
रायपुर। छत्तीसगढ़ की सरकारी बिजली कंपनियों पदोन्नति में आरक्षण को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में बड़ा अपडेट आया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एक बड़ा और दूरगामी कानूनी फैसला (Legal Decision) सुनाया है।
मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद से जुड़ी स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को औपचारिक रूप से स्वीकार (Admit) करते हुए इसे ‘सिविल अपील’ (Civil Appeal) में तब्दील कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल बिजली कंपनी में चल रही वर्तमान प्रमोशन प्रक्रिया पर किसी भी तरह का स्टे (Stay Order) यानी रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बदला केस का स्वरूप? (Legal Shift)
इस मामले की शुरुआती सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह बात आई कि इस पदोन्नति विवाद में कानून के कई ऐसे बुनियादी और गहरे सवाल (Substantial Question of Law) शामिल हैं, जिनकी विस्तृत समीक्षा (Comprehensive Review) बेहद जरूरी है।
शुरुआत में अदालत इस मामले का त्वरित या संक्षिप्त निपटारा करने वाली थी, लेकिन दोनों पक्षों की प्राथमिक दलीलों को सुनने के बाद बेंच ने इसे नियमित सुनवाई (Final Hearing) के दायरे में लाने का फैसला किया। यही वजह है कि एसएलपी को अब एक बड़े सिविल अपील के रूप में पंजीकृत (Registered) किया गया है।
प्रमोशन प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं, वर्तमान सीनियरिटी लिस्ट रहेगी प्रभावी
बिजली कर्मचारियों और तकनीकी अधिकारियों के लिए इस वक्त की सबसे बड़ी खबर यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को स्वीकार करने के बावजूद हाईकोर्ट के आदेशों या वर्तमान में जारी प्रमोशन गतिविधियों पर कोई रोक (Stay) नहीं लगाई है।
स्टे (Stay Order) देने से साफ इनकार
- कोई रोक नहीं लगी है: भले ही सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर लंबी और विस्तृत सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल इस पर कोई स्टे (Stay) यानी रोक नहीं लगाई है। हाईकोर्ट के पिछले आदेश या विभाग में चल रही प्रमोशन की प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं है।
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- इसका असर क्या होगा: चूंकि कोर्ट ने स्टे नहीं दिया है, इसलिए विभाग में अभी जो सीनियरिटी लिस्ट (वरिष्ठता सूची) बनी हुई है या जो प्रमोशन की प्रक्रिया चल रही है, वह वैसी ही चलती रहेगी। जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक इस पर कोई रुकावट नहीं आएगी।
स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को मंजूर
- मामला अब बड़ा हो गया है: शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट इस मामले की तुरंत सुनवाई करके इसे खत्म करने वाला था। लेकिन जब कोर्ट ने शुरुआती दलीलें सुनीं, तो उन्हें लगा कि इस मामले में कानून से जुड़े कुछ बेहद महत्वपूर्ण और गहरे सवाल छिपे हैं।
- सिविल अपील में बदलाव: इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने SLP को औपचारिक रूप से स्वीकार (Admit) कर लिया है। इसका मतलब है कि अब इस केस को एक ‘सिविल अपील’ (Civil Appeal) के रूप में दर्ज कर लिया गया है, और इस पर अब बहुत विस्तार से और पूरी कानूनी प्रक्रिया के साथ लंबी सुनवाई होगी।
आखिर मुख्य विवाद (Dispute) क्या है?
यह पूरा कानूनी विवाद मुख्य रूप से दो बड़ी बातों के इर्द-गिर्द घूम रहा है:
- टाइम बाउंड प्रमोशन स्कीम (TBPS): यानी समयबद्ध पदोन्नति योजना। इसमें विवाद इस बात पर है कि जो सीनियर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं, उन्हें पिछली तारीखों से (Retrospective/Notional Seniority) जो वरिष्ठता दी गई है, उससे जूनियर कैडर के अधिकारों पर असर पड़ रहा है।
- आरक्षण और रोस्टर नीति (Reservation & Roster): राज्य की बिजली कंपनियों में तकनीकी और इंजीनियरिंग पदों पर प्रमोशन के दौरान सामान्य वर्ग (Unreserved) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच रोस्टर सीटों के आवंटन (Allocation) को लेकर विवाद है।
अब आगे क्या होगा? (What Happens Next?)
चूंकि अब यह केस पूरी तरह से ‘सिविल अपील’ में बदल चुका है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों (एक तरफ बिजली कंपनी/राज्य सरकार और दूसरी तरफ कर्मचारी यूनियन/याचिकाकर्ता) को निर्देश दिया है कि वे अपनी-अपनी तरफ से सभी जरूरी कानूनी कागजात और लिखित जवाब (Pleadings) जल्द से जल्द पूरे कर लें।
इसके बाद, इस केस को अंतिम बहस (Final Arguments) के लिए क्रमानुसार लिस्ट में लगाया जाएगा, जहाँ दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर सुप्रीम कोर्ट अपना आंतिम और मुख्य फैसला सुनाएगा।
संक्षेप में कहें तो: कर्मचारियों के प्रमोशन के इस विवाद को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी गहराई से सुनने का फैसला किया है, लेकिन जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक विभाग के वर्तमान कामकाज या प्रमोशन प्रक्रिया पर कोई रोक (Stay) नहीं है।







