कर्मचारी हलचल

‘प्रबंधन अंधा, अफसरशाही मस्त’: सेवानिवृत्त कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण देवांगन का पावर कंपनी के सिस्‍टम पर बड़ा हमला

रायपुर: न्‍यूज डेस्‍क। छत्तीसगढ़ में बिजली कर्मचारियों के आंदोलन के बीच सेवानिवृत्त विद्युत कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण देवांगन ने पावर कंपनी के शीर्ष प्रबंधन और इसकी कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कंपनी के भीतर चल रहे कथित भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची और विजन की कमी को लेकर प्रबंधन को आड़े हाथों लिया।


महासचिव अरुण देवांगन ने दो टूक शब्दों में कहा कि पावर कंपनी का प्रबंधन बिना किसी विजन (Lack of Vision) के कार्य कर रहा है। उन्होंने अफसरों की योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज कंपनी में राजस्व प्रभारी को राजस्व का काम नहीं पता, एचआर (Human Resources) विभाग को मानव संसाधन प्रबंधन का ज्ञान नहीं है और संधारण (Maintenance) कार्य करने वालों को यह तक नहीं मालूम कि जमीनी स्तर पर कितना संधारण हो रहा है।

“सब के सब ठेका और खरीदी में मस्त हैं”

पावर कम्पनी की सोच बड़ी होती तो जानकारों से सुझाव आमंत्रित करती, चर्चा करती । राजस्व प्रबंधन पर मंथन करती । व्यय में कमी लाने के उपाय बताने वाले बहुत है , लेकिन न तो कोई सुनने वाला है न इस पर कोई अमल करने वाला है। आज स्थिति यह है कि सबके सब सिर्फ ठेका और खरीदी (Contracts and Purchasing) के खेल में मस्त हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि विभाग में जरूरत न होने के बावजूद ढेर सारे इंजीनियरों के पद (Engineers Posts) निर्मित कर दिए गए हैं, जिनके पास धरातल पर करने के लिए कोई काम ही नहीं है।

बाहर की कंसलटेंट कंपनियों और ‘मनचाही रिपोर्ट’ पर उठाए सवाल

पावर कंपनी द्वारा बाहर की निजी कंपनियों से सर्वे और रिपोर्ट कराने की नीति पर निशाना साधते हुए देवांगन ने कहा कि बाहर की कंपनी आकर क्या नया बताएगी? जो प्रबंधन कहेगा और जैसे कहेगा, वे वैसी ही मनचाही रिपोर्ट (Tailored Report) बनाकर थमा देंगे।


उन्होंने अतीत का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसा ही खेल कंपनीकरण के समय भी हुआ था, जब बाहर की कंपनी को कंपनीकरण का ठेका दिया गया और अपने हिसाब से रिपोर्ट तैयार करवाई गई थी। अगर प्रबंधन वाकई सुधार चाहता है, तो इस विषय पर चिंतन करने वाले अनुभवी लोगों की राय लेनी चाहिए।

“प्रधानमंत्री मोदी की अपील का भी अफसरों पर कोई असर नहीं”

राष्ट्रीय महामंत्री ने फिजूलखर्ची पर प्रहार करते हुए देश के प्रधानमंत्री का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा,

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने लगातार अपील की है कि सरकारी विभागों में ई-कार (Electric Cars) और पूल कार (Pool Car) का इस्तेमाल किया जाए ताकि राजस्व और पर्यावरण की बचत हो सके। लेकिन पावर कंपनी के बड़े ऑफिसरों की गाड़ियां आज भी वैसे ही ठाट-बाट से चल रही हैं। इन अफसरों पर देश के प्रधानमंत्री की अपील का भी कोई असर नहीं है।

” प्रधानमंत्री ने सोलर ऊर्जा का लाभ लेने की अपील की तो टारगेट पूरा करने के लिए कर्मचारियों अधिकारियों को बाध्य करने के आदेश जारी कर दिए, पचासों सालों से चल रहे विभागीय छूट को एक आदेश से बंद कर दिया गया, यह भी नहीं देखा गया कि कर्मचारी कंपनी आवास में रह रहा है या किराए के मकान में या झोपड़ी में या फ्लैट में । यह भर्राशाही का उदाहरण मात्र है ।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ीं सरकारी योजनाएं, गायब हुआ वर्क कल्चर

