Chhattisgarh

छत्तीसगढ़: पेंशन के मामले में सेवानिवृत्‍त IAS को हाई कोर्ट से झटका! बढ़ी हुई पेंशन की मांग वाली याचिका खारिज, जानिए पूरा मामला

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Bilaspur High Court) ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) के पूर्व अध्यक्ष और प्रमुख सचिव (Secretary) के पद से सेवानिवृत्‍त आईएएस आरएस विश्वकर्मा की याचिका को पूरी तरह से खारिज (Dismissed) कर दिया है। याचिकाकर्ता ने संशोधित सेवा नियमों के अंतर्गत अतिरिक्त पेंशन लाभ (Additional Pension Benefits) प्रदान करने की मांग की थी, जिसे अदालत ने कानूनन सही नहीं माना।

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच (Division Bench) ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित किया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पेंशन संबंधी अधिकार (Pension Rights) हमेशा कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की तिथि पर लागू नियमों के आधार पर ही तय किए जाते हैं। हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि अदालत सरकार को वित्तीय निहितार्थों (Financial Implications) से जुड़े नीतिगत निर्णयों को पूर्वव्यापी रूप से यानी पिछली तारीख (Retrospectively) से बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।

क्या है पूरा विवाद? (The Core Dispute)

इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। दरअसल, यह विवाद छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सेवा शर्तें) विनियम, 2001 के विनियम 8(3) से जुड़ा हुआ है। इस विनियम का निर्माण भारत के संविधान के अनुच्छेद 318 (Article 318 of Constitution) के तहत किया गया था।

जब आरएस विश्वकर्मा सीजीपीएससी (CGPSC) के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए, उस समय के नियमों के मुताबिक लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के लिए अधिकतम संयुक्त वार्षिक पेंशन (Maximum Combined Annual Pension) की सीमा केवल 4.80 लाख रुपये निर्धारित की गई थी।

चूंकि याचिकाकर्ता आरएस विश्वकर्मा अपनी पिछली सरकारी सेवा (प्रमुख सचिव के पद) से पहले ही इस तय सीमा से कहीं अधिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे, इसलिए तत्कालीन नियमानुसार उन्हें लोक सेवा आयोग में बिताए गए अपने कार्यकाल के लिए कोई भी अलग या अतिरिक्त पेंशन जारी नहीं की गई। इसी बिंदु से इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई, जो अंततः हाई कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया।

एक नजर में पूरा घटनाक्रम (Timeline of the Case)

मामले की गंभीरता और याचिकाकर्ता के रसूख को देखते हुए इसके टाइमलाइन को समझना बेहद जरूरी है, जो इस प्रकार है:

संशोधित नियम और पिछली तारीख से लाभ की मांग (Retrospective Effect Claim)

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद, छत्तीसगढ़ शासन ने 5 दिसंबर, 2020 को एक विशेष अधिसूचना (Notification) जारी की थी। इस नए संशोधन के माध्यम से सरकार ने पीएससी अध्यक्षों के लिए पेंशन की अधिकतम वैधानिक सीमा को 4.80 लाख रुपये से बढ़ाकर सीधे 13.50 लाख रुपये वार्षिक कर दिया। इसके साथ ही वार्षिक पेंशन पात्रता में भी अच्छी बढ़ोतरी की गई। हालांकि, सरकार ने इस संशोधित नियम को स्पष्ट रूप से 1 अप्रैल, 2018 से प्रभावी (Effective Date) बनाया था।

याचिकाकर्ता आरएस विश्वकर्मा का मुख्य तर्क यह था कि चूंकि राज्य में वेतन संशोधन (Pay Revision) को 1 जनवरी, 2016 से लागू किया गया था, इसलिए इस संशोधित पेंशन विनियम को भी उसी तारीख से यानी पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए था। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत रिट याचिका दायर कर 13 अगस्त, 2021 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी थी, जिसने उनके इस अभ्यावेदन (Representation) को खारिज कर दिया था।

हाई कोर्ट की दो टूक: रिटायरमेंट की तारीख ही अंतिम (Court’s Verdict on Pension Rules)

बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता की इन तमाम दलीलों और दावों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया है, जो भविष्य के सेवा मामलों (Service Matters) के लिए नजीर बनेंगे:

  • रिटायरमेंट की तिथि का महत्व: अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि किसी भी कर्मचारी के पेंशन अधिकार उसकी सेवानिवृत्ति की तिथि पर ही फ्रीज (Determine) हो जाते हैं। उस समय जो नियम चलन में होते हैं, वही मान्य होते हैं।
  • कट-ऑफ डेट तय करने का अधिकार: हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी परिपत्र या अधिसूचना को एक विशेष तिथि (Cut-off Date) से लागू करने का पूरा और अनन्य अधिकार नियम बनाने वाले प्राधिकरण यानी राज्य सरकार के पास सुरक्षित है।
  • वित्तीय मामलों में दखल नहीं: अदालत ने कहा कि खासकर जब किसी फैसले में वित्तीय निहितार्थ (Financial Burden) शामिल हों, तो कोर्ट सरकार के नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला: डिवीजन बेंच ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति और पेंशन लाभों की पुनर्गणना (Recalculation) केवल इस आधार पर बाद के वेतन संशोधनों के साथ नहीं की जा सकती, जब तक कि उस योजना में इसका स्पष्ट उल्लेख न हो।

समानता का दावा भी हुआ फेल (The Equality Argument Dismissed)

याचिकाकर्ता ने इस मामले में एक अन्य पीएससी सदस्य एमएस पैकरा के मामले से अपने केस की तुलना करते हुए राज्य सरकार पर भेदभाव का आरोप भी लगाया था। उन्होंने तर्क दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत उन्हें भी वैसा ही लाभ मिलना चाहिए।

हाई कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने बारीकी से परीक्षण करने के बाद पाया कि एमएस पैकरा और आरएस विश्वकर्मा के मामले मौलिक रूप से बिल्कुल अलग (Fundamentally Different) थे। पैकरा की कुल संयुक्त पेंशन पुराने नियमों के तहत निर्धारित सीमा के भीतर ही आ रही थी, जबकि विश्वकर्मा की स्थिति वैसी नहीं थी। उनकी पूर्व सरकारी सेवा (प्रमुख सचिव) से प्राप्त पेंशन ही तत्कालीन वैधानिक सीमा से कहीं अधिक थी। इसलिए भेदभाव का यह दावा पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।

सरकार को विवश नहीं कर सकती अदालत (No Mandamus to Government)

अंततः बिलासपुर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि राज्य सरकार को किसी भी संशोधन की प्रभावी तिथि को बदलने या याचिकाकर्ता को जबरन बढ़ी हुई पेंशन का लाभ देने का निर्देश देने वाला कोई भी परमादेश रिट (Writs of Mandamus) जारी नहीं किया जा सकता है।

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इस निर्णय से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि सेवानिवृत्ति के समय के नियम ही किसी भी लोक सेवक के अंतिम वित्तीय लाभों को तय करने का एकमात्र वैध जरिया होते हैं।

S. J. Kumar

पत्रकारिता के क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव । सुदीर्घ करियर में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दी हैं। जटिल मुद्दों के सरल विश्लेषण और खोजी रिपोर्टिंग के साथ राजनीति, प्रशासन और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ है। पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में Chaturpost.com में सेवाएं दे रहे हैं।
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