Chhattisgarh

बंदूक से पालने तक: बस्तर में पुनर्वासित नक्सलियों के लिए ‘जीवनदान’ बनीं ये सर्जरियां, 73 पूर्व नक्सली फिर से बने पिता

रायपुर/जगदलपुर। छत्‍तीसगढ़ के बस्तर के दुर्गम जंगलों में कभी खौफ का पर्याय रहे और नक्सली संगठनों की क्रूरता का दंश झेलने वाले पूर्व नक्सलियों के जीवन में एक सुखद बदलाव आया है। बस्तर जिला प्रशासन और पुलिस की एक मानवीय पहल ने न केवल इन लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा है, बल्कि उनसे छीना गया ‘पितृत्व का अधिकार’ भी वापस लौटा दिया है। जगदलपुर के महारानी अस्पताल में आयोजित ‘रिवर्स वासेक्टॉमी’ (रिवर्स नसबंदी) शिविर ने 73 परिवारों की सुनी गोद को खुशियों से भर दिया है।

विचारधारा की क्रूरता बनाम प्रशासन की संवेदना

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में प्रतिबंधित संगठनों द्वारा अपने कार्यकर्ताओं पर जबरन नसबंदी थोपने की कुप्रथा लंबे समय से एक काला अध्याय रही है। कई पूर्व नक्सलियों के लिए यह एक ऐसा घाव था जो उन्हें मुख्यधारा में लौटने के बाद भी कचोटता था। इसी को देखते हुए बस्तर पुलिस और जिला प्रशासन ने एक अनूठी पहल की। जगदलपुर के महारानी अस्पताल में यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (वेस्ट जोन) के सहयोग से एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया।

73 सफल सर्जरी: चिकित्सा विज्ञान का चमत्कार

इस शिविर की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी सफलता दर है। यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. राजेश कुकरेजा ने बताया कि यह अत्यंत जटिल माइक्रोसर्जरी होती है। इंदौर, मुंबई, पुणे, नांदेड़ और रायपुर के शीर्ष विशेषज्ञों ने अपनी स्वैच्छिक सेवाएं देते हुए प्रथम चरण में 33 और द्वितीय चरण में 40, यानी कुल 73 सफल सर्जरी को अंजाम दिया। बस्तर जैसे क्षेत्र में ऐसी जटिल मेडिकल प्रक्रिया का इतने बड़े पैमाने पर सफल होना स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक कीर्तिमान है।

‘दो माह की बच्ची की मुस्कान’ – मुहिम का जीवंत प्रमाण

इस मुहिम की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण वह पूर्व नक्सली है, जिसकी रिवर्स वासेक्टॉमी इसी अस्पताल में हुई थी और अब वह एक दो माह की स्वस्थ बच्ची का पिता है। बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा बताते हैं कि यह किसी भी आंकड़े से बड़ी सफलता है। जब एक पूर्व नक्सली अपने बच्चे को गोद में लेता है, तो वह हिंसा की दुनिया से पूरी तरह कटकर एक नया, सामान्य और पारिवारिक जीवन शुरू करता है। आईजी सुंदरराज पी. ने इसे सामाजिक पुनर्स्थापन की दिशा में एक ‘ऐतिहासिक कदम’ करार दिया है।

हिंसा के चक्र को तोड़ने की कोशिश

यह पहल केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा संदेश है। बस्तर पुलिस का मानना है कि पुनर्वास का अर्थ केवल आत्मसमर्पण या आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि व्यक्ति को सामाजिक और मानसिक रूप से समाज का अभिन्न अंग बनाना है।

इस मानवीय प्रयास के लिए अस्पताल प्रबंधन, यूरोलॉजिकल सोसाइटी और जिला प्रशासन को देशभर से सराहना मिल रही है। यह शिविर साबित करता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और मानवीय संवेदना का मेल हो, तो हिंसा से प्रभावित जीवन में भी उम्मीदों की नई रोशनी जलाई जा सकती है।

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S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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