देवांगन ने आरोप लगाया कि कंपनी के भीतर सिर्फ ‘मनपसंद लोगों को ठेका और सप्लाई आदेश’ देने का खेल चल रहा है। चहेते अफसरों को मनपसंद पोस्टिंग (Favorite Postings) और उगाही का एक नया कल्चर (New Corruption Culture) डेवलप हो चुका है। अफसरों को मनमानी करने की खुली छूट है, लेकिन कार्यरत और सेवानिवृत्त लोगों की जायज समस्याओं से प्रबंधन को कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने दावा किया कि:

  • सोलर योजना (Solar Scheme) पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है।
  • समाधान योजना (Samadhan Yojana) में भारी विसंगतियां हैं।
  • आरडीएसएस योजना (RDSS Scheme) और एपिडीडीआरपी योजना (APDRP) का पैसा सही जगह लगने के बजाय बंदरबांट का शिकार हो गया है। और यही कारण है कि थोड़े से आंधी तूफान की मार आज भी बिजली वितरण प्रणाली झेल नहीं पा रहा है । आखिर इन्फ्रास्ट्रक्चर में अरबो रुपये खर्च का क्या परिणाम निकला ।

⚠️ ‘सोलर योजना’ का कड़वा सच: पैनल लगाने के बाद वेंडर्स गायब, उपभोक्ता परेशान

अरुण देवांगन ने पावर कंपनी के कुप्रबंधन को उजागर करते हुए केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी सोलर योजना (Solar Scheme) की जमीनी हकीकत पर भी बड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने वेंडर्स और बिजली विभाग के बीच आपसी तालमेल की कमी को इसका मुख्य कारण बताया। देवांगन ने इस गड़बड़झाले को समझाते हुए कहा:

यह साफ दर्शाता है कि आम जनता को फायदा पहुंचाने के नाम पर शुरू की गई इस बेहतरीन योजना को भी अफसरों की लापरवाही और वेंडर्स की मनमानी ने पूरी तरह से मजाक बनाकर रख दिया है।

बिजली मंडल से कंपनी बनने का मूल उद्देश्य ही हुआ फेल

उन्होंने अंत में बेहद निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि तत्कालीन विद्युत मंडल (Electricity Board) को भंग कर कंपनी बनाने के पीछे तर्क दिया गया था कि इससे कुशल राजस्व प्रबंधन, जवाबदेही (Accountability), गुणवत्तापूर्ण बिजली सप्लाई और न्यूनतम लागत मूल्य पर बिजली प्रदान की जा सकेगी। लेकिन आज इनमें से एक भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।
कंपनी से ‘वर्क कल्चर’ पूरी तरह गायब हो चुका है। तीन-तीन कंपनियों के अध्यक्ष (Chairman of Three Companies) इतनी जिम्मेदारियों से लदे हैं कि उनके पास पावर कंपनी की सुध लेने के लिए समय ही नहीं है। वर्तमान में पूरी कंपनी “भगवान भरोसे” चल रही है। बातें तो बहुत हैं, लेकिन ऐसा महसूस होता है कि यहाँ न तो कोई जिम्मेदार बचा है और न ही कोई सुनने-समझने वाला। जवाबदेही और पारदर्शिता (Transparency) का मूल उद्देश्य पूरी तरह गायब है।

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कंपनी से ‘वर्क कल्चर’ पूरी तरह गायब हो चुका है। तीन-तीन कंपनियों के अध्यक्ष (Chairman of Three Companies) इतनी जिम्मेदारियों से लदे हैं कि उनके पास पावर कंपनी की सुध लेने के लिए समय ही नहीं है। वर्तमान में पूरी कंपनी “भगवान भरोसे” चल रही है। बातें तो बहुत हैं, लेकिन ऐसा महसूस होता है कि यहाँ न तो कोई जिम्मेदार बचा है और न ही कोई सुनने-समझने वाला। जवाबदेही और पारदर्शिता (Transparency) का मूल उद्देश्य पूरी तरह गायब है।

S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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