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छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार केस पर हाई कोर्ट की बड़ी व्यवस्था: नोट मिलने से नहीं होगी जेल, रिश्वत की मांग का पुख्ता सबूत अनिवार्य

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों में एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी लोक सेवक या आरोपी से महज पैसों की बरामदगी (Recovery of Money) उसे दोषी साबित करने के लिए काफी नहीं है, जब तक कि रिश्वत की मांग (Demand of Bribe) को कानूनन और संदेह से परे साबित न कर दिया जाए।

यदि आप कानूनी मामलों, छत्तीसगढ़ की खबरों और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों पर पैनी नजर रखते हैं, तो बिलासपुर हाई कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला आपको जरूर समझना चाहिए। आइए जानते हैं कि हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में क्या अहम टिप्पणियां की हैं और क्यों दो सरकारी कर्मचारियों को बरी कर दिया गया।

क्या था पूरा मामला (Background of the Case)?

यह पूरा मामला लगभग 16 साल पुराना है। अभियोजन पक्ष (Prosecution) के आरोपों के अनुसार:

  • पीड़ित की शिकायत: शिकायतकर्ता की पत्नी की सैलरी पिछले छह महीने से रुकी हुई थी। आरोप था कि याचिकाकर्ताओं (सरकारी कर्मचारियों) ने रुकी हुई सैलरी जारी करने के एवज में 5,000 रुपये की रिश्वत (Bribe) मांगी थी।
  • एसीबी का ट्रैप: एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) के निर्देश पर शिकायतकर्ता ने आरोपियों के साथ हुई बातचीत को एक वॉयस रिकॉर्डर में रिकॉर्ड कर लिया।
  • पैसों की जब्ती: इसके बाद 12 अक्टूबर 2010 को एसीबी ने जाल बिछाया (Trap) और आरोपी अनिल की जेब से रिश्वत के नोट बरामद किए।
  • निचली अदालत का फैसला: इस बरामदगी और रिकॉर्डिंग के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत दोनों सरकारी कर्मचारियों को दोषी करार देकर सजा सुना दी गई थी, जिसे आरोपियों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला? इन 3 कानूनी कमियों ने कमजोर किया केस

हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने इस मामले की गहन सुनवाई करते हुए पाया कि जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने के लिए जरूरी कानूनी औपचारिकताओं (Legal Formalities) की अनदेखी की। कोर्ट ने मुख्य रूप से तीन बड़ी कमियों को रेखांकित किया:

1. धारा 65-बी के तहत सर्टिफिकेट का न होना (No Section 65-B Certificate)

जांच एजेंसी ने रिश्वत की मांग को साबित करने के लिए बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग को मुख्य सबूत के तौर पर पेश किया था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि इस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Electronic Evidence) को वैध साबित करने के लिए ‘इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872’ की धारा 65-B के तहत अनिवार्य प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस सर्टिफिकेट के बिना किसी भी डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को कोर्ट में मान्यता नहीं दी जा सकती।

2. वॉइस सैंपल और फोरेंसिक जांच (FSL Report) का अभाव

सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी ने खुद स्वीकार किया कि मामले में न तो आरोपियों के और न ही शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल (Voice Samples) लिए गए थे।

  • ऑडियो रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज का कोई वैज्ञानिक या फॉरेंसिक सत्यापन (Scientific Verification) नहीं कराया गया था।
  • गवाहों ने भी माना कि रिकॉर्ड की गई ऑडियो क्लिप साफ नहीं थी और उसमें कई अन्य लोगों की आवाजें भी सुनाई दे रही थीं।
  • केवल शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर आवाज की पहचान को सच नहीं माना जा सकता।

3. रिकॉर्डर के साथ छेड़छाड़ (Tampering) की आशंका

अदालत ने एक और बेहद गंभीर बिंदु पर ध्यान दिया। वॉयस रिकॉर्डर को औपचारिक रूप से जब्त किए जाने से पहले वह कई दिनों तक शिकायतकर्ता के पास ही रहा था। ऐसे में रिकॉर्डिंग या डिवाइस के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ (Tampering) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था।

ऐतिहासिक फैसला: “सिर्फ उधारी या बरामदगी सजा का आधार नहीं”

बिलासपुर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ‘रमेश शर्मा बनाम स्टेट’ के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में टेप-रिकॉर्ड की गई बातचीत को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के कड़े नियम और शर्तें तय की गई हैं, जैसे:

  • बोलने वाले की आवाज की सटीक पहचान होनी चाहिए।
  • रिकॉर्डिंग की सत्यता और प्रामाणिकता का ठोस सबूत होना चाहिए।
  • रिकॉर्डिंग में किसी प्रकार की कांट-छांट या छेड़छाड़ न होने की पुष्टि हो।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी (Court’s Verdict): “भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए रिश्वत की मांग (Demand of Bribe) का निर्विवाद रूप से साबित होना सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है। केवल जेब से या आरोपी के पास से पैसों की बरामदगी हो जाने मात्र से उसे अपराधी नहीं माना जा सकता।”

इन तमाम कानूनी पहलुओं और कमियों को ध्यान में रखते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट ने दोनों सरकारी कर्मचारियों की दोषसिद्धि और सजा के फैसले को निरस्त कर दिया और उन्हें सभी आरोपों से ससम्मान बरी (Acquitted) कर दिया।

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S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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