
बिलासपुर (chaturpost.com)। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सेवा से बर्खास्तगी (Employee Dismissal) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भले ही किसी कर्मचारी पर फर्जी दस्तावेज या धोखाधड़ी का आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो, लेकिन स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत विभागीय जांच को बायपास नहीं किया जा सकता। जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ (Single Bench) ने कबीरधाम जिले के एक बर्खास्त शिक्षा कर्मी को बड़ी राहत देते हुए उसकी सेवा बहाली (Reinstatement) का आदेश जारी कर दिया है।
हाई कोर्ट ने कबीरधाम कलेक्टर और दुर्ग संभाग के कमिश्नर द्वारा पूर्व में पारित अपीलीय आदेशों सहित 15 जनवरी 2016 के मूल बर्खास्तगी आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। अदालत के इस फैसले से प्रदेश के लाखों पंचायत और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के सेवा अधिकारों को एक नई सुरक्षा मिली है।
क्या है पूरा मामला? जानिए 2006 से शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई
वास्तव में, यह पूरा विवाद कबीरधाम जिले (कवर्धा) के जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा का है। याचिकाकर्ता सुरेश कुमार पटेल की नियुक्ति 29 जुलाई 2006 को शिक्षा कर्मी वर्ग-3 के पद पर हुई थी। वह प्राथमिक शाला बाजार चारभाटा में अपनी सेवाएं दे रहा था।
लगभग 10 साल की सेवा के बाद, वर्ष 2016 में विभाग ने एक गंभीर आरोप लगाया। विभाग का दावा था कि सुरेश ने नियुक्ति के समय जो 12वीं की अंकसूची (Marksheet) प्रस्तुत की थी, वह फर्जी है। स्कूल से सत्यापन (Verification) कराने के बाद, विभाग ने इसे धोखाधड़ी मानते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया और बिना विस्तृत विभागीय जांच के, केवल प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) के आधार पर उसे सीधे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। इसके खिलाफ कलेक्टर और कमिश्नर के पास की गई अपीलें भी खारिज हो गई थीं, जिसके बाद पीड़ित ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
विभागीय जांच की अनुपस्थिति में बर्खास्तगी अवैध: हाई कोर्ट
इसके परिणामस्वरूप, जब इस मामले की सुनवाई जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी के समक्ष हुई, तो राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता कार्यालय के वकील ने दलील दी कि चूंकि नियुक्ति ही धोखाधड़ी पर आधारित थी, इसलिए विस्तृत विभागीय जांच आवश्यक नहीं थी। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत रहेगा लागू, सेवा रहेगी निरंतर
निश्चित रूप से, हाई कोर्ट ने सुरेश कुमार पटेल को सेवा में वापस लेने का निर्देश तो दिया है, लेकिन साथ ही कुछ कड़े वित्तीय निर्देश भी जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ किया है कि बर्खास्तगी की तारीख से लेकर बहाली तक की अवधि के दौरान याचिकाकर्ता की सेवा को निरंतर (Continuous Service) माना जाएगा।
- पिछला वेतन नहीं मिलेगा: अदालत ने स्पष्ट किया कि जितने समय कर्मचारी ने काम नहीं किया, उसके लिए ‘नो वर्क, नो पे’ (No Work, No Pay) का सिद्धांत लागू होगा। यानी उसे पिछले सालों का एरियर या वेतन नहीं दिया जाएगा।
- वरिष्ठता रहेगी बरकरार: हालांकि, सेवा निरंतर मानने के कारण उसकी सीनियरिटी और भविष्य के फंड्स पर इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
राज्य सरकार को मिली नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट
इसके अतिरिक्त, हाई कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार और संबंधित विभाग को पूरी तरह लाचार नहीं छोड़ा है। अदालत ने कानून की मर्यादा बनाए रखते हुए सरकार को एक विशेष छूट (Liberty) प्रदान की है।
यही कारण है कि, फैसले में कहा गया है कि यदि छत्तीसगढ़ शासन या कबीरधाम जिला प्रशासन चाहे, तो वह नियमों के दायरे में रहकर सुरेश कुमार पटेल के खिलाफ नियम 7 के तहत विधिसम्मत नियमित विभागीय जांच (Fresh Inquiry) शुरू कर सकता है। यदि उस पूरी कानूनी प्रक्रिया में आरोप सही पाए जाते हैं, तो सरकार नए सिरे से नियम सम्मत कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला? (Expert Analysis)
अंततः, यह फैसला (CG High Court Employee Dismissal News) प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक बड़ी सीख है। अक्सर अधिकारी जल्दबाजी में या शुरुआती शिकायतों के आधार पर कर्मचारियों को सीधे बर्खास्त कर देते हैं, जो बाद में कोर्ट में टिक नहीं पाता। इस आदेश ने साफ कर दिया है कि प्रक्रिया का पालन करना (Due Process of Law) उतना ही जरूरी है जितना कि अपराध की गंभीरता। चतुरपोस्ट के सभी पाठक इस कानूनी बारीकी को समझकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकते हैं।







