionary Power) होता है कि वह यूपीएससी द्वारा भेजे गए उन्हीं 3 नामों में से किसी एक सूटेबल अधिकारी को राज्य का फुलटाइम डीजीपी चुनकर आदेश जारी कर दे।
डीजीपी पद के लिए क्या योग्यताएं (Eligibility) हैं अनिवार्य?
UPSC और राज्य सरकारें पुलिस विभाग के इस सर्वोच्च पद (Highest Rank) के लिए नाम तय करते समय मुख्य रूप से तीन अपरिवर्तनीय शर्तों को देखती हैं:
- उम्मीदवार अनिवार्य रूप से भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का सदस्य होना चाहिए।
- वह राज्य कैडर में महानिदेशक (DG) या उसके समकक्ष (Equivalent) पे-स्केल या रैंक पर कार्यरत हो।
- 6 महीने का नियम: सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जब यूपीएससी की बैठक हो, तब संबंधित अधिकारी की नौकरी के कम से कम 6 महीने बाकी होने चाहिए। यदि किसी अधिकारी की सेवानिवृत्ति में 6 महीने से कम का समय बचा है, तो उसके नाम पर विचार नहीं किया जा सकता।
सुरक्षा की गारंटी: डीजीपी को समय से पहले हटाना क्यों है मुश्किल?
पुलिस व्यवस्था को राजनीतिक हस्तक्षेप (Political Interference) से दूर रखने और कानून व्यवस्था (Law and Order) को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी के कार्यकाल को पूरी सुरक्षा प्रदान की है।
एक बार जब किसी अधिकारी को फुलटाइम डीजीपी नियुक्त कर दिया जाता है, तो राज्य सरकार उसे 2 साल से पहले केवल कुछ बेहद असाधारण परिस्थितियों (Exceptional Circumstances) में ही हटा सकती है, जैसे:
- अधिकारी के गंभीर रूप से बीमार या असमर्थ होने पर।
- किसी बड़े भ्रष्टाचार (Corruption) या आपराधिक मामले में अदालत द्वारा दोषी पाए जाने पर।
- न्यायालय द्वारा कोई सजा मिलने या सेवा से सस्पेंड (Suspend) होने की स्थिति में।
- यदि अधिकारी स्वयं लिखित रूप से पद छोड़ने की इच्छा (Resignation) जताए।
छत्तीसगढ़ में अरुण देव गौतम की फुलटाइम नियुक्ति से पुलिस महकमे में स्थिरता आएगी और कानून व्यवस्था को नए आयाम मिलेंगे। अब देखना यह है कि नियमों के इस खेल में क्या डीजीपी गौतम का कार्यकाल भविष्य में किसी नए सेवा विस्तार (Extension) की ओर बढ़ता है, या फिर अशोक जुनेजा का 20 महीने का वो ‘जादुई रिकॉर्ड’ हमेशा के लिए अटूट बना रहता है।







