
रायपुर, Chaturpost । भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर इस वक्त एक बड़े नीतिगत बदलाव (Policy Change) की चर्चा तेज है। खबर है कि केंद्रीय नेतृत्व अब राज्यों में दो डिप्टी सीएम (Two Deputy CM Formula) के कॉन्सेप्ट को पूरी तरह से खत्म करने पर विचार कर रहा है। अगले महीने देश की राजधानी दिल्ली में छत्तीसगढ़ सहित उन पांच राज्यों की सरकारों की समीक्षा (Performance Review Meeting) शुरू होने जा रही है, जहां नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए थे।
इस हाई-लेवल रिव्यू के तुरंत बाद ही राज्यों के मंत्रिमंडल में बड़ी सर्जरी (Cabinet Reshuffle) का खाका तैयार किया जाएगा। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा बेहद गर्म है कि बीजेपी अब ‘वन स्टेट, सिंगल पावर सेंटर’ (Single Power Centre) के सिद्धांत पर आगे बढ़ने वाली है।
क्यों फ्लॉप हो रहा है ‘दो डिप्टी सीएम‘ का कॉन्सेप्ट?
बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व (Top Leadership) के संज्ञान में यह बात आई है कि जिन राज्यों में दो-दो डिप्टी सीएम बनाए गए हैं, वहां सत्ता और प्रशासन के केंद्र तीन अलग-अलग हिस्सों में बंट गए हैं। Power Division होने के कारण सरकार के भीतर तालमेल (Coordination Shift) बिगड़ने की खबरें लगातार आ रही हैं।
राजनीतिक पंडितों (Political Analysts) का मानना है कि डिप्टी सीएम का पद रहने से सूबे के मुख्यमंत्री का ‘औरा’ (Chief Minister’s Aura) प्रभावित होता है। उदाहरण के तौर पर:
- उत्तर प्रदेश का उदाहरण: यूपी में योगी आदित्यनाथ जैसे हाई-प्रोफाइल मुख्यमंत्री होने के बावजूद, वहां के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने सरकार के कामकाज और संगठन को लेकर सार्वजनिक मंचों पर बयानबाजी शुरू कर दी थी, जिससे सरकार की किरकिरी हुई।
- अपवाद सिर्फ गठबंधन: बिहार जैसे राज्यों में दो उप-मुख्यमंत्री इसलिए बनाए गए क्योंकि वहां गठबंधन सरकार (Coalition Government) की मजबूरी है।
शायद यही वजह है कि बीजेपी ने असम और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में प्रचंड बहुमत या मजबूत स्थिति होने के बाद भी किसी को डिप्टी सीएम नहीं बनाया। कुल मिलाकर, अब राज्यों के मुख्यमंत्री भी यही चाहते हैं कि कोई डिप्टी सीएम न रहे ताकि सिंगल पावर सेंटर से ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy Control) पर पकड़ मजबूत रहे।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में क्या है बीजेपी का मेगा प्लान?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बीजेपी क्या फैसला लेने जा रही है? क्योंकि छत्तीसगढ़ में भी इस वक्त दो डिप्टी सीएम का कॉन्सेप्ट लागू है। राज्य के उप-मुख्यमंत्री और बेहद प्रभावशाली नेता विजय शर्मा (Deputy CM Vijay Sharma) को लेकर इन दिनों सियासी गलियारों में कयासों का बाजार गर्म है।
विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, संगठन में उन्हें एक बहुत बड़ा ब्रेक (Major Promotion in BJP) मिलने वाला है। उनके करीबी नेता भी इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ बीजेपी के क्षेत्रीय प्रभारी नितिन नबीन (Nitin Nabin Team) की टीम में विजय शर्मा के लिए कोई बड़ी भूमिका तय की जा रही है।
डिप्टी सीएम का पद छोड़ दिल्ली क्यों जाएंगे विजय शर्मा?
राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि छत्तीसगढ़ में गृह, जेल और तकनीकी शिक्षा जैसे सबसे मलाईदार और रसूखदार विभागों को संभालने वाले विजय शर्मा आख़िरकार रायपुर की ‘पावर’ छोड़कर दिल्ली की ‘सियासत’ में क्यों कदम रखेंगे? इस संभावित रवानगी के पीछे बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व और संघ (RSS) की एक बहुत बड़ी और सोची-समझी रणनीति काम कर रही है, जिसके तीन मुख्य कारण निकलकर सामने आ रहे हैं:
1. राष्ट्रीय संगठन में ‘हिंदुत्व का युवा चेहरा’ तैयार करने की रणनीति
विजय शर्मा केवल एक प्रशासनिक मंत्री नहीं हैं, बल्कि वे कवर्धा आंदोलन के बाद से पूरे छत्तीसगढ़ में बीजेपी के लिए ‘प्रखर हिंदुत्व’ और ‘युवा जोश’ का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरे हैं।
- नितिन नबीन की टीम में बड़ी भूमिका: बीजेपी अब राष्ट्रीय स्तर पर और खासकर मध्य भारत (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा) में ऐसे चेहरों को प्रमोट कर रही है जिनकी छवि बेदाग, आक्रामक और वैचारिक रूप से मजबूत हो। राष्ट्रीय संगठन (बीजेपी केंद्रीय टीम) में उन्हें महासचिव या किसी बड़े राज्य का प्रभार (State In-charge) देकर उनकी संगठनात्मक क्षमता का उपयोग पूरे देश में करने की तैयारी है।
2. छत्तीसगढ़ में ‘फ्यूचर सीएम इन मेकिंग’ का लॉन्ग-टर्म प्लान
दिल्ली का रास्ता ही अक्सर राज्यों में शीर्ष पद तक जाता है। बीजेपी के इतिहास में यह कई बार देखा गया है कि जो नेता राज्यों में एक सीमा से ऊपर नहीं बढ़ पाते, उन्हें पहले केंद्रीय संगठन या राष्ट्रीय राजनीति में ले जाकर ‘सेंटीमेंटली’ और बड़ा नेता बनाया जाता है।
- उम्र का बड़ा एडवांटेज: विजय शर्मा के पास अभी उम्र का एक लंबा दौर बाकी है। छत्तीसगढ़ में रहते हुए वे फिलहाल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और अन्य सीनियर मंत्रियों के रहते सीधे शीर्ष पर नहीं पहुंच सकते। दिल्ली में अमित शाह और जेपी नड्डा के सीधे मार्गदर्शन में काम करके वे खुद को नेशनल लीग के लिए तैयार करेंगे, ताकि भविष्य में जब भी छत्तीसगढ़ में नेतृत्व परिवर्तन या लंबी रेस के घोड़े की जरूरत हो, तो ‘दिल्ली रिटर्न’ विजय शर्मा का नाम सबसे ऊपर हो।
3. संघ (RSS) का सीधा वीटो और ‘कॉर्डिनेशन’ की जिम्मेदारी
विजय शर्मा छात्र जीवन से ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और संघ कैडर के बेहद वफादार सिपाही रहे हैं। संघ इस वक्त राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी संगठन को री-स्ट्रक्चर (पुनर्गठन) कर रहा है।
अंदर की खबर: संघ को दिल्ली में एक ऐसे युवा और ऊर्जावान चेहरे की तलाश है जो राज्यों के जमीनी फीडबैक को सीधे केंद्रीय नेतृत्व तक बिना किसी फिल्टर के पहुंचा सके। नितिन नबीन की टीम में विजय शर्मा की एंट्री इसी ‘कॉर्डिनेशन गैप’ को भरने के लिए की जा रही है।
अतः, विजय शर्मा का दिल्ली जाना उनके सियासी कद का घटना नहीं, बल्कि “एक कदम पीछे खींचकर लंबी छलांग लगाने” जैसी रणनीति है। छत्तीसगढ़ का गृह मंत्रालय छोड़ना उनके लिए घाटे का सौदा नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी पार्टी के थिंक-टैंक में शामिल होने का गोल्डन टिकट है।
मुख्यमंत्री के पास आएगा गृह विभाग? बदल जाएगा पावर गेम
