
रायपुर: छत्तीसगढ़ के सरकारी कर्मचारियों और सेवानिवृत्त हो चुके बुजुर्ग पेंशनरों के लिए न्याय और हक से जुड़ी एक बहुत ही बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर (Chhattisgarh High Court, Bilaspur) द्वारा दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के पक्ष में दिए गए एक बेहद महत्वपूर्ण और युगांतकारी निर्णय का पुरजोर स्वागत किया है। इसके साथ ही महासंघ ने राज्य सरकार से इस ऐतिहासिक फैसले को जमीनी स्तर पर बिना किसी देरी के जल्द से जल्द लागू करने की मांग उठाई है।
दरअसल, उच्च न्यायालय ने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों (Daily Wager Employees) के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया है, जिसके तहत उनकी नियमितीकरण से पूर्व की सेवा अवधि को भी अब पेंशन की गणना के लिए योग्य माना जाएगा। हालांकि, महासंघ ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि न्यायालय के इतने स्पष्ट और कड़े निर्णय के बावजूद भी शासन स्तर (Government Level) पर अब तक इसके क्रियान्वयन के लिए आवश्यक प्रशासनिक आदेश जारी नहीं किए गए हैं। इस वजह से हजारों सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके परिवारों को वास्तविक न्याय मिलने में लगातार विलंब हो रहा है।
क्या है हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला? (The High Court Verdict)
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के प्रांताध्यक्ष वीरेंद्र नामदेव ने इस पूरे विषय पर एक विस्तृत आधिकारिक बयान जारी किया है। उन्होंने अपने बयान में स्पष्ट किया कि । उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में पूरी तरह साफ कर दिया है कि यदि कोई कर्मचारी अपने करियर के शुरुआती दिनों में दैनिक वेतनभोगी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा था और बाद में उसे शासन की नीतियों के तहत नियमित (Regularized) किया गया हो, तो ऐसे मामलों में उसके नियमितीकरण से पहले की पूरी सेवा अवधि को भी पेंशन योग्य सेवा (Pensionable Service) में अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए एक बहुत बड़ा सुरक्षा कवच साबित होगा जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे वर्ष और अपनी पूरी जवानी बेहद कम मानदेय पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में विभागों को सींचने में लगा दिए। कोर्ट के इस रुख से कर्मचारियों के लंबे संघर्ष को एक नई पहचान और सम्मान मिला है।
शासन की आपत्तियां हुईं खारिज: महासंघ का बड़ा दावा (Government Objections Rejected)
महासंघ के प्रांताध्यक्ष ने आगे कहा कि न्यायालय द्वारा इस मामले में राज्य शासन की विभिन्न तकनीकी आपत्तियों और दलीलों को सिरे से अस्वीकार कर दिया जाना इस बात का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण है कि कर्मचारियों की वास्तविक सेवा अवधि (Actual Service Period) को किसी भी कानून या नियम का हवाला देकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय ने मानवीय और विधिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए यह माना है कि सभी पात्र कर्मचारियों और पेंशनरों को उनकी संपूर्ण सेवा अवधि का पूरा-पूरा लाभ मिलना ही चाहिए। बुजुर्ग हो चुके कर्मचारियों को उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा यानी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों (Retirement Benefits) से वंचित रखना किसी भी परिस्थिति में न्यायसंगत और संवैधानिक नहीं माना जा सकता।
पेंशनर्स नेताओं ने एकजुट होकर उठाई मांग (Demands from Pensioner Leaders)
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद दैनिक वेतनभोगी सेवा से नियमित होकर सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के प्रमुख पेंशनर्स नेताओं ने एकजुट होकर राज्य सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। इन नेताओं ने शासन से त्वरित कार्यवाही की मांग की है।
इन सभी वरिष्ठ नेताओं ने छत्तीसगढ़ राज्य शासन से बेहद कड़े शब्दों में यह मांग की है कि सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) एवं वित्त विभाग (Finance Department) के माध्यम से तत्काल प्रभाव से एक स्पष्ट और विस्तृत दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी किए जाएं। इससे विभिन्न विभागों में जो भ्रम की स्थिति बनी हुई है वह समाप्त होगी और दैनिक वेतनभोगी सेवा से नियमित हुए कर्मचारियों की पूर्व सेवा अवधि को पेंशन की गणना में जोड़ने की तकनीकी प्रक्रिया को बहुत तेजी से प्रारंभ किया जा सकेगा।
लंबित एरियर भुगतान और समीक्षा की मांग (Pending Arrears & Review Petition)
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने केवल नए आदेश जारी करने की ही बात नहीं कही है, बल्कि उन्होंने उन बुजुर्गों की चिंता भी की है जो पहले ही रिटायर हो चुके हैं और विभागों के चक्कर काट रहे हैं। महासंघ ने अपनी मांगों के ज्ञापन में निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं को शामिल किया है:
समयबद्ध क्रियान्वयन ही दिलाएगा वास्तविक न्याय (Time-Bound Implementation)
महासंघ का साफ तौर पर कहना है कि अदालतों के चक्कर काटकर कर्मचारी पहले ही मानसिक और आर्थिक रूप से थक चुके हैं। ऐसे में अब उच्च न्यायालय के इस न्यायप्रिय निर्णय का एक निश्चित समय-सीमा के भीतर समयबद्ध क्रियान्वयन (Time-bound implementation) ही छत्तीसगढ़ के हजारों बुजुर्ग और लाचार पेंशनरों को वास्तविक न्याय दिला सकेगा।
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अगर सरकार इस फैसले को लागू करने में और अधिक ढुलमुल रवैया अपनाती है, तो इससे कर्मचारियों के बीच असंतोष की भावना और अधिक प्रबल होगी। अब गेंद पूरी तरह से राज्य शासन के पाले में है कि वह कब अपने विभागों को इसके लिए हरी झंडी दिखाती है।







