Chhattisgarh

बस्तर में ‘वन राज’ पर बड़ा संकट: शासन के आदेश को ठेंगे पर रख PCCF ने पलटा फैसला, क्या DGP चलाएंगे वन विभाग?

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सलवाद के मोर्चे पर मिल रही ऐतिहासिक कामयाबी के बीच एक नया और बेहद गंभीर प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। विवाद इस बात को लेकर है कि राज्य में चुनी हुई सरकार और शासन का आदेश सर्वोपरि है या फिर विभाग के आला प्रशासनिक अफसर अपनी मर्जी से नीतियां तय करेंगे? मामला बस्तर संभाग के घने जंगलों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने (Bastar Forest Security) और शिकारियों तथा वन्यजीवों के दुश्मनों से निपटने से जुड़ा है।

इस संवेदनशील मामले में अब सीधे राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) तक शिकायत पहुंच चुकी है। रायपुर के जाने-माने पर्यावरणविद और वन्यजीव मामलों के जानकार नितिन सिंघवी ने वर्तमान में पदस्थ प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) सह हेड ऑफ द फॉरेस्ट फोर्स (HoFF) के खिलाफ सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) करने की मांग कर दी है। इस शिकायत के बाद छत्तीसगढ़ के गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है— ‘शासन बड़ा या प्रधान मुख्य वन संरक्षक?’

क्या है बस्तर का जमीनी संकट? (The Ground Reality)

दरअसल, बस्तर संभाग में जैसे-जैसे अंदरूनी इलाकों से नक्सलवाद का खात्मा हो रहा है, वैसे-वैसे वहां के बेशकीमती जंगलों और वन्यजीवों पर नया संकट मंडराने लगा है। वन विभाग के पास मैदानी अमले की भारी कमी है। पिछले दिनों दंतेवाड़ा जिले के राजा बंगला क्षेत्र की पहाड़ियों और घने जंगलों में एक खौफनाक मंजर देखा गया था।

सैकड़ों की संख्या में हथियारबंद और संगठित शिकारियों (Poachers) ने पूरे जंगल को चारों तरफ से घेर लिया और उसमें आग (Forest Fire) लगा दी। इस आग का मकसद यह था कि वन्यप्राणी जैसे हिरण, जंगली सूअर, और अन्य दुर्लभ शाकाहारी-मांझाहारी जीव जान बचाकर भागें और शिकारियों द्वारा बिछाए गए फंदे और जालों में फंस जाएं। जब वन विभाग की एक छोटी सी टीम मौके पर पहुंची, तो शिकारियों की भारी संख्या और उनके आक्रामक रुख को देखकर उन्हें बिना कोई प्रभावी कार्रवाई किए, उल्टे पैर बैरंग लौटना पड़ा।

नितिन सिंघवी का वो सुझाव, जिसे शासन ने माना था

बस्तर के जंगलों में बेखौफ घूम रहे अवैध शिकारियों, लकड़ी तस्करों (Timber Smugglers) और अवैध कटाई की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को एक बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण सुझाव भेजा था।

  • सुझाव का मुख्य बिंदु: दंतेवाड़ा और बस्तर संभाग में नक्सल मोर्चा खाली होने के बाद उपलब्ध लगभग 1,000 जिला रिजर्व गार्ड (DRG) के जवानों को वन विभाग के मैदानी अमले के साथ संयुक्त अभियान (Joint Operation) में लगाया जाए।
  • उद्देश्य: इससे अत्याधुनिक हथियारों और जंगलों के रास्तों से वाकिफ DRG जवान वन विभाग की सुरक्षा ढाल बनेंगे, जिससे शिकार, जंगलों में आगजनी और वन संपदा की चोरी पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सके।

आदेश में क्या था निर्देश? (The Mandate)

शासन ने अपने पत्र में बहुत ही स्पष्ट और सीधे शब्दों में निर्देश दिए थे कि दोनों पीसीसीएफ संयुक्त रूप से इस प्रस्ताव के गुण-दोषों का मूल्यांकन (Evaluation) करें और एक संयुक्त हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव (Joint Signed Proposal) सीधे शासन को भेजें। शासन का उद्देश्य यह था कि इस प्रस्ताव के आधार पर वह खुद गृह विभाग (Home Department) से को-ऑर्डिनेशन करके डीआरजी जवानों की तैनाती का आदेश जारी करवा सके। शासन के पत्र में कहीं भी पुलिस महानिदेशक (DGP) से कोई अलग से राय या अभिमत लेने की बात नहीं कही गई थी।

आरोप: शासन के आदेश को ठंडे बस्ते में डाला गया

शिकायतकर्ता नितिन सिंघवी का सीधा आरोप है कि उस समय वर्तमान पीसीसीएफ (वन बल प्रमुख), प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) के पद पर तैनात थे। शासन के बेहद स्पष्ट और निर्विवाद आदेश के बावजूद लगभग एक महीने तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

इसके बाद, 09 जून 2026 को तत्कालीन पीसीसीएफ (वन्यप्राणी) ने जो कदम उठाया, उसने सबको हैरान कर दिया। उन्होंने शासन को संयुक्त प्रस्ताव भेजने के बजाय पुलिस महानिदेशक (DGP), छत्तीसगढ़ को पत्र (क्रमांक/व.प्रा./वन अपराध/3534) लिखकर इस मामले में उनका ‘अभिमत’ (Opinion) मांग लिया।

अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में नितिन सिंघवी ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए पीसीसीएफ के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है। सिंघवी ने कहा कि उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों से साफ है कि या तो अधिकारी शासन के आदेश को समझ नहीं पा रहे हैं, या वे उसे मानना आवश्यक नहीं समझते, या फिर वे स्वयं को शासन के निर्देशों से भी ऊपर मानते हैं।

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यदि शासन के इस आदेश का समय पर अक्षरशः पालन किया गया होता, तो बस्तर के जंगलों में अब तक डीआरजी की गश्त शुरू हो चुकी होती और न तो दंतेवाड़ा में बेखौफ होकर शिकारी आग लगा पाते और न ही अवैध तस्करी के मामलों में बढ़ोतरी होती।

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अब देखना यह है कि मुख्य सचिव इस प्रशासनिक शिथिलता और शासन के आदेश की अवहेलना के इस हाई-प्रोफाइल मामले में क्या कड़ा रुख अपनाते हैं। यह खबर छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी है।

Bastar Forest Security
Bastar Forest Security

S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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