यदि विजय शर्मा को राष्ट्रीय राजनीति में लाया जाता है और वे दिल्ली जाते हैं, तो छत्तीसगढ़ का पूरा पॉलिटिकल डाइनैमिक्स (Political Dynamics) बदल जाएगा। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि राज्य का गृह विभाग (Home Department) सीधे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास आ जाएगा।
देश के अधिकांश राज्यों का ट्रेंड (National Political Trend) देखें, तो मुख्यमंत्रियों ने गृह विभाग को हमेशा अपने पास ही रखा है:
| राज्य (State) | गृह विभाग की वर्तमान स्थिति (Home Ministry Status) |
| उत्तर प्रदेश | मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास |
| मध्य प्रदेश | मुख्यमंत्री मोहन यादव के पास |
| पश्चिम बंगाल | मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के पास |
| बिहार | मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास |
| असम | मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के पास |
सीएम के पास होम डिपार्टमेंट आने से General Administration Department (GAD) और गृह विभाग दोनों एक ही छत के नीचे आ जाएंगे। इससे कानून व्यवस्था और प्रशासनिक फैसलों में तेजी आएगी।
छत्तीसगढ़ में ‘गृह मंत्री‘ का वीटो और पुराना इतिहास
प्रशासनिक नियमों के अनुसार, पुलिस विभाग में राजपत्रित अधिकारियों (Gazetted Officers) से लेकर ऑल इंडिया सर्विस (IPS Officers) के ट्रांसफर-पोस्टिंग के तमाम मामले वैसे तो मुख्यमंत्री के अधीन होते हैं, लेकिन तकनीकी रूप से उसमें गृह मंत्री का अनुमोदन (Approval) अनिवार्य होता है। गृह मंत्री की ‘चिड़िया’ (Sign/Approval) बैठने के बाद ही नोटशीट मुख्यमंत्री सचिवालय तक जाती है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास इस मामले में बड़ा दिलचस्प रहा है:
- रमन सिंह और भूपेश बघेल का दौर: पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में कई बार कैबिनेट या मुख्यमंत्री स्तर पर सीधे बड़े फैसले ले लिए जाते थे, और गृह मंत्री से केवल बाद में औपचारिक अनुमोदन (Post-Facto Approval) लिया जाता था। कई बार तो ट्रांसफर की लिस्ट जारी होने के बाद गृह मंत्रियों को पता चलता था कि किस अफसर को कहाँ भेजा गया है।
- विजय शर्मा का दौर: वर्तमान गृह मंत्री विजय शर्मा इस मामले में बेहद तेज-तर्रार और अलर्ट माने जाते हैं। ब्यूरोक्रेसी पर उनकी सीधी नजर है और विभाग से जुड़ी हर फाइल उनकी मर्जी के बिना आगे नहीं बढ़ती।
- बृजमोहन अग्रवाल का इतिहास: छत्तीसगढ़ के गठन के बाद बीजेपी सरकार के पहले गृह मंत्री बृजमोहन अग्रवाल (Brijmohan Agarwal) भी बेहद कड़क और तेज-तर्रार मंत्री माने जाते थे, लेकिन महज डेढ़ साल के भीतर ही उनकी गृह विभाग से विदाई हो गई थी।
क्या बदलेगा छत्तीसगढ़ का नक्शा?
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य (Political Scenario) को देखें तो विजय शर्मा संगठन और सरकार दोनों मोर्चों पर बेहद मजबूत हो चुके हैं। इस पूरे कार्यकाल (Current Term) में उनका विभाग बदला जाना किसी भी परिस्थिति में संभव नजर नहीं आता।
उनका विभाग केवल और केवल एक ही शर्त पर बदला जा सकता है—अगर केंद्रीय नेतृत्व उन्हें दिल्ली बुलाकर संगठन में कोई राष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंपता है। अगले महीने दिल्ली में होने वाली बीजेपी की यह महा-समीक्षा बैठक (BJP Review Meeting) छत्तीसगढ़ की सियासत का अगला रुख तय करने वाली है